न NDA, न INDIA... मायावती का अपना ही रास्ता! महिला आरक्षण के बहाने कांग्रेस-BJP पर एक साथ 'सर्जिकल स्ट्राइक', समझिए कैसे

Mayawati on women reservation bill 2026: महिला आरक्षण पर मायावती का बड़ा दांव! न NDA के साथ, न INDIA के साथ- 33% आरक्षण का समर्थन, लेकिन 50% और ‘कोटे में कोटा’ की मांग से BJP-कांग्रेस दोनों पर एक साथ सर्जिकल स्ट्राइक। जानिए कैसे बसपा सुप्रीमो ने बदल दी सियासी बिसात।

Update:2026-04-17 10:38 IST

Mayawati on women reservation bill 2026: उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी सधी हुई चालों के लिए मशहूर बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती ने एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में हलचल पैदा कर दी है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा महिला आरक्षण विधेयक पर विशेष सत्र बुलाने के फैसले के बाद, मायावती ने जो रुख अख्तियार किया है, वह न तो पूरी तरह समर्थन है और न ही पूरी तरह विरोध। 15 अप्रैल को लखनऊ में मीडिया से रूबरू होते हुए उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक जाल बुना है, जिसने भाजपा और विपक्ष दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

33 प्रतिशत का समर्थन और 50 प्रतिशत की मांग

मायावती ने केंद्र सरकार के 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के कदम का स्वागत तो किया, लेकिन इसके साथ ही एक ऐसी मांग रख दी जो आने वाले समय में बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी लंबे समय से संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग करती रही है। मायावती का तर्क है कि महिलाओं की आबादी के अनुपात के हिसाब से उन्हें आधी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। यह मांग केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि एक व्यापक 'नैरेटिव' सेट करने की कोशिश है, जिससे वे खुद को महिलाओं के अधिकारों की सबसे बड़ी पैरोकार के रूप में पेश कर सकें।

कोटे में कोटा: सामाजिक न्याय का बड़ा दांव

मायावती के इस रुख का सबसे अहम हिस्सा 'कोटे में कोटा' की मांग है। उन्होंने साफ लहजे में चेतावनी दी कि यदि महिला आरक्षण के भीतर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए अलग से कोटा निर्धारित नहीं किया गया, तो यह आरक्षण अधूरा होगा। मायावती का मानना है कि बिना जातिगत बंटवारे के, वंचित वर्ग की महिलाएं फिर से हाशिए पर चली जाएंगी और इसका लाभ केवल संपन्न वर्ग की महिलाएं ही उठा पाएंगी। यह बसपा की पारंपरिक 'बहुजन' राजनीति का विस्तार है, जिसके जरिए वे दलित और पिछड़े वोटरों को यह संदेश दे रही हैं कि उनकी असली हितैषी वही हैं।

भाजपा का साथ और रणनीति में विरोध

मायावती का यह दांव उन्हें भाजपा के साथ भी खड़ा करता है और उनके खिलाफ भी। जहां वे बिल का समर्थन कर सरकार के प्रति 'सहयोगी रुख' दिखा रही हैं, वहीं कोटे की शर्त रखकर वे सरकार की नीतिगत कमियों को भी उजागर कर रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह 'बराबर दूरी' की नीति का हिस्सा है। मायावती न तो सत्ताधारी NDA के पाले में दिखना चाहती हैं और न ही विपक्षी INDIA गठबंधन का हिस्सा बनना चाहती हैं। वे अपनी एक अलग स्वतंत्र पहचान बनाए रखने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रही हैं।

कांग्रेस पर तीखा प्रहार और पुराने जख्म

अपने संबोधन में मायावती ने कांग्रेस को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कांग्रेस पर अवसरवादी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि उसे अब SC/ST महिलाओं के आरक्षण की याद आ रही है, जबकि दशकों तक सत्ता में रहने के दौरान उसने कभी इस दिशा में ठोस काम नहीं किया। यह हमला सीधे तौर पर कांग्रेस की वर्तमान रणनीति को कमजोर करने का प्रयास है, जो इन दिनों पिछड़ों और दलितों के हक की बात कर रही है। मायावती यह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि उनका कोर वोट बैंक कांग्रेस की ओर न खिसके।

आंबेडकर की विरासत और वैचारिक आधार

मायावती ने अपने बयान में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का जिक्र करते हुए इसे वैचारिक रूप से पुख्ता किया। उन्होंने याद दिलाया कि आंबेडकर ने ही महिलाओं को पुरुषों के समान मताधिकार देकर सामाजिक बराबरी की नींव रखी थी। इस संदर्भ का इस्तेमाल कर वे यह संदेश देना चाहती हैं कि बसपा की मांगें कोई चुनावी जुमला नहीं, बल्कि आंबेडकरवादी विचारधारा का अहम हिस्सा हैं। इससे वे अपनी पार्टी की जड़ों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।

चुनावी जमीन और भविष्य की निगरानी

उत्तर प्रदेश के पिछले कुछ चुनावों में बसपा की जमीन कुछ कमजोर हुई है। ऐसे में महिला आरक्षण जैसे राष्ट्रीय मुद्दे पर कड़ा और स्पष्ट स्टैंड लेना मायावती की एक सोची-समझी रणनीति है। वे जानती हैं कि महिला वोट बैंक अब किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है। 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग और पिछड़ी महिलाओं के हक की बात करके वे अपनी खोई हुई राजनीतिक प्रासंगिकता को वापस पाने का प्रयास कर रही हैं।

चेतावनी भरा समर्थन

अंत में, मायावती ने इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर संदेह जताकर एक 'वॉचडॉग' यानी निगरानीकर्ता की भूमिका अपना ली है। उनका यह कहना कि "देखना होगा कि क्या पिछड़ी महिलाओं को वास्तव में लाभ मिलेगा", सरकार के लिए एक चेतावनी है। कुल मिलाकर, मायावती ने महिला आरक्षण के बहाने सामाजिक न्याय की बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि वे भले ही गठबंधन की राजनीति से दूर हों, लेकिन वे एजेंडा सेट करने की कला आज भी बखूबी जानती हैं।

Tags:    

Similar News