शपथ ग्रहण से ठीक पहले बंगाल में इस्तीफों की सुनामी! दीदी के खास 'सिपहसालारों' ने छोड़ी कुर्सी, सचिवालय में मची भगदड़
West Bengal bureaucrats resign news: बंगाल में ममता बनर्जी की हार के बाद नौकरशाहों के इस्तीफों की झड़ी! अलापन बंद्योपाध्याय से लेकर बड़े अधिकारियों ने छोड़ा साथ, क्या BJP सरकार से पहले बदल रहा पूरा सिस्टम? जानिए पूरा घटनाक्रम।
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West Bengal bureaucrats resign news: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय जो हो रहा है, उसे 'महा-उथलपुथल' कहना भी कम होगा। एक तरफ निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी हार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न देने पर अड़ी हुई हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों ने जहाज डूबता देख किनारा करना शुरू कर दिया है। मंगलवार और बुधवार के बीच कोलकाता के 'नबन्ना' (सचिवालय) में इस्तीफों की ऐसी झड़ी लगी कि प्रशासन के गलियारों में सन्नाटा पसर गया। चुनाव के नतीजे आने के महज 24 घंटे के भीतर पूर्व मुख्य सचिवों से लेकर अर्थशास्त्रियों और सलाहकारों तक, सभी ने अपने पदों को तिलांजलि दे दी है।
नैतिकता का हवाला: अर्थशास्त्री और पत्रकारों ने छोड़ी कुर्सी
ममता बनर्जी द्वारा विभिन्न निगमों और समितियों में नियुक्त किए गए विशेषज्ञों ने सबसे पहले इस्तीफा सौंपा। जाने-माने अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार, जो पश्चिम बंगाल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (WBIDC) के अध्यक्ष थे, उन्होंने मंगलवार को ही अपना पद छोड़ दिया। उन्होंने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि भले ही वह राजनीतिक व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति ममता बनर्जी ने की थी और अब चूंकि वह चुनाव हार गई हैं, इसलिए पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उनके साथ ही राज्य के सूचना विभाग में तैनात मीडिया सलाहकारों और पूर्व पत्रकारों ने भी अपने इस्तीफे भेज दिए हैं। इन अधिकारियों का मानना है कि नई सरकार आने से पहले खुद हट जाना ही सम्मानजनक है।
अलापन बंद्योपाध्याय: विवादों से इस्तीफे तक का सफर
इस्तीफा देने वालों में सबसे बड़ा नाम पूर्व मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय का है। अलापन वही अधिकारी हैं जिन्हें लेकर 2021 में केंद्र और राज्य सरकार के बीच 'तलवारें' खिंच गई थीं। प्रधानमंत्री की बैठक में शामिल न होने पर जब केंद्र ने उन्हें दिल्ली तलब किया था, तब ममता बनर्जी ने उन्हें सेवानिवृत्त कराकर अपना 'मुख्य सलाहकार' बना लिया था। मंगलवार को अलापन ने भी राज्य के मुख्य सचिव को अपना इस्तीफा भेज दिया। उनके साथ ही पूर्व मुख्य सचिव एच.के. द्विवेदी और मनोज पंत ने भी सलाहकार के पदों से हाथ खींच लिए हैं। ये वे चेहरे थे जो ममता बनर्जी के शासनकाल में पर्दे के पीछे से पूरी सरकार चलाते थे।
एडवोकेट जनरल और कानूनी टीम ने भी थमाया इस्तीफा
प्रशासनिक अधिकारियों के बाद अब कानूनी मोर्चे पर भी ममता सरकार को झटका लगा है। राज्य के एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता ने भी राज्यपाल आर.एन. रवि को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। दत्ता 2017 से ही ममता सरकार के संकटमोचक रहे थे। इसके अलावा सचिवालय के सूत्रों का दावा है कि कई अन्य सेवानिवृत्त नौकरशाह, जो संविदा के आधार पर भारी-भरकम वेतन पर सलाहकार बने हुए थे, वे भी अपना बोरिया-बिस्तर समेट रहे हैं। अधिकारियों के बीच यह डर भी है कि अगर वे अभी नहीं हटे, तो आने वाली भाजपा सरकार उनके खिलाफ जांच या कड़े प्रशासनिक कदम उठा सकती है।
207 सीटों का 'प्रचंड कमल' और दीदी का इनकार
यह सारा घटनाक्रम उस चुनाव परिणाम के बाद शुरू हुआ है जिसमें भाजपा ने 294 में से 207 सीटें जीतकर बंगाल की सत्ता से टीएमसी को बेदखल कर दिया है। ममता बनर्जी की पार्टी महज 80 सीटों पर सिमट गई है। हालांकि ममता बनर्जी इसे चुनाव आयोग और भाजपा की मिलीभगत बता रही हैं और इस्तीफे से बच रही हैं, लेकिन उनके खुद के अधिकारियों का सामूहिक इस्तीफा यह साफ कर रहा है कि सत्ता का केंद्र अब बदल चुका है। 9 मई को भाजपा की नई सरकार के शपथ ग्रहण से पहले इन अधिकारियों का जाना यह संकेत है कि बंगाल में 'ममता युग' के प्रशासनिक ढांचे का अंत हो चुका है और अब एक नई व्यवस्था की शुरुआत होने वाली है।