सऊदी अरब के तेल कुओं पर अटैक, 100 साल में पहली बार खड़ा हुआ ये बड़ा संकट

सऊदी अरब के तेल कुओं पर हमले के बाद अमेरिका और ईरान के बीच एक बारि फिर तनाव बढ़ गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने सऊदी अरब के तेल ठिकानों में ड्रोन अटैक के लिए ईरान को जिम्मेदार बताया है, तो वहीं ईरान ने अमेरिका के आरोपों को खारिज कर दिया है।

Published by Dharmendra kumar Published: September 16, 2019 | 9:19 am
Modified: September 16, 2019 | 5:23 pm

नई दिल्ली: सऊदी अरब के तेल कुओं पर हमले के बाद अमेरिका और ईरान के बीच एक बारि फिर तनाव बढ़ गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने सऊदी अरब के तेल ठिकानों में ड्रोन अटैक के लिए ईरान को जिम्मेदार बताया है, तो वहीं ईरान ने अमेरिका के आरोपों को खारिज कर दिया है।

सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर यमन के हथियारबंद हूथी विद्रोही संगठन के हमले से क्रूड ऑयल की सप्लाई पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। करीब 100 साल यानी एक सदी पुरानी इस इंडस्ट्री के समक्ष पहली बार आपूर्ति को लेकर इस तरह का संकट खड़ा हो गया है।

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इस हमले की वजह से आपूर्ति में 57 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आई है, जो वैश्विक आपूर्ति का 6 फीसदी है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में ग्लोबल क्रूड सप्लाई चेन के लिए यह गंभीर चुनौती है और अनियंत्रित युद्ध की स्थिति में विकट हालात पैदा हो सकते हैं।

बता दें कि शनिवार को हूथी विद्रोही संगठन ने सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको के अबकैक और खुराइस में स्थित तेल कुओं पर ड्रोन अटैक किए थे। तेल कंपनी अरामको दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल है।

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सऊदी तेल कंपनी अरामको ने कहा कि वह अगले करीब दो दिनों तक उत्पादन को कम रखेगी ताकि उन तेल कुओं की मरम्मत की जा सके, जहां हमला हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट में नाइजीरिया नेशनल पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के मुखिया के हवाले से कहा गया है कि सऊदी अरब के प्लांट में जो हमला हुआ है, वह चिंताजनक है। तेल मार्केट के लिए कुओं की रक्षा करना चुनौतीपूर्ण है।’

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उन्होंने कहा कि ड्रोन के जरिए हमले ने यह साबित किया है कि तेल कुओं पर हमले के लिए अडवांस रॉकेट्स की ही जरूरत नहीं है। अमेरिका स्थित रिस्क कंसल्टेंट मिलेना रॉडबैन ने कहा, ‘ड्रोन्स के इस्तेमाल से यह पता चलता है कि दुश्मन हवाई ताकत के जरिए तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं।’

उन्होंने कहा कि हूथी विद्रोहियों के अलावा अन्य ताकतों के लिए भी सऊदी अरब के फैसिलिटी सेंटर्स या तेल कुएं टारगेट हो सकते हैं।