जब WHO पर हावी है चीन, तो कैसे पता चलेगा कोरोना का स्रोत

डब्लूएचओ ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जांच के लिए महामारी के ग्राउंड जीरो यानी वुहान में विशेषज्ञों का एक दल भेजा है। ये दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब चीन ने आठ महीने में पहली बार कोरोना वायरस से पहली मौत दर्ज की है।

Published by Vidushi Mishra Published: January 17, 2021 | 6:28 pm
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फोटो-सोशल मीडिया

नीलमणि लाल

लखनऊ। कोरोना वायरस कहाँ से पैदा हुआ और इंसानों में कैसे पहुंचा ये गुत्थी अभी तक सुलझ नहीं पाई है। वैसे तो सब जानते हैं कि कोरोना वायरस चीन के वुहान से निकला और वहीँ किसी इनसान के शरीर में घुसा था लेकिन ये सब हुआ कैसे ये रहस्य है जिसपर से पर्दा उठाने की कोशिशें अभी तक नाकाम रहीं हैं। डब्लूएचओ या विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस मामले में इस हद तक ढिलाई और लापरवाही बरती है कि उस पर चीन से मिले होने के आरोप लगे हैं।

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कोरोना वायरस कैसे फैला

डब्लूएचओ ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जांच के लिए महामारी के ग्राउंड जीरो यानी वुहान में विशेषज्ञों का एक दल भेजा है। ये दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब चीन ने आठ महीने में पहली बार कोरोना वायरस से पहली मौत दर्ज की है।

चीन के वुहान में 10 शोधकर्ताओं की एक वैश्विक टीम पहुंची है जो यह जांच करेगी कि कोरोना वायरस कैसे फैला।फिलहाल तो टीम को 14 दिन के क्वारंटाइन में रखा गया है और उसके बाद ही वह अपने काम में जुट सकेगी। शुरूआत में तो चीन अपने यहां जांच करने के लिए टीम को नहीं आने देना चाह रहा था लेकिन वैश्विक दबाव के बाद उसे सहमति देनी पड़ी।

महीनों तक शी जिनपिंग की सरकार ने जांच दल को आने से रोकने के तमाम कूटनीतिक हथकंडे अपनाए थे। अब भी चीनी सरकार के अनुसार टीम को चीनी वैज्ञानिकों के साथ विचार आदान प्रदान करने का मौका मिलेगा, लेकिन टीम को सबूत जुटाने की इजाजत होगी या नहीं ये अभी नहीं बताया गया है।

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बहुत मुमकिन है कि टीम को सबूत जुटाने की इजाजत ही न दी जाए चीनी सरकार के अनुसार टीम को चीनी वैज्ञानिकों के साथ विचार आदान प्रदान करने का मौका मिलेगा, लेकिन टीम को सबूत जुटाने की इजाजत होगी या नहीं ये अभी नहीं बताया गया है। वैसे भी साल भर बाद कोई सबूत बचे भी होंगे इसमें शक है।

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चीन ने किया है गुमराह

वैज्ञानिकों को शक है कि चीन के वुहान प्रांत से चमगादड़ या अन्य जानवरों से वायरस इंसानों तक फैला जिसके कारण लाखों लोग मारे जा चुके हैं। चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी उन आरोपों को एकदम गलत बताती है कि उसने बीमारी को फैलने दिया। इसके बदले पार्टी का कहना है कि वायरस विदेश से आया था, मुमकिन हो आयात किए हुए समुद्री भोजन से, लेकिन वैज्ञानिक इसे मानने से इनकार करते आए हैं।

चीनी सरकार ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर भ्रम पैदा करने की पूरी कोशिश की है। उसने साजिश के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया जैसे कि वायरस खराब समुद्री भोजन से फैला होगा।

चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग के अधिकारी मी फेंग ने अब कहा है कि डब्ल्यूएचओ को अन्य स्थानों पर भी इसी तरह की जांच करने की आवश्यकता है। डब्ल्यूएचओ टीम के सदस्य काफी पहले जाने वाले थे लेकिन चीन ने ऐन वक्त पर उन्हें वैध वीजा नहीं दिया।

corona test
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डब्लूएचओ ने चीन के सामने घुटने टेके

न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक जांच में पता किया है कि कि तरह डब्लूएचओ ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति पता करने के क्रम में चीन के सामने घुटने टेक दिए। इस संगठन ने चीन की जिनपिंग सरकार को पूरा मौक़ा दिया कि वह वायरस की उत्पत्ति के अलावा उसका प्रसार तत्काल रोकने में अपनी विफलता को छिपा सके।

