अपनी करेंसी खुद छाप कर लड़ी जा रही मंदी से जंग

कोविड-19 के प्रहार से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए एक नायाब तरीका अपनाया गया है- ‘अपनी करेंसी खुद ही छापने का’। मामला है अमेरिका के वाशिंगटन राज्य के एक कस्बे टेनिनो का। इस छोटे से कस्बे की आबादी 1884 लोगों की है।

नीलमणि लाल

लखनऊ: कोविड-19 के प्रहार से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए एक नायाब तरीका अपनाया गया है- ‘अपनी करेंसी खुद ही छापने का’।मामला है अमेरिका के वाशिंगटन राज्य के एक कस्बे टेनिनो का। इस छोटे से कस्बे की आबादी 1884 लोगों की है। टेनिनो के मेयर वेन फोरनियर ने देखा कि किस तरह महामारी ने लोकल बिजनेस को प्रभावित कर दिया है। लोगों के पास रोज़मर्रा की चीजें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। लोकल फूड बैंक के बाहर लंबी लंबी लाइनें लगी रहतीं हैं। कस्बे की बाजार में सन्नाटा छा गया है।

जल्द कुछ करने की थी जरूरत

इन विचारों और चिंताओं से घिरे वेन फोरनियर को किसी तरह अपने कस्बे की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना था। जल्द कुछ करने की जरूरत थी। दारोमदार मेयर पर ही था। कस्बे के पदाधिकारी सरकारी ग्रांट, माइक्रो लोन, बैंक से मदद आदि उपायों पर विचार कर रहे थे। लेकिन सवाल ये था कि परिवारों और अलग अलग व्यक्तियों की मदद कैसे की जाये?

तभी मेयर फोरनियर को एक आइडिया आया, क्यों न हम अपनी खुद की करेंसी शुरू कर दें? ये प्लान सबको पसंद्द आ गया। वेन फोरनियर ने महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित अल्प आय वाले परिवारों की मदद के लिए टाउन फ़ंड से 10 हजार डालर (करीब साढ़े सात लाख रुपये) अलग रखने का फैसला किया। लेकिन इन लोगों को सरकारी करेंसी की बजाय लकड़ी की महीन शीट पर छापी गई करेंसी दी जाएगी।

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सिर्फ टेनिनो कस्बे में ही मान्य होगी करेंसी

ये करेंसी भी सिर्फ टेनिनो कस्बे में ही मान्य होगी। करेंसी की छपाई के लिए कस्बे के म्यूज़ियम में रखी 130 वर्ष पुरानी प्रिंटिंग मशीन का इस्तेमाल करने का फैसला हुया। लकड़ी के डालर छापने के लिए टाउन प्रशासन ने एक अध्यादेश जारी किया जिसका नाम था ‘टेनिनो कोविड-19 रिकवरी ग्रांट प्रोग्राम।’

पहले भी ऐसा हो चुका है

मेयर वेन फोरनियर का आइडिया वैसे कोई नया नहीं था। टेनिनो कस्बे के अपने इतिहास मैं ही ऐसा हो चुका है। सन 30 के दशक में आई भीषण मंदी के समय टेनिनो ने 1890 की इसी अखबारी प्रिंटिंग मशीन पर लकड़ी के डालर छापे थे। बताया जाता है कि साल भर के भीतर यहाँ की अर्थव्यवस्था फिर से उठ खड़ी हुई थी। उस समय की करेंसी को इस दौर में फिर से आजमाने का फैसला ले कर वेन फोरनियर अनजाने में एक व्यापक अभियान का हिस्सा बन गए।

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महामारी के इस दौर में जब कारोबार को जीवित रखने की जद्दोजहद चल रही है और लोग पैसे के लिए परेशान हैं वहाँ एक पुरानी रणनीति फिर से सामने लायी गई है। ये रणनीति है कि जब भी भारी संकट आए तो अपनी मुद्रा खुद छाप लो। आज ये ‘लोकल करेंसी’ कोविड-19 के आर्थिक असर से स्थानीय समुदायों को बचाने में मददगार साबित हो सकती हैं।

