Rugda of Jharkhand: क्या आपने कभी खाया है झारखंड का स्वस्दिष्ट वेज मटन, कीमत में असली मटन को देता है टक्कर
Rugda of Jharkhand: झारखंड के अलावा, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा में भी रुगड़ा पाया जाता है। इस वेट मटन की कीमत 400 से 500 रुपए प्रति किलो रहती है। इसके बेहतरीन स्वाद का अंदाज़ा आप इस तरह लगा सकते है कि इतनी ज्यादा कीमत होने के बावजूद लोग इसे बड़े शौक से खरीदते हैं।;
Rugda of Jharkhand (Image: Social Media)
Rugda of Jharkhand: सावन के पवित्र महीने में ज्यादातर लोग नॉन वेज नहीं खाते हैं। ऐसे में स्वाद का जायका कई बार लोगों को सावन के खत्म होने का इंतज़ार करवाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वाद में बिलकुल मटन की तरह लगने वाली एक सब्जी भी है। जी हाँ झारखंड में मिलने वाला बेहद प्रसिद्ध रुगडा जिसे वेज मटन के नाम से भी जानते हैं स्वाद में नॉन वेज को देता है टक्कर।
सावन के महीनों में ख़ासकर वेज मटन की बिक्री खूब हो रही है। नॉनवेज खाने वाले लोग श्रावण के माह में इस वेज मटन की खूब खरीदारी कर इसके स्वादिष्ट जायके का लुत्फ़ उठा रहे हैं। बता दें कि यह रुगडा या वेट मटन झारखण्ड में ही ज्यादातर मिलते हैं। और यही समय होता है जब यह मिलता है।
झारखंड के अलावा, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा में भी रुगड़ा पाया जाता है। इस वेट मटन की कीमत 400 से 500 रुपए प्रति किलो रहती है।
इसके बेहतरीन स्वाद का अंदाज़ा आप इस तरह लगा सकते है कि इतनी ज्यादा कीमत होने के बावजूद लोग इसे बड़े शौक से खरीदते हैं। इस वेज मटन को रुगड़ा के नाम से जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि रुगड़ा को झारंखड में वेट मटन के रुप में ही ज्यादातर जाना जाता है। इसका स्वाद एकदम मटन जैसा होता है। हालाँकि रुगड़ा दिखने में छोटे आकार के आलू की तरह होता है। और यह जमीन के भीतर पैदा होते है। सबसे ख़ास बात यह कि प्रोटीन से भरपूर रुगड़ा में कैलोरी और वसा की मौजूदगी नाम मात्र की होती है।
आपको बता दें कि रुगड़ा को अंडरग्राउंड मशरूम, सुखड़ी, पुटो , पुटकल आदि के नाम से भी जानते है। यह पूरी तरह से एक शाकाहारी व्यंजन है। ख़ास बात यह है कि इसकी उपज बिलकुल प्राकृतिक तौर पर होती है यानी इसकी खेती नहीं की जाती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक़ आकाशीय बिजली भी रुगड़ा उगाने में काफी मददगार होता है। ग्रामीणों की माने तो जितना बादल गरजेगा उतना ही ज्यादा रुगड़ा निकलता है।
बरसात में सिर्फ साल जंगल में ही मिलता है रुगड़ा
गौरतलब है कि रुगड़ा यानी वेज मटन सिर्फ बारिश के मौसम में ही मिलता है। इसकी पैदावार सिर्फ जमीन के भीतर ही होती है। जबकि ये सिर्फ साल जंगलों में मिलता है। ख़ास कर बरसात के मौसम में साल के जंगलों में साल वृक्षों के नीचे पड़ जाने वाली दरारों में पानी पड़ते ही रुगड़ा पनपना शुरु हो जाता है।
बता दें कि रुगडा ज्यादा दिनों तक चलता नहीं है यानी जंगल से चुनने के तीन से चार दिन के भीतर ही रुगड़ा खराब हो जाता है। उल्लेखनीय है कि ग्रामीण साल जंगलों से रुगड़ा को चुनकर कारोबारियों को बेचते हैं। फिर जहाँ से सभी कारोबारी शहरों में लाकर इसकी बिक्री कर देते हैं। रुगड़ा का स्वाद चख चुके लोगों को इसका इंतजार साल भर रहता है। चाहे वेजीटेरियन हो या नॉन वेजीटेरियन सभी लोगों को इसका बेहतरीन स्वाद बहुत भाता है। ख़ास तौर जब सावन के महीने में लोग नॉनवेज नहीं खाते हैं ऐसे में लोगों को रुगड़ा मिलने का विशेष रूप से इंतजार रहता है।
औषधि भी है रुगड़ा
जी हां , रुगड़ा सिर्फ स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। बता दें कि इसे रोगों की दवा भी माना जाता है। उल्लेखनीय है कि रुगड़ा के सेवन से लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसमें मौजूद प्रोटीन के अलावा विटामिन सी, विटामिन बी कांप्लेक्स, राईबोलेनिन, थाइमिन, विटामीन बी 12, विटामीन डी कैंसर जैसे घातक रोगों से बचाने और लडऩे में भी सहायक साबित होता है। रुगड़ा को वैज्ञानिक नाम लाइपन पर्डन से जाना जाता है।
बता दें कि यह मशरुम का ही एक प्रजाति है। जो यह जमीन के भीतर उगती है। गौरतलब है कि इससे जुडी हुई लगभग 12 प्रजातियां हैं। लेकिन सफेद रंग के रुगड़े को सर्वाधिक पौष्टिक माना जाता है। बता दें कि झारखंड के अलावा, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा में भी रुगड़ा पाया जाता है। लेकिन झारखंड में इसकी डिमांड सबसे ज्यादा होती है यहाँ इसे लोग वेट मटन के नाम से भी जानते हैं।
ग्रामीणों के रोज़गार का जरिया भी है रुगड़ा
बता दें कि बारिश के मौसम में रुगड़ा साल जंगलों के आस-पास रहने वाले ग्रमीणों के लिए एक रोजगार का साधन भी माना जाता है। उल्लेखनीय है कि जंगलों के आस-पास रहने वाले ग्रामीण झुंड बनाकर साल जंगल में जाकर जमीन के नीचे से रुगड़ा को चुनते हैं। इसके लिए ग्रामीण सुबह से ही रुगड़ा की तलाश में झुड बनाकर साल जंगलों में प्रवेश कर जाते हैं। चूँकि रुगड़ा की कीमत ज्यादा होती है इसलिए ग्रामीण इससे अच्छी - खासी आमदनी कर लेते हैं। गौरतलब है कि रुगड़ा झारखंड के रांची, पूर्वीं सिहभूम, खूंटी, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, चतरा समेत अन्य जिलों के साल जंगलों में बहुत ज्यादा रूप से पाया जाता है।