लिपुलेख पर ऐसे ही नहीं बौखलाया नेपाल

भारत के बार्डर रोड ऑर्गनाइज़ेशन ने घटियाबगढ़ और लिपुलेख के बीच 80 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण 17 अप्रैल को पूरा कर दिया था। ये सड़क चीन से लगी नियंत्रण रेखा तक जाती है। ये सड़क 17 हजार फुट की ऊंचाई पर लिपुलेख दर्रे तक है

Published by suman Published: May 22, 2020 | 11:02 pm
Modified: May 22, 2020 | 11:06 pm

तेज प्रताप सिंह

गोंडा कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए भारत के साथ ही नेपाल में भी लॉकडाउन चल रहा है। दुनिया भर में फैली कोरोना बीमारी से नेपाल में भी कारोबार ठप है। लॉकडाउन के कारण भारतीय पर्यटक नेपालगंज समेत नेपाल के अनेक स्थानों पर चल रहे होटल, रिर्जाट और कैसिनो आदि में नहीं जा पा रहे हैं। इसके अलावा मई से सितंबर तक चलने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा रद हो जाने से नेपालगंज के होटलों, पर्यटन उद्योग, कैसिनो और ट्रैवल एजेंसियों की आर्थिक नींव चरमरा गई है। एक अनुमान के अनुसार अब तक 11 हजार से अधिक भारतीयों ने होटलों की बुकिंग रद करायी है।

नेपालगंज बना बड़ा सेंटर

नेपाल होटल व्यवसायी महासंघ प्रदेश पांच के अध्यक्ष भास्कर काफ़्ले बताते हैं कि भारत के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रियों के आगमन के चलते पिछले कई वर्षों से नेपालगंज का महत्व बहुत बढ़ गया था। जिससे इस क्षेत्र में होटलों और कैसीनो कि भरमार हो गई थी। एसोसिएशन आफ कैलाश मानसरोवर ट्रेवल एंड ट्रैकिंग एजेंट आपरेटर्स नेपाल के पूर्व अध्यक्ष तेन्जिन नोर्बू लामा के अनुसार नेपाल सरकार की सड़क निर्माण की ढिलाई के कारण हमने तकरीबन 10 लाख भारतीय पर्यटक एवं तीर्थयात्रियों को खो दिया है। ये लोग नेपाल होते हुये तिब्बत तक की मानसरोवर यात्रा करते थे। इसकी वजह से नेपाल के होटलों, ट्रैवल एजेंसियों तथा नेपाल में पर्यटन उद्योग पर इसका बुरा असर पड़ेगा। लामा के अनुसार भारतीय तीर्थयात्री नेपाल में तीर्थ यात्रा भी करते हैं तथा यहां के होटलों के कैसीनो का भी आनंद लेते हैं।

1960 में तातोपानी तथा 1993 में हिलसा नामक दो नाकों को तीर्थयात्रियों के लिए चिन्हित किया गया था। लेकिन इन मार्गों के निर्माण सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ गया। गए। अब भारत ने नये रास्ते लिपुलेख का निर्माण खुद ही कर लिया है तो भारतीय तीर्थयात्री नेपाल क्यों आएंगे।

 

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नेपाल जता रहा विरोध

लॉकडाउन के बीच रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा 8 मई को लिपुलेख पास रोड का उद्घाटन किया गया। तभी से नेपाल सरकार और वहां के लोग ग़ुस्से में हैं। नेपाल के विभिन्न राजनीतिक संगठन भी विरोध कर रहे हैं। हाल में ही नेपालगंज में कई राजनीतिक दलों ने प्रदर्शन किया और भारत विरोधी नारे लगाए। नेपाल का कहना है कि लिपुलेख नेपाल का हिस्सा है। जबकि भारत ने नेपाल के विरोध और आरोपों को यह कहकर ख़ारिज कर दिया है कि लिपुलेख पूरी तरह से भारतीय सीमा में है।

दुर्गम यात्रा से मिली निजात

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में 80 किमी लम्बे धारचुला-लिपुलेख पास मार्ग का निर्माण कर मोदी सरकार ने हजारों भारतीयों को कैलाश मानसरोवर की दुर्गम यात्रा से निजात दिलाई है। वहीं भारत सरकार की इस कूटनीति से नेपाल की अर्थव्यवस्था को करारा झटका लगा है। नेपाल के विरोध की जड़ में आर्थिक मसला है। नेपाल के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा बंद हो जाने से नेपालगंज के होटलों, पर्यटन उद्योग, कैसिनो और ट्रैवल एजेंसियों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। कोरोना वायरस और मार्ग बदल जाने से हजारों भारतीय पर्यटकों, तीर्थयात्रियों ने नेपाल के होटलों और ट्रैवल एजेंसियों की बुकिंग निरस्त करके करारा झटका दिया है।