कारोबार पर गहरा असर

वेन फोरनियर कोई पॉलिटीशियन नहीं हैं। वे काफी समय तक दमकल कर्मी रहे और 2016 में टेनिनो के मेयर चुने गए। फोरनियर बताते हैं कि कोविड-19 आने से पहले टेनिनो के लोग बहुत खुशहाल थे। वे अपने क्षेत्र में 150 से ज्यादा कृषि आधारित जॉब्स सृजित करने के प्लान बना रहे थे। लेकिन महामारी ने सब बदल दिया। इस कस्बे के व्यापार स्थानीय लोगों के हैं और छोटे मार्जीन पर काम करते हैं।

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ऐसे में ये किसी लॉकडाउन को सहने योग्य नहीं थे। अब सब व्यवसाय बंदी की कगार पर हैं। बहुत से व्यवसायी कह रहे हैं कि वे अब कारोबार कभी नहीं शुरू करेंगे। बाकि व्यवसाय किसी तरह चल रहे हैं और उनको बूस्टर की नितांत जरूरत है। वाशिंगटन राज्य की बाकी जगहों की तुलना में टेनिन काफी गरीब माना जाता है। यहाँ के स्कूलों में अल्प आय वर्ग के ढेरों बच्चे पढ़ते हैं जिनको टाउन से सहायता दी जाती है।

क्या है लोकल करेंसी प्रोग्राम

फोरनियर के लोकल करेंसी प्रोग्राम में गरीबी की रेखा से नीचे के लोग टाउन के दस हजार डालर के फंड से मदद की मांग कर सकते हैं। आवेदकों को साबित करना होता है कि वे महामारी से प्रभावित हुये हैं। आवेदन स्वीकृत होने के बाद आवेदक टाउन आफिस से स्टाइपेंड ले सकते हैं। स्टाइपेंड के रूप में उनको लकड़ी पर छपे 25 – 25 डालर मिलते हैं। एक आवेदक को महीने में 300 डालर ही दिये जाते हैं। यानी कुल 12 ‘नोट’ मिलते हैं। लकड़ी के इस डालर पर लैटिन का एक वाक्य भी छ्पा होता है जिसका मतलब है – ‘हमने इसका समाधान कर लिया।

शर्तें भी लागू

कस्बे का प्रशासन लोगों को पैसा देता लेकिन इसको खर्च करने की कुछ शर्तें भी हैं। लोग इन पैसों से सिगरेट, शराब या लाटरी के टिकट नहीं खरीद सकते। ये करेंसी सिर्फ खाद्य पदार्थ, पेट्रोल, गैस, और डे-केयर जैसी आवश्यक चीजों पर ही खर्च की जा सकती है। कस्बे का लगभग हर व्यवसाय इस लकड़ी के डालरों को स्वीकार करता है। व्यवसायी इन डालरों को महीने में दो बार टाउन आफिस में जमा करके बदले में असली कैश ले सकते हैं।

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अपनी करेंसी ही क्यों?

ये सवाल भी उठना लाज़मी है कि लकड़ी की करेंसी क्यों छपी जाये? असली करेंसी देने में क्या हर्ज है? लोगों को 300 डालर नकद भी तो दिये जा सकते हैं। जवाब आसान है। अपनी लोकल करेंसी छाप कर ये पैसा अपने समुदाय में ही रखा जा रहा है। फोरनियर का कहना है कि लोकल करेंसी होने से ये हमारे शहर में ही बनी रहती है। ये वालमार्ट, अमेज़न, या कोस्टको जैसों की जेब में नहीं जाती। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ के बहुत से लोग पार्ट टाइम या कम मज़दूरी वाले काम करते हैं। लॉकडाउन के कारण ऐसे लोग बेरोजगार हो गए हैं। हम लोकल करेंसी के जरिये एक समुदाय के रूप में एकजुट हो कर मदद कर सकते हैं।

लकड़ी के नोटों का पुराना इतिहास

जंगलात से घिरे टेनिनो का लकड़ी की करेंसी से पुराना नाता है। दिसंबर 1931 में लकड़ी की करेंसी की शुरुआत यहाँ के इकलौते बैंक के बंद हो जाने के बाद हुई। ये भीषण मंदी का समय था। अनगिनत लोग बेरोजगार और पैसे पैसे को मोहताज हो गए थे। उस समय एक लोकल अखबार के मालिक डॉन मेजर ने एक समाधान पेश किया। उन्होने कहा कि टेनिनो अपनी खुद की करेंसी का आविष्कार कर सकता है।

