Congress का सर्वव्यापी युग बनाम NDA का विस्तार: इतिहास, वर्तमान और आने वाला समय
BJP VS Congress News: कांग्रेस के सर्वव्यापी दौर से लेकर NDA के वर्तमान विस्तार तक—भारतीय राजनीति के बदलते समीकरण, इतिहास, वर्तमान और भविष्य का विश्लेषण।
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BJP VS Congress News: भारतीय राजनीति को समझने के लिए केवल आज की तस्वीर देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक लंबी नदी है, जिसमें कई मोड़ आते हैं। आज जो दृश्य सामने है—जहां भारतीय जनता पार्टी और उसका गठबंधन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन देश के बड़े हिस्से पर शासन कर रहा है—वह अचानक नहीं बना है। इसके पीछे एक लंबा ऐतिहासिक चक्र है। और इस चक्र का सबसे बड़ा उदाहरण खुद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वह दौर है, जब वह लगभग पूरे भारत पर शासन कर रही थी।लेकिन एरिया को अगर छोड़ दिया जाये तो भाजपा ने सबसे ज्यादा लोगों के वोट पाने और सबसे अधिक लोगों पर शासन करने का रिकार्ड बना कर दिखा दिया है।
आजादी के बाद भारत में लोकतंत्र की शुरुआत कांग्रेस के प्रभुत्व के साथ हुई। 1952 का पहला आम चुनाव केवल एक चुनाव नहीं था। बल्कि यह स्वतंत्र भारत के राजनीतिक ढांचे की नींव था। उस समय कांग्रेस एक पार्टी नहीं थी। वह स्वतंत्रता आंदोलन का विस्तार थी। गांव से लेकर दिल्ली तक उसका नेटवर्क था। उसके पास नेतृत्व का ऐसा समूह था, जो वैचारिक, नैतिक और संगठनात्मक रूप से बेहद मजबूत था। जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस ने न केवल केंद्र में बल्कि लगभग हर राज्य में सरकार बनाई। 1952, 1957 और 1962—तीनों चुनावों के बाद स्थिति यह थी कि भारत के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार थी। उस समय राज्यों की संख्या कम थी। लेकिन जो भी राज्य थे, उनमें से 85 से 90 प्रतिशत में कांग्रेस का सीधा शासन था। यह केवल चुनावी जीत नहीं थी, यह राजनीतिक वर्चस्व था।पर इस दौर में इस उपलब्धि के पीछे आज़ादी का जोश व रंग का भी असर कहा जाना चाहिए ।
उस दौर को राजनीतिक विश्लेषक ‘कांग्रेस सिस्टम’ कहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं था कि विपक्ष नहीं था। बल्कि यह कि विपक्ष प्रभावी नहीं था। कांग्रेस के भीतर ही कई विचारधाराएं थीं। वही आंतरिक बहस देश की राजनीति को दिशा देती थी। यानी कांग्रेस खुद एक तरह से ‘पूरी राजनीति’ थी। यदि आज NDA 18–20 राज्यों में है, तो उस समय कांग्रेस लगभग पूरे देश में थी—और वह भी बिना किसी बड़े गठबंधन के।पर राज्यों की संख्या के मामले में भाजपा की बढ़त कांग्रेस से कहीं आगे कही जायेगी।
लेकिन राजनीति में स्थायित्व एक भ्रम है। 1967 वह साल था जब पहली बार कांग्रेस के इस प्रभुत्व को गंभीर चुनौती मिली। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं। यह घटना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी, यह उस मिथक का टूटना था कि कांग्रेस अजेय है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस चुनौती ने भारतीय राजनीति को बहुदलीय बना दिया। अब क्षेत्रीय आकांक्षाएं खुलकर सामने आने लगीं।
हालांकि कांग्रेस का पतन तत्काल नहीं हुआ। इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनाव में भारी जीत हासिल की और 1972 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने फिर से अधिकांश राज्यों में सत्ता हासिल कर ली। यह कांग्रेस का दूसरा बड़ा उभार था। लेकिन इस बार स्थिति पहले जैसी नहीं थी। अब विरोध मौजूद था। वह धीरे-धीरे संगठित हो रहा था। आपातकाल ने इस विरोध को और तीखा कर दिया। 1977 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा। यह पहली बार था जब केंद्र में भी गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
फिर भी, कांग्रेस की वापसी की क्षमता कम नहीं थी। 1980 में वह फिर सत्ता में आई और 1984 में राजीव गांधीनके नेतृत्व में उसने ऐतिहासिक जनादेश प्राप्त किया। इस दौर में फिर से कांग्रेस का नियंत्रण देश के अधिकांश राज्यों पर था। लेकिन यह उसका अंतिम स्वर्ण काल था। क्योंकि इसी समय भारत की राजनीति में स्थायी बदलाव शुरू हो चुका था। क्षेत्रीय दल मजबूत हो रहे थे। आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम, तमिलनाडु में द्रविड़ दल, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा, पंजाब में अकाली राजनीति—इन सब ने कांग्रेस के लिए स्थायी चुनौती खड़ी कर दी।
