…तो इसलिए ममता बनर्जी कर रहीं बांग्लादेशी घुसपैठियों का समर्थन

एनआरसी का पहला ड्राफ्ट जारी होने पर ममता बनर्जी ने भाजपा और केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा था कि इससे देश में गृह युद्ध छिड़ जाएगा।

ममता को किस बात का डर, बोलीं- BJP कर रही बदले की राजनीति
रामकृष्ण वाजपेयी

कोलकत्ता: नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी को लेकर प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने बहुत ही आक्रामक अंदाज में भाजपा व केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। वह कह रही हैं कि यह शर्म की बात है कि आजादी के 70 साल बाद हमें अपनी नागरिकता साबित करनी होगी। वह लोगों से साथ आने की अपील करते हुए कह रही हैं कि मैं नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ लड़ रही हूं। मेरे साथ आएं। लोकतंत्र को बचाने के लिए आगे आएं। पिछले 20 सालों में देश और राज्य के राजनीतिक माहौल को देखते हुए घुसपैठियों के मामले में ममता बनर्जी के स्टैंड में जबर्दस्त बदलाव आया है।

एनआरसी के मुद्दे पर ममता ने की थी गृह युद्ध की

2018 में एनआरसी का पहला ड्राफ्ट जारी होने पर ममता बनर्जी ने इस मामले में भाजपा और केंद्र सरकार पर राजनीतिक और विभाजनकारी होने का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि इससे देश में गृह युद्ध छिड़ जाएगा और देश खून में नहाएगा।

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ममता बनर्जी ने कहा था कि असम में क्या हो रहा है। एनआरसी केवल बंगालियों के लिए नहीं, यह अल्पसंख्यकों, हिन्दुओं, बिहारियों के लिए समस्या है। करीब चालीस लाख लोग जिन्होंने कल तक सत्तारूढ़ पार्टी को वोट दिया आज अचानक अपने ही देश में रिफ्यूजी बनाए जा रहे हैं।

कभी ममता को बांग्देलादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर मिला था भाजपा का साथ:

अब आते हैं 2005 में जब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार सत्ता में थी और उनकी चिर प्रतिद्वंद्वी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी प, बंगाल में शासन में थी। तब कोलकाता दक्षिण की सांसद ममता बनर्जी ने लोकसभा में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा जोरदारी से उठाया था। इस मामले में ममता को भाजपा का समर्थन मिला था जो उस समय विपक्ष में थी।

भाजपा के वरिष्ठ नेता स्व. अरुण जेटली ने एनआरसी को लेकर एक ट्विट में ममता बनर्जी का उल्लेख करते हुए लिखा था कि 4 अगस्त 2005 को ममता बनर्जी ने कहा था कि बांग्लादेशी घुसपैठिए आपदा बन गए हैं। उन्होंने कहा था, “बांग्लादेशी भारतीय नामों के जरिए मतदाता सूची में दर्ज हो रहे हैं। हमारे पास बांग्लादेशी और भारतीय दोनों वोटर लिस्ट है। यह बहुत गंभीर मामला है. आखिर सदन में कब चर्चा होगी।”

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हालांकि इस मामले पर चर्चा कराने का उनका प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने रद्द कर दिया था। इसके बाद गुस्से में तमतमाई ममता बनर्जी सदन के वेल में आ गई थीं उन्होंने न सिर्फ स्पीकर पर भेदभाव का इल्जाम लगाया था बल्कि नाराजगी और गुस्से में उन्होंने उस समय सदन की अध्यक्षता कर रहे डिप्टी स्पीकर चरणजीत सिंह अटवाल के ऊपर कागज फाड़कर फेंक दिया था। उन्होंने अपने इस्तीफे की घोषणा भी की थी। हालांकि स्पीकर  सोमनाथ चटर्जी ने नियमों के तहत इस्तीफा नहीं दिये जाने के कारण  उसे मंजूर नहीं किया था।

इस घटनाक्रम के अगले दिन, चटर्जी ने एक नोट जारी करके दावा किया था कि 26 जुलाई, 2005 को विदेशियों की घुसपैठ पर एक चर्चा आयोजित की गई थी, जिस दौरान ममता बनर्जी मौजूद नहीं थीं और नियमों के अनुसार उसी विषय को फिर से उसी सत्र में नहीं उठाया जा सकता है। उन्होंने सदस्यों से सदन की गरिमा और मर्यादा बनाए रखने की भी अपील की थी।

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1998 में क्या था ममता का स्टैंड

अगर आज से 21 साल पहले जाते हैं तो जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी उस समय उन्होंने मुम्बई से खदेड़े गए बांग्लादेशियों से सहानुभूति दिखायी थी। उस समय वह कांग्रेस से अलग हुई थी। उस समय उन्होंने संसद में मुम्बई से बांग्लाभाषी मुसलमानों को खदेड़े जाने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने भारत बांग्लादेश के बीच सांस्कृतिक विरासत का हवाला भी दिया था और इस घटना को अमानवीय बताया था। ममता ने कुत्ते बिल्लियों से उनकी तुलना करते हुए कहा था कि अगर वह बांग्लादेशी भी थे तो कुत्ते बिल्लियों की तरह से उन्हें बांग्लादेश नहीं भेजा जाना चाहिए था।

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1995 में महाराष्ट्र में पहली बार भाजपा शिवसेना सत्ता में आयी थीं और उन्होंने मुंबई से बांग्लादेशियों को खदेड़ने का अभियान चलाया था।  प.बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने भी इसे बर्बर बताया था।

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प. बंगाल की राजनीति क्या कहती है

1977 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई थी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे को इस्तीफा देना पड़ा था। वामपंथी दलों की तरफ से ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने। उस समय पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद मुख्य समस्या थी। कल-कारखानों में पारिश्रमिक बेहद कम था। मजदूर संगठन निष्क्रिय थे । ज्योति बसु ने सत्ता संभालते हीं नक्सलियों पर अंकुश लगाया, कुछ मुख्यधारा में वापस आए तो कुछ बंदूकों के जोर पर शांत कर दिये गए।

ज्योति बसु के नेतृत्व में दूसरा काम वाम दलों ने यह किया कि मजदूर संगठनों को मजबूत कर फैक्ट्री मालिकों से उचित पारिश्रमिक दिलाया। नतीजतन पश्चिम बंगाल में इन बिहार, उ.प्र से आए मजदूरों के बीच जिनकी संख्या लाखों में थी वामपंथी पार्टियों बेहद लोकप्रिय हो गई। ये सभी वामदलों के पक्के वोटर बन गए।

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दूसरी तरफ बांग्लादेश के उदय के पहले से हीं बांग्लादेशी मुसलमानों का पलायन पश्चिम बंगाल, असम में होता रहा है,पश्चिम बंगाल की ज्योति बसु सरकार ने इस घुसपैठ को भी बढ़ावा दिया और उन्हें राज्य में बसाकर उनको अपना वोटर बना लिया। उनके वोटरकार्ड, राशनकार्ड बनाकर उपकृत किया इससे वे सभी वामपंथियों के वोटर बन गए। ममता बनर्जी जो पहले इन बांग्लादेशियों का विरोध करती थीं जब सत्ता में आयीं तो वामपंथी दलों के जनाधार का मुख्य जरिया रहे घुसपैठियों के साथ वही सलूक किया जो वामपंथी करते थे। ममता बनर्जी ने भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाकर उन्हें अपना वोटर बना लिया। और अब इसी लिए वह एनएए व एनआरसी का विरोध कर रही हैं क्योंकि खतरा उनके वोट बैंक पर है।

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