डॉन मेजर की बात से अधिकारी सहमत हुये और फिर मेजर ने 25 सेंट, 1 डालर, 5 डालर और 10 डालर के नोट सिक्टा स्प्रूस नामक पेड़ की लकड़ी की पतली परत पर छाप दिये। खुद डॉन मेजर और दो लोकल डाक्टर ऐसी हर करेंसी की वैल्यू की गारंटी लेने को राजी हो गए। जनवरी 1933 तक टेनिनो ने 6.5 हजार डालर कीमत की वुडेन करेंसी छाप ली थी।

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और भी प्रयोग हुये हैं

लोकल करेंसी छापने वाला टेनिनो अकेला शहर नहीं था। भीषण मंदी के दौरान ऐसे प्रयोग कई जगह हुये थे। सैकड़ों नगर निगमों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और कामगार संगठनों ने अपनी ‘चिट’ छापनी शुरू कर दी थी। एक अनुमान है कि 1930 के दशक में अमेरिका में एक बिलियन डालर कीमत की ‘चिट’ छपी गई। चिट असल में एक टोकन, कूपन या टिकट है। इसे जारी करने वाला चिट पर छपी रकम देने की गारंटी लेता है।

भीषण मंदी के दौरान नकदी के संकट से जूझ राजे व्यवसाय अपने कर्मचारियों को लोकल करेंसी में वेतन देते थे। एक उदाहरण मैसाचुसेट्स के स्प्रिंगफील्ड यूनियन का दिया जाता है। इस अखबार के प्रकाशक ने अपने कर्मचारियों को खुद की ‘चिट’ के रूप में वेतन देना शुरू कर दिया। इन चिटों को उन प्रतिष्ठानों में खर्च किया जा सकता था जो अखबार में विज्ञापन देते थे। इसके बाद ये प्रतिष्ठान अखबार में चिट दे कर विज्ञापन छपवा सकते थे।

दुनिया भर में मची धूम

30 के दशक में टेनिनो की लकड़ी वाली करेंसी की खबर पूरे अमेरिका में फैली फिर पूरी दुनिया में छा गई। अमेरिकी संसद में वाशिंगटन के सीनेटर सी.सी. डिल ने अपने क्षेत्र के इस प्रयोग का खूब बखान किया। लॉस एंजिल्स टाइम्स में खबर छ्पी जिसकी हेडलाइन थी – अब पेड़ों पर पैसे उगते हैं।‘ शिकागो के बैंक तक टेनिनो की लकड़ी करेंसी को स्वीकार करने लगे। टेनिनो की करेंसी पाने के लिए भारत तक से पर्यटक आने लगे। डिमांड इतनी बढ़ गई कि 25 सेंट की लकड़ी करेंसी के लिए लोग ढाई डालर तक देने लगे। यानी दस गुना ज्यादा। 1930 में टेनिनो की करेंसी वाइरल हो गई थी।

1 जनवरी 1933 को जब टेनिनो में लकड़ी की करेंसी का प्रचलन बंद हो गया तब अमेरिकी अखबारों में खबर छपी थी कि टेनिनो लकड़ी छोड़ कर गोल्ड स्टैंडर्ड पर वापस आ गया है।

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लोकल करेंसी काम की चीज

महामारी के इस दौर में दुनिया भर में लोकल नेता – प्रशासक लोकल करेंसी का आइडिया अपना रहे हैं।

इटली में 550 लोगों की आबादी वाले डेल बिफरनो कस्बे में ‘दुकाती’ नामक लोकल करेंसी अप्रैल से छापी जा रही है। इसका उद्देश्य लोकल बिजनेस को सहारा देना है।

मेक्सिको के सांता मारिया जाजल्पा नामक कस्बे में ‘जाजल्पापीसो’ नाम से करेंसी चलाई जा रही ताकि गरीब लोग सब्जियाँ, चिकेन आदि खरीद सकें।

ब्राज़ील में मरिका शहर में ‘मुंबुका’ नाम से डिजिटल लोकल करेंसी चलाई गई है। इसका प्रचालन इतना ज्यादा है कि शहर प्रशासन के कर्मचारियों को वेतन तक इसी करेंसी में दिया जाता है। व्यावसायिक प्रतिष्ठान ‘मुंबुका’ को स्वीकार करने के बदले में स्थानीय प्रशासन को 2 फीसदी फीस देते हैं। फीस का पैसा जरूरतमंदों को ब्याज मुक्त लोन के रूप में बाँट दिया जाता है।