बॉस ने मेरी शर्ट में हाथ डाला….., बिकनी में आने को कहा…

एक महिला कर्मी ने कहा कि मेरे बॉस ने मेरी शर्ट में हाथ डाल दिया। दूसरी ने कहा बॉस ने बिकनी में आने को कहा। खबर आई लोगों ने पढ़ी कुछ कमेंट आए जिसमें सबसे भद्दा यह था कि लड़की की भी कुछ गलती होगी।

नई दिल्ली: एक महिला कर्मी ने कहा कि मेरे बॉस ने मेरी शर्ट में हाथ डाल दिया। दूसरी ने कहा बॉस ने बिकनी में आने को कहा। खबर आई लोगों ने पढ़ी कुछ कमेंट आए जिसमें सबसे भद्दा यह था कि लड़की की भी कुछ गलती होगी। या किसी ने लड़की ने शिकायत की कि मुझे गलत तरीके से छुआ तो ये सवाल कि तुम्हें कैसे पता गलत तरीके से छुआ। या फिर काम करते समय गलती से हाथ लग गया होगा।

अख़बार उठाएं, टीवी ख़बरें देखें या या डिजिटल मीडिया या फिर सोशल मीडिया पर नज़र दौड़ाएं बलात्कार और यौन अपराधों की घटनाएं आकर्षक ढंग से सुर्ख़ियों में रहती हैं। वास्तव में जो रेप या यौन हिंसा नहीं कर पाते वह इन्हें पढ़कर पीड़िता के कष्ट से आनंद उठाते हैं।

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पहले महिलाएं बदनामी के भय से इस तरफ की घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं देती थीं, या अपने ऊपर हुए जुल्म को पारिवारिक दबाव में चुपचाप सहन कर लेती थीं लेकिन डिजिटल क्रांति के बाद सोशल मीडिया की बढ़ती पहुंच के बाद जब से यौन हिंसा की शिकार महिलाएं अपनी आवाज़ बुलंद करने लगी हैं, तब से ऐसा लगता है कि ऐसी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है।

हालात देख कर सरकारें भी यौन अपराध रोकने के लिए सख़्त क़ानून बनाने को मजबूर हुई हैं। गलतफहमियां अब भी हैं। लोग सेक्सुअल मिस बिहैव या सेक्सुअल अटैक या फिर रेप में फर्क महसूस नहीं कर पाते हैं और आज भी अक्सर पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। पीड़िता खुद ही शर्मिंदगी और अपराध-बोध की शिकार हो जाती है। जैसे अपने साथ हुई घटना के लिए वह ख़ुद ही ज़िम्मेदार हो।

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सामाजिक मानसिकता की इस विकृति से महिला व पुरुष दोनो ग्रस्त हैं नतीजा यह होता है कि पुलिस वकील से होते हुए मामला जब अदालतों में पहुंचता है तो वहां भी तथ्यों की निष्पक्षता से पड़ताल नहीं हो पाती।

यौन अपराधों से जुड़ी सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि यौन अपराध अपरिचित लोग करते हैं। मीडिया घटना को बढ़ा चढ़ाकर दिखाता है या परोसता है।

दूसरी गलतफहमी यह है कि यह अकेली महिला यौन अपराध का शिकार होती है।

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सच्चाई यह है कि बलात्कार, यौन हिंसा, यौन दुर्व्यवहार या गलत तरीके से छूने के ज़्यादातर मामले घरों के भीतर ही होते हैं. ऐसे जुर्म करने वाले पीड़िता के जान-पहचान वाले करीबी होते हैं जो रिश्ते नातेदारी का लबादा ओढ़े होते हैं। जैसे जीजा, फूफा, देवर, ससुर, ननदोई, जेठ आदि रिश्ते की आड़ में जो यौन अपराध करते हैं अमूमन घर के लोग ही उसे नजरअंदाज कर देते हैं।

भारत में हर महिला अपनी ज़िंदगी में कम से कम एक बार यौन दुर्व्यहार का शिकार होती है। यह गलत तरीके से छू जाने या यौनिक इशारों के रूप में हो सकता है।

यौन अपराधों के मामले में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। भारत में बच्चों के साथ यौन अपराध इतना अधिक बढ़े हैं कि सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई करनी पड़ी।

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बात अमरीका की करें तो नेशनल सेक्सुअल वायलेंस सर्वे के मुताबिक़ हर पांचवीं अमरीकी महिला बलात्कार की शिकार हुई है। ब्रिटेन में यौन हिंसा के केवल 10 प्रतिशत मामलों में ही आरोपी अपरिचित था. सेक्सुअल असॉल्ट के 56 फ़ीसद केस में हमलावर, पीड़ित का साथी था।

जबकि एक तिहाई पीडित लोग सही वक़्त का इंतज़ार करते हैं। और बाद में दर्ज कराने जाते हैं तब तक सबूत नष्ट हो चुके होते हैं। बलात्कार और यौन अपराधों की बहुत सी घटनाएं तो रिपोर्ट ही नहीं की जाती हैं।

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बहुत से पीड़ित इसलिए शिकायत नहीं करते कि वो नहीं चाहते कि आरोपी जेल जाए। इसकी वजह शायद पारिवारिक व सामाजिक दबाव होता है या फिर, आरोपी परिवार का सदस्य होता है।

कई बार पीड़ित महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होने की वजह से शिकायत नहीं कर पाती हैं। बहुत सी बलात्कार पीड़िताएं इसलिए शिकायत नहीं करतीं कि वो आरोपी की पूरी ज़िंदगी को बर्बाद नहीं करना चाहतीं।