नेपाल में भी नागरिकता पर घमासान

नेपाल में भारतीयों का दखल हर तरफ दिखता है। राजनीति से लेकर कारोबार में भारतीयों का दबदबा है। नेपाल में वामपंथी सरकार के गठन के बाद स्थितियां तेजी से बदली हैं। इसके पीछे चीन तो वजह है ही, नेपाल भी खुद को भारतीय छाया से मुक्त होने को बेचैन दिखता है।

पूर्णिमा श्रीवास्तव

गोरखपुर: नेपाल में भारतीयों का दखल हर तरफ दिखता है। राजनीति से लेकर कारोबार में भारतीयों का दबदबा है। नेपाल में वामपंथी सरकार के गठन के बाद स्थितियां तेजी से बदली हैं। इसके पीछे चीन तो वजह है ही, नेपाल भी खुद को भारतीय छाया से मुक्त होने को बेचैन दिखता है। खासकर नेपाल के युवा वर्ग में भारत के प्रति नफरत बढ़ी है। नेपाल की अर्थव्यवस्था में भारतीयों का दखल कम होता दिख रहा है। इसी का नतीजा है कि नेपाल में अरबों का निवेश करने वाले दोहरी नागरिकता वाले भारतीय अब गोरखपुर या फिर अन्य इलाकों में निवेश बढ़ा रहे हैं। गोरखपुर में पिछले दिनों खुले बड़े मॉल में नेपाल के एक कारोबारी की बड़ी हिस्सेदारी है। यह कारोबारी मूल रूप से भारतीय ही हैं।

नेपाल में भारतीयों के लिए माहौल बिगड़ता देख कई उद्योगपति गोरखपुर या उत्तराखंड को शिफ्ट हुए हैं। दरअसल, नेपाल में भारतीयों को लेकर कभी कोई संकट नहीं रहा है। भारतीय लोग आसानी से नेपाल में कारोबार करते रहे हैं और नेपाल के तमाम नागरिक गोरखपुर और आसपास के इलाकों में घुलमिल कर रहते दिखते हैं। चीन का प्रभाव कहें या फिर अपने पैर पर खड़े होकर बिगड़ी व्यवस्था सुधारने की कवायद, नेपाल में नागरिकता को लेकर संजीदगी बढ़ी है। कानून कड़े हुए हैं।

नागरिकता को लेकर जो भी पूर्व में गलतियां हुईं हैं, उन्हें दूर करने के प्रयास होते भी दिख रहे हैं। इसी क्रम में बीते दिनों नेपाल के कोर्ट ने कटहरिया नगरपालिका प्रमुख मेयर सियाराम कुशवाहा समेत 21 लोगों को बिहार के रहने वाले दो नागरिकों को जन्मसिद्ध नागरिकता दिलाने का दोषी पाते हुए सजा सुनाई है। जिला न्यायालय रौतहट ने मेयर समेत सभी 21 आरोपियों के खिलाफ 25-25 हजार रुपये का जुर्माना भी किया है। कूटरचित कागजातों के आधार पर नागरिकता लेने के आरोपी दोनों भारतीय नागरिकों के खिलाफ भी 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। जिला अदालत के उपसचिव गुणराज पराजुली का कहना है कि नेपाल के संविधान में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है। कटहरिया नगरपालिका प्रमुख मेयर सियाराम कुशवाहा द्वारा बिहार के चंपारण निवासी दो भाईयों हाफिज देवान और अली मोहम्मद को गलत तरीके से जन्मसिद्ध नागरिकता जारी की गई।