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अखबार ने डब्लूएचओ के आन्तरिक दस्तावेजों की जांच के साथ अधिकारियों से बातचीत में पता लगाया है कि किस तरह चीन को खुश करने में डब्लूएचओ लगा रहा। डब्लूएचओ कोशिश करता रहा कि वह चीन को खुश करके वायरस की उत्पत्ति की जांच में सहयोग हासिल कर ले लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

संगठन की कमजोरी का फायदा उठाते हुए चीन ने अपना काम बखूबी निकाल लिया। चीन ने कोरोना वायरस की उत्पत्ति संबंधी महत्वपूर्ण रिसर्च को लटकाने में सफलता हासिल की और वायरस से निपटने में अपने कमजोर प्रयासों की समीक्षा नहीं होने दी।

चीन वैसे पहले फ़ैली बीमारियों के बारे में भी बातें छिपाता रहा है। 2002 में जब सार्स बीमारी फ़ैली थी तब भी चीन ने किसी को जांच नहीं करने दी।बहुत बाद में अंतर्राष्ट्रीय टीमों को सार्स वायरस के सरतो की जांच के लिए आने की अनुमति दी गयी। उस जांच का कामकाज भी बहुत गुप्त रखा गया था।

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डब्लूएचओ के मुखिया की संदेहास्पद भूमिका

चीन और कोरोना वायरस की जांच के बारे में डब्लूएचओ के डायरेक्टर जनरल तेद्रोस अधानोम घेब्रियस की भूमिका बहुत ढुलमुल रही है। जब जनवरी 2020 में वुहान में कोरोना संक्रमण के ढेरों मामले आने लगे थे तब घेब्रियस ने चीन के प्रेसिडेंट जिनपिंग से मुलाकात की। मुलाकात का उद्देश्य ‘एक समझौता करना’ बताया गया था।

इस मुलाकात से हफ्ता भर पहले डब्लूएचओ की एक टीम वुहान का दौरा कर चुकी थी लेकिन वह सीफ़ूड मार्केट और संक्रामक रोगों के सबसे बड़े अस्पताल नहीं गयी थी। इन जगहों को क्यों नहीं देखा गया इसका कोई जवाब नहीं है। घेब्रियस ने इस मसले पर कोई हल्ला भी नहीं मचाया।

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उलटे वो जिनपिंग के सामने याचक की मुद्रा में आ गये। घेब्रियस ने कोशिश की कि जिनपिंग इंटरनेशनल एक्सपर्ट्स की बड़ी टीम को वायरस का स्रोत पता करने के इजाजत दे दें लेकिन जिनपिंग ने साफ़ कर दिया कि उनको किसी कि मदद की जरूरत नहीं है। लेकिन जिनपिंग ने डब्लूएचओ को स्थिति की ‘निष्पक्ष और तर्कपूर्ण’ समीक्षा करने की अनुमति दे दी।

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फैसले के पीछे चीन का हाथ

घेब्रियस इसके हफ्ता भर पहले कोरोना वायरस बीमारी को अंतर्राष्ट्रीय इमरजेंसी घोषित करने के खिलाफ निर्णय ले चुके थे। अब जांच में पता चला है कि घेब्रियस के इस फैसले के पीछे चीन का हाथ था।

जिनीवा में चीन के राजदूत ने दोटूक कह दिया था कि अगर डब्लूएचओ ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी तो चीन इसे एक तरह का ‘अविश्वास’ प्रस्ताव मानेगा। घेब्रियस को सलाह देने वाली कमिटी के सामने चीन ने ऐसा डेटा प्रसुत किया जिससे लगता था कि चीन में स्थिति पूरी तरह कंट्रोल में है।

इसके बाद घेब्रियस ने सार्वजनिक तौर पर जिनपिंग और चीन की प्रशंसा की कि उन्होंने बीमारी का बहुत जल्दी पता लगा लिया और उसे कंट्रोल कर लिया। यानी डब्लूएचओ ने चीन के सिस्टम को पूरी तरह न स्वीकार किया बल्कि उसकी तारीफ कर दी। जबकि असलियत ये थी कि चीन महामारी को पकड़ पाने में नाकामयाब रहा था और इसी नाकामयाबी की वजह से वायरस और बीमारी अन्य देशों में फैलती चली गयी।

हालात खराब होते चले जाने के बावजूद डब्लूएचओ के प्रमुख घेब्रियस चीन की तारीफ करना जारी रखे और यहाँ तक कह दिया के वे तो ऐसा बार बार करेंगे क्योंकि ‘चीन द्वारा उठाये गए क़दमों से वायरस अन्य देशों में नहीं फ़ैल सका।‘ हालत बहुत ख़राब होने पर घेब्रियस ने 30 जनवरी को इमरजेंसी घोषित तो की लेकिन चीन के खिलाफ चुप्पी साधे रखी और जांच के कोई भी गंभीर प्रयास नहीं किये।

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