1990 का दशक भारतीय राजनीति का टर्निंग पॉइंट था। मंडल, कमंडल, आर्थिक उदारीकरण—इन तीनों ने राजनीति का चरित्र बदल दिया। पी. वी. नरसिम्हा राव के समय आर्थिक सुधार हुए। लेकिन राजनीतिक रूप से कांग्रेस का विस्तार सीमित होता गया। इसी समय भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर उभरने लगी। 1998 और 1999 में उसने गठबंधन बनाकर सरकार बनाई। यह महत्वपूर्ण था, क्योंकि पहली बार कांग्रेस के अलावा कोई और दल स्थायी विकल्प बनकर सामने आया।
2004 से 2014 तक कांग्रेस ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के रूप में केंद्र की सत्ता संभाली। लेकिन यह वह कांग्रेस नहीं थी। जो कभी पूरे देश पर छाई हुई थी। यह एक गठबंधन की धुरी थी, जिसे क्षेत्रीय दलों के सहारे चलना पड़ता था। राज्यों में उसकी स्थिति मिश्रित थी। लगभग 10–12 राज्यों में ही कांग्रेस या उसके सहयोगी सत्ता में थे। यानी उसका वह पुराना सर्वव्यापी विस्तार अब इतिहास बन चुका था।
2014 के बाद भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP ने केवल केंद्र की सत्ता नहीं जीती। बल्कि राज्यों में भी तेजी से विस्तार किया। उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मजबूत पकड़ के साथ-साथ पूर्वोत्तर भारत में भी उसने अपना प्रभाव बढ़ाया। गठबंधन राजनीति को नए तरीके से साधते हुए NDA ने बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी सत्ता हासिल की। आज स्थिति यह है कि भारत के बड़े भूगोल पर या तो BJP की सीधी सरकार है या NDA गठबंधन की।
अब सवाल यही है कि क्या आज NDA का विस्तार कांग्रेस के पुराने प्रभुत्व जैसा है। जवाब थोड़ा संतुलित है। हां, यह विस्तार बहुत बड़ा है। यह 1990 के बाद पहली बार है जब कोई राजनीतिक धड़ा इतने व्यापक स्तर पर फैला हुआ है। लेकिन यह कांग्रेस के 1950–1980 के दौर जैसा पूर्ण प्रभुत्व नहीं है। उस समय कांग्रेस एक पार्टी के रूप में पूरे देश पर हावी थी। आज NDA एक गठबंधन है, जिसमें कई क्षेत्रीय दल शामिल हैं। उस समय विपक्ष कमजोर था। आज विपक्ष बिखरा हुआ जरूर है। लेकिन खत्म नहीं हुआ है। कई बड़े राज्य आज भी NDA के बाहर हैं।
फिर भी, यह कहना गलत नहीं होगा कि आज NDA ने भारत के राजनीतिक नक्शे पर वह स्थिति बना ली है, जो 1980 के बाद पहली बार देखने को मिली है। यह केवल चुनावी जीत का परिणाम नहीं है।बल्कि संगठन, नेतृत्व, संसाधन और रणनीति के संयोजन का परिणाम है। लेकिन इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि कोई भी प्रभुत्व स्थायी नहीं होता। कांग्रेस का भी नहीं था। वह भी धीरे-धीरे कमजोर हुई। और वही प्रक्रिया हर राजनीतिक शक्ति के साथ होती है।
भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत यही है। यहां सत्ता स्थायी नहीं होती। यहां जनता अंतिम निर्णायक होती है। और वह समय-समय पर अपने फैसले बदलती रहती है। आज NDA का विस्तार है, कल किसी और का हो सकता है। यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबसूरती है। पर यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि भाजपा का यह प्रभुत्व कांग्रेस से लंबा खींचता दिख रहा है।
क्योंकि देश में ‘स्थिर नेतृत्व’ को प्राथमिकता मिल रही है। गठबंधन तभी काम करता है जब ग्राउंड पर एकता हो। इसमें भाजपा का कोई सानी नहीं है। क्षेत्रीय दल अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। संगठन चुनाव का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। संगठन के मामले में दूर दूर तक कोई राजनीतिक दल भाजपा के आस पास नहीं बैठता है। साइलेंट वोटर अब चुनाव का निर्णायक फैक्टर है। जिसकी भाषा समझने का हुनर भाजपा नेताओं व रणनीतिकारों के पास हैं। यह भी साफ हुआ कि सिर्फ डेटा से चुनाव नहीं समझा जा सकता। सिर्फ नैरेटिव से भी नहीं। दोनों का संतुलन जरूरी है। इस संतुलन को साधने की माहिर फ़िलहाल भाजपा ही है। सीट-दर-सीट विश्लेषण का सवाल हो, ग्राउंड रिपोर्ट की बात हो, और ‘आख़िरी हफ्ते’ का मूड समझने की ज़रूरत इन तीनों को बाँचने की दक्षता भाजपा रणनीतिकारों के पास ही सबसे मुफीद रुप में उपलब्ध हैं। किसी भी चुनाव को पूर्वानुमान ग़लत होना असामान्य नहीं है।लेकिन उससे सीख न लेना बड़ी गलती होती है।इस बार की सबसे बड़ी सीख यही है—चुनाव अब और जटिल हो गए हैं।यह सिर्फ लहर या गठबंधन से तय नहीं होते।यह माइक्रो-मैनेजमेंट, धारणा और आख़िरी समय के मूड से तय होते हैं।इसकी भाजपा एक मात्र साधक राजनीतिक दल इन दिनों है।