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नेपाल की अदालत द्वारा की गई इस कार्रवाई के बाद नेपाल में दोहरी नागरिकता के आधार पर रह रहे लाखों भारतीय में हडक़ंप मचा हुआ है। नेपाल का गुप्तचर विभाग इन दिनों ऐसे लोगों का ब्योरा जुटा रहा है। इसके तहत अब तक भारत के साथ नेपाली नागरिकता लेने वाले चार हजार लोगों को चिह्नित किया गया है। संचार व सूचना विधिक मंत्रालय के प्रवक्ता गोकुल बास्कोटा के मुताबिक नेपाल और भारत सरकार ने आपसी सहयोग से गुप्तचर विभाग के अधिकारियों को ऐसे संदिग्ध लोगों की सूची तैयार करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने दोनों देशों की नागरिकता ली हों अथवा जिन्होंने फर्जी दस्तावेज के सहारे नागरिकता हासिल की हो। नेपाल के तराई जिलों में इसकी जांच तेज कर दी गई है। जांच से भारतीय सीमा से सटे नवलपरासी, नवलपुर, कपिलवस्तु व रूपन्देही जनपद के लाखों लोगों में हडक़ंप की स्थिति है। वैसे, नेपाल में नागरिकता को लेकर विवाद 1997 में भी उठा था। तब नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने मामलों का संज्ञान लेते हुए नवलपरासी जिले में मधेशी लोगों को नेपाली नागरिकता देने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद नवलपरासी के चार सौ ऐसे लोगों की नेपाली नागरिकता रद्द हुई थी, जिनके पास भारतीय नागरिकता भी थी।

दरअसल, उत्तरखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार से सटे नेपाल के तराई इलाकों में लाखों भारतीय नेपाली नागरिकता लेकर कारोबार कर रहे हैं। लाखों ऐसे लोग हैं, जो नेपाल के साथ ही भारत के भी नागरिक हैं। दोहरी नागरिकता वाले ये वोटर सिद्धार्थनगर, महराजगंज में बार्डर से सटे इलाकों में विधानसभा और लोकसभा चुनाव तक को प्रभावित करते हैं। महराजगंज से भाजपा सांसद पंकज चौधरी करीबी भी दोहरी नागरिकता के जाल में फंस चुके हैं। सीमावर्ती जिलों में रह रहे दोहरी नागरिकता वाले दोनों देशों के तकरीबन 50 हजार लोग दोनों देशों में होने वाले छोटे-बड़े चुनाव को भी प्रभावित करते हैं। खुली सीमा के चलते इस कार्य में उन्हें बहुत मुश्किल भी नहीं होती है। हाल के वर्षों में संपन्न हुए नेपाल के संविधान सभा चुनाव व भारत के लोकसभा चुनाव में भी इनमें से अधिकतर ने वोट डाले थे। नौतनवां के गोल्डी सरदार भारत के साथ नेपाल के भी नागरिक हैं। भैरहवा में उनकी दुकान है। गोल्डी कहते हैं कि पिछले 50 वर्षों से परिवार नेपाल में कारोबार कर रहा है। अब कड़ाई के बाद काफी चिंता हो रही है।

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रोटी-बेटी संबंध पर संकट

भारत और नेपाल के लोगों के बीच रोटी-बेटी का संबंध रहा है। नेपाली लड़कियों की भारत में तो भारतीय लड़कियों की नेपाली पुरुषों से शादी आम बात है। नेपाल में नए संविधान की घोषणा के बाद दोहरी नागरिकता को लेकर कड़ाई हुई है। नेपाली नागरिकों से शादी करने वाली महिलाओं की नागरिकता का मुद्दा तराई-मधेशी आन्दोलन के दौरान काफी उठा था। जिसके बाद सरकार ने तय किया था कि नेपाली पुरुषों से शादी करने वाली 3,672 भारतीय महिलाओं को इस हिमालयी देश की नैसर्गिक नागरिकता मिलेगी। इसके साथ ही तराई के 20 जिलों में ब्याही गईं हजारों लड़कियों को नेपाली नागरिकता मिलने की कवायद चल रही है। इसके पहले नेपाल में बतौर सांसद निर्वाचित 12 सदस्यों पर झूठा शपथ पत्र लगाकर नेपाली नागरिकता हासिल करने का आरोप लग चुका है।

नेपाली सांसद के रूप में निर्वाचित महेंद्र कुमार मिश्रा, अनिल कुमार मिश्रा और सतीश कुमार मिश्रा ने नेपाल-भारत सीमा पर स्थित रूपन्देही जिले में नागरिकता प्राप्त की थी। भैरहवा में मेडिकल स्टूडेंट शक्ति गुरुंग कहते है कि नागरिकता बेहद संवेदनशील मुद्दा है। सिर्फ कारोबार और अन्य लाभ के लिए किसी देश की नागरिकता लेने वालों को उस देश के प्रति वह सम्मान नहीं होता है, जिसकी उम्मीद की जाती है। दोहरी नागरिकता वालों को हरहाल में देश से बाहर किया जाना चाहिये। दोहरी नागरिकता वालों को तय करना होगा कि वह कहां का खाएंगे, और कहां का गाएंगे।

