Gandhi Jayanti: गांधी को सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रेरणा मिली थी अमेरिकी दार्शनिक से

Gandhi Jayanti: सविनय अवज्ञा आंदोल की प्रेरणा गाँधी जी को एक अमेरिकी लेखक व दार्शनिक हेनरी डेविड थोरो से मिली थी। इस विचार को मजबूती थोरो को पढ़ने के साथ साथ मिली थी।

Written By :  Neel Mani Lal
Published By :  Shreya
Update: 2021-10-02 06:12 GMT

हेनरी डेविड थोरो - महात्मा गांधी (फोटो साभार- सोशल मीडिया) 

Gandhi Jayanti: महात्मा गांधी के सत्याग्रह (Mahatma Gandhi Satyagraha) को पूरी दुनिया ने अपनाया। आज भी आन्दोलन और विरोध का यह तरीका प्रासंगिक है। लेकिन सविनय अवज्ञा आंदोलन (Savinay Avagya Andolan) की प्रेरणा गाँधी जी को एक अमेरिकी लेखक व दार्शनिक हेनरी डेविड थोरो (Henry David Thoreau) से मिली थी। 

हालाँकि गांधी को अहिंसक आन्दोलन (Mahatma Gandhi Ahinsa Andolan) और सत्याग्रह का विचार पहले से ही था। लेकिन इस विचार को मजबूती थोरो को पढ़ने के साथ साथ मिली। थोरो के लेख 'द ड्यूटी ऑफ़ सिविल डिसोबीडीएंस' (The Duty of Civil Disobedience) और 'लाइफ विदाउट प्रिंसिपल' (Life Without Principle) का गाँधी जी पर बहुत प्रभाव पड़ा था। थोरो ने 32 साल की उम्र में 1849 में ये लेख लिखे थे। गांधी जब अपने आंदोलनों के दौरान जेल में कैद थे तब उन्होंने हेनरी थोरो के निबंधों और पुस्तकों का काफी अध्ययन किया था।  

थोरो (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

थोरो के विचारों से प्रभावित रहा सत्याग्रह

गांधी जी ने साउथ अफ्रीका और बाद में भारत में जिस तरह का सत्याग्रह चलाया वह बहुत कुछ थोरो के विचारों से प्रभावित था। गाँधी जी के सत्याग्रह में विरोध प्रदर्शन, हड़ताल और टैक्स देने से मना करना जैसी चीजें शामिल थीं। इन्हीं सबके बारे में थोरो ने लिखा था। 

हेनरी डेविड थोरो अमेरिका में उस समय में हुए हैं, जब अमेरिका और मेक्सिको के बीच युद्ध के समर्थन में एक लहर सी चली हुई थी। लेकिन कुछ लोगों का मानना था कि एक कमजोर पड़ोसी मुल्क पर आक्रमण नहीं होना चाहिए। ऐसे विचार रखने वालों में अब्राहम लिंकन भी शामिल थे। उस समय वो प्रेसिडेंट नहीं बने थे। बल्कि इलिनॉय के प्रतिनिधि थे। उनका कहना था कि युद्ध अनैतिक होता है और स्वतंत्रता के प्रति अमेरिका के मूल्यों के विपरीत है। 

युद्ध विरोधियों में शामिल थे थोरो

हेनरी डेविड थोरो भी युद्ध विरोधियों में शामिल थे। थोरो एक लेखक, कवि और दार्शनिक थे। युद्ध की बात के विरोध स्वरूप ने अमेरिकी सरकार को टैक्स भरना बंद कर दिया। इसके लिए थोरो को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। थोरो ने फिर भी न तो टैक्स दिया और न जुरमाना भरा। उन्होंने जेल के भीतर से एक बयान जारी करके कहा कि मैं युद्ध को समर्थन देने से इनकार करता हूँ। लेकिन कुछ समय बाद थोरो ने एक रिश्तेदार ने उनको बिना बताये टैक्स और जुरमाना, दोनों भर दिए और थोरो रिहा हो गए। इसके बाद थोरो ने 'सिविल डिसओबीडीएंस' नमक निबंध लिखा। इसमें थोरो ने लिखा था कि जो कानून गलत और अन्यायपूर्ण है, उसका विरोध करना क्यों जरूरी है। उनका कहना था कि कोई भी कानून स्वविवेक से बढ़ कर नहीं हो सकता।

हेनरी थोरो ने कहा था- लोकतंत्र पर मेरी आस्था है, पर वोटों से चुने गये व्यक्ति स्वेच्छाचार करें मैं यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता। राजसंचालन उन व्यक्तियों के हाथ में होना चाहिए जिनमें मनुष्य मात्र के कल्याण की भावना और कर्तव्य-परायणता विद्यमान हो । जो उसकी पूर्ति के लिए त्याग भी कर सकते हों। उन्होंने कहा, हम ऐसी राज्य सत्ता के साथ कभी सहयोग नहीं करेंगे चाहे उसमे हमें कितना ही कष्ट क्योँ न उठाना पड़े।  

महात्मा गांधी (फोटो साभार- सोशल मीडिया) 

गांधी जी ने जेल में पढ़ा था निबंध

थोरो के निबंध के साठ साल बाद गाँधी जी ने साउथ अफ्रीका की जेल में वह निबंध पढ़ा था। उससे उनको और भी मजबूती मिली थी। थोरो सविनय-असहयोग आंदोलन के प्रवर्तक थे, उनका कहना था - अन्याय चाहे अपने घर में होता हो या बाहर, उसका विरोध करने से नहीं डरना चाहिए। कुछ न कर सको तो भी बुराई के साथ सहयोग तो करना ही नहीं चाहिए।

बुराइयाँ चाहे राजनैतिक हों या सामाजिक, नैतिक हों या धार्मिक, जिस देश के नागरिक उनके विरुद्ध खड़े हो जाते हैं, सविनय असहयोग से उसकी शक्ति कमज़ोर कर देतें है, वहां अमेरिका की तरह ही सामाजिक जीवन में परिवर्तन भी अवश्य होते हैं।

महात्मा गांधी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन की प्रेरणा हेनरी डेविड थोरो से प्राप्त हुई। उनकी प्रार्थना को गांधी जी 'प्रार्थनाओं की प्रार्थना' कहते थे। उनकी प्रार्थना थी - हे प्रभो ! मुझे इतनी शक्ति दे दो कि मैं अपने को अपनी करनी से कभी निराश न करूँ। मेरे हस्त, मेरी दृढ़ता, श्रद्धा का कभी अनादर न करें। मेरा प्रेम मेरे मित्रों के प्रेम से घटिया न रहे। मेरी वाणी जितना कहे - जीवन उससे ज्यादा करता चले। तेरी मंगलमय स्रष्टि का हर अमंगल पचा सकूँ, इतनी शक्ति मुझ में बनी रहे। 

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