नेपाल के रास्ते कैलाश मानसरोवर

वैसे तो पूरे साल नेपाल में देश विदेश से लाखों की संख्या में पर्यटक आते हैं। इसमें ज्यादा संख्या में भारतीय होते हैं। पर्यटन ही नेपाल के लोगों के आय का मुख्य साधन है। हिंदुओं का पवित्र तीर्थस्थल कैलाश मानसरोवर तिब्बत में है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा प्रति वर्ष मई से लेकर सितंबर तक होती है। अभी तक के यात्री रुपईडीहा होते हुए नेपाल के बाद तिब्बत के लिए जाते थे। वैसे तो कैलाश मानसरोवर के लिए तीन रास्ते हैं लेकिन 60 फीसदी तीर्थयात्री लखनऊ से देवीपाटन मंडल में बहराइच जिले के रुपईडीहा बाजार होते हुए बांके जिले के नेपालगंज, सिमीकोट, हिलसा, दीरापुक गोम्पा और डोलपा से कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते थे। यात्रा में हजारों यात्री हेलिकाप्टर और नेपाली विमानों के जरिए नेपाल के उत्तर पश्चिम में कर्णाली प्रांत में स्थित हुमला जिले में भगवान शिव के दर्शन भी करते थे। नेपाली विमानों का भाड़ा पंद्रह हजार तथा हेलीकाप्टर का किराया भारतीय मुद्रा में 25 हजार लिया जाता था। इस काम में नेपाल की 7 हेलीकाप्टर कंपनियों का इस्तेमाल किया जाता था। कुल मिलाकर भारतीय यात्री नेपाल तक यात्रा व होटलों आदि में अच्छी खासी रकम खर्च करते थे।

नेपाल को आर्थिक झटका

नेपाल के छोटे बड़े लगभग 200 होटलों व ट्रैवल एजेंसियों को भारतीय नागरिकों से ही करोड़ों में आमदनी होती है। इसके अलावा तीन कैसिनो की कमाई करोड़ों में है। बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार भी मिलता रहा है। नेपाल की आमदनी का मुख्य स्रोत या तो भारतीय टूरिस्ट हैं या फिर भारतीय उत्पाद से वसूले गया कस्टम शुल्क है।

 

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समय और धन की बचत

लिपुलेख की इस सड़क को कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले हिंदू, बौद्ध और जैन तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बनाया गया है। भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया था कि  इस सड़क की मदद से कैलाश मानसरोवर की यात्रा महज एक हफ़्ते में की जा सकेगी। पहले इसमें दो-तीन हफ़्ते लगते थे।

एक अनुमान के अनुसार कैलाश मानसरोवर यात्रा पर एक भारतीय तीर्थयात्री तकरीबन दो से तीन लाख रुपये खर्च करता है। जिसमें 30 प्रतिशत रकम नेपाल में खर्च होती है और लगभग 60 प्रतिशत रकम हवाई यात्रा पर खर्च होती है। अब ये खर्च केवल एक से डेढ़ लाख रुयाए ही आएगा। इससे जहां भारतीयों को आर्थिक लाभ मिलेगा वहीं समय की भी बचत होगी। भारत सरकार के इस कदम से अब भारतीय तीर्थयात्री कैलाश मानसरोवर यात्रा लगभग 80 प्रतिशत भारतीय भू-भाग से ही करेंगे।

बढ़ी तल्खी

भारत और नेपाल के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है। नेपाली सरकार ने 20 मई को देश का एक नया विवादित नक्शा जारी किया जिसमें लिपुलेख, कालापानी, लिंपियाधुरा के भारतीय क्षेत्रों को अपना बताया गया है। इस महीने की शुरुआत में नेपाली राष्ट्रपति बिध्या देवी भंडारी ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा था कि देश के नए नक्शे प्रकाशित किए जाएंगे और उसमें उन सभी क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा जिसे नेपाल अपना मानता है। उन्होंने कहा था कि लिपुलेख, कालापानी, लिंपियाधुरा नेपाल का हिस्सा हैं। और इन क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करने की दिशा में ठोस राजनयिक प्रयास किए जाएंगे। भारत को लगता है कि काठमांडू का वर्तमान रवैया नेपाल में बढ़ती चीनी दखल का परिणाम है। भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने नेपाल से विवाद पर कहा है कि अतीत में कभी ऐसी कोई समस्या नहीं हुई। संभव है कि वह किसी दूसरे के इशारे पर ऐसा कर रहा हो।

 

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वैसे मौजूदा विवाद नया नहीं है। 1816 में सुगौली संधि के तहत नेपाल के राजा ने कालापानी और लिपुलेख सहित अपने कुछ हिस्सों को ब्रिटिशों को सौंप दिया था। भारत ने इस संबंध में प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि नेपाल का इस तरह से नक्शे में बदलाव स्वीकार्य नहीं है।

लिपुलेख मामले से बौखलाए नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने कहा है कि भारत से आने वाला कोरोना वायरस संक्रमण चीन और इटली से आने वाले संक्रमण से अधिक घातक है। उन्होंने साथ ही देश में कोविड-19 के मामलों में बढ़ोतरी के लिए भारत से अवैध तरीके से प्रवेश करने वालों को जिम्मेदार ठहराया।

भारत के बार्डर रोड ऑर्गनाइज़ेशन ने घटियाबगढ़ और लिपुलेख के बीच 80 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण 17 अप्रैल को पूरा कर दिया था। ये सड़क चीन से लगी नियंत्रण रेखा तक जाती है। ये सड़क 17 हजार फुट की ऊंचाई पर लिपुलेख दर्रे तक है जहां से उत्तर दिशा में 97 किलोमीटर की दूरी पर कैलाश पर्वत स्थित है। लिपुलेख से दिल्ली की दूरी 750 किलोमीटर है जिसे 2 दिन में पूरा किया जा सकता है।