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छोड़नी होगी भारतीय नागरिकता

नेपाल में नए नियम के बाद अब अगर भारतीय महिला नेपाल में शादी करती है तो उसे भारतीय नागरिकता छोडऩी होगी। नेपाल सरकार की दलील है कि नियम इसलिए सख्त किए गए क्योंकि ऐसी लाखों भारतीय महिलाएं नेपाल में हैं, जिन्होंने शादी करके चुपचाप दोहरी नागरिकता ले रखी है। दोनों मुल्कों के पास सही रिकार्ड न होने के कारण उन्हें इनकी जानकारी भी नहीं। इस स्थिति से निपटने के लिए ही नए नियम जारी किए गए। बहरहाल, नए नियम के अनुसार, अब भारतीय महिला को नेपाल के नागरिक से विवाह करने पर नए नागरिकता कानून-2063 के तहत नेपाल सरकार से पंजीकृत समाचार पत्र-पत्रिका में विवाह की सार्वजनिक सूचना जारी करनी होगी। साथ ही विवाहिता को भारत का मतदाता पत्र व अन्य लाइसेंसी कागजात निरस्त कराने पड़ेंगे। यह प्रक्रिया पूरी करने के बाद नेपाल की नागरिकता के लिए आवेदन किया जा सकेगा। कपिलवस्तु के प्रमुख जिला अधिकारी विष्णु ढकाल ने बताया कि नेपाली नागरिक से विवाह करने वाली भारतीय लड़कियों को सार्वजनिक घोषणा और निरस्तीकरण के बाद नगर पंचायत व ग्राम पंचायत से प्रमाणित प्रति के साथ आवेदन करना होगा। इसके बाद जिलाधिकारी कार्यालय से भारतीय बेटियों को नागरिकता मिल सकेगी।

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पहले आसान था नागरिकता लेना

नेपाल में अभी तक नागरिकता बड़ी आसानी से मिल जाती थी। सिर्फ नगर और ग्राम पंचायतों के प्रमाणित करने भर से नेपाल की नागरिकता मिल जाती थी। समाचार पत्रों के माध्यम से शादी की सूचना सार्वजनिक नहीं करनी पड़ती थी। नेपाल के मधेस क्षेत्र में अधिकतर हिंदी भाषी लोग रहते हैं। आलम यह है कि लगभग हर चौथे घर में एक भारतीय बहू है। यहां के परिवार भारत के उत्तराखंड व नेपाल की सीमा से सटे यूपी के इलाकों में शादी करते हैं। अब इस नए नियम से लोग असमंजस में हैं। दोहरी नागरिकता होने पर यह दोनों देशों में सहूलियत से रह पाते थे। अब जानकारी सार्वजनिक करने से लिखित तौर पर रिकॉर्ड दर्ज हो जाएगा। इन्हें भारत में मिलने वाली तमाम छूट नहीं मिलेगी।

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पुरानी खामियों को भी सुधार रही नेपाल सरकार

प्रवासी भारतीय से जन्मसिद्ध नागरिकता प्राप्त कर नेपाली बने पांच लाख लोगों के हित में बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था। न्यायाधीश चैलेश्वर राणा की पांच सदस्यीय खण्डपीठ ने कहा था कि जन्मसिद्ध नागरिकता प्राप्त करने वाले नेपाली नागरिक की संतान को वंशज नागरिकता मिलनी चाहिए। अब गृह मंत्रालय ने आदेश जारी कर दिया है। इससे पहले मधेश के करीब पांच लाख नेपाली नागरिकों की संतानें नागरिकता विहीन थीं। नागरिकता नहीं होने के कारण वे नेपाल सरकार की नौकरी, मताधिकार से वंचित थे। पासपोर्ट नहीं बनने से विदेश भी नहीं जा सकते थे। नेपाल में भारतीयों को नागरिकता मुश्किल नहीं रहा है। भारतीय नागरिक जो 15 वर्ष से अधिक समय तक नेपाल में स्थायी रूप से रहते थे, उन्हें जन्म सिद्ध नागरिकता प्राप्त हो जाती थी।