प्रमोशन में आरक्षण पर संसद में छिड़ा संग्राम, सरकार करेगी बचाव

सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा भाजपा संविधान से आरक्षण को हटाना चाहती है। इसके बाद भाजपा और सरकार ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा संवेदनशील मामलों पर राजनीति करती है।

Published by SK Gautam Published: February 10, 2020 | 3:08 pm
Modified: February 10, 2020 | 7:51 pm

नई दिल्ली: आरक्षण को लेकर एक बार फिर राजनीति के गलियारे में हलचल मच गयी है। यह सियासी संग्राम प्रमोशन में आरक्षण को लेकर संसद में छिड़ा हुआ है। सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा भाजपा संविधान से आरक्षण को हटाना चाहती है। इसके बाद भाजपा और सरकार ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा संवेदनशील मामलों पर राजनीति करती है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्री जल्द ही संसद में बयान देंगे।

राज्य सरकारें नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं

दरअसल, शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकारें नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए कोटा या आरक्षण की मांग करना मौलिक अधिकार नहीं है।

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 राजनाथ सिंह ने कहा- सरकार दोनों सदनों में अपना जवाब भी देगी

प्रमोशन में आरक्षण पर सरकार दोनों सदनों में अपना जवाब भी देगी। केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा कि इस मामले में सरकार अपना जवाब देगी। वहीं लोकसभा में इस मसले को लेकर विपक्ष समेत कई दलों ने सदन में हंगामा किया।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने दोबारा सदस्यों से आग्रह किया कि वे सदन की कार्यवाही को बाधित न करें। सरकार की ओर से केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री सदन में सरकार की तरफ बयान देंगे। इसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए। अगर सरकार के बयान से विपक्षी दल सहमत नहीं हों तो लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति के बाद इस विषय पर चर्चा भी हो सकेगी लेकिन सदस्यों को सरकार के बयान के लिए धैर्य रखना चाहिए।

एसी-एसटी से अधिकार से छीन रही है सरकार- अधीर रंजन

लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन ने कहा कि उत्तराखंड सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दिया गया कि एससी और एसटी के ऊपर जो संरक्षण है, उसे हटा देना चाहिए। अधीर रंजन ने आरोप लगाया कि आजादी के बाद से एससी और एसटी के साथ भेदभाव होता रहा है। आज सरकार उनके अधिकार को छीन रही है।

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ये फैसला सरकार का नहीं, सुप्रीम कोर्ट का है: मंत्री

अधीर रंजन के इस बयान पर सत्ता पक्ष के सांसदों ने हंगामा किया। बीजेपी सांसदों ने कहा कि यह फैसला सरकार का नहीं, सुप्रीम कोर्ट का है। संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि इस फैसले से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

आरक्षण संवैधानिक अधिकार है: चिराग पासवान

लोकसभा में लोजपा अध्यक्ष और सांसद चिराग पासवान ने कहा कि लोक जनशक्ति पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं है, जिसमें कहा गया है कि नौकरियों और प्रमोशन के लिए आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। हम केंद्र से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हैं। चिराग पासवान ने कहा कि महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट का ही परिणाम है कि आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है। आरक्षण खैरात नहीं है, यह संवैधानिक अधिकार है।

अनुप्रिया पटेल ने दुर्भाग्यपूर्ण फैसला बताया

अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल ने भी कहा कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं है। यह अब तक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया सबसे दुर्भाग्यपूर्ण फैसला है। उन्होंने कहा कि वंचित वर्गों के अधिकारों पर इससे भयानक कुठाराघात होगा।

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सरकार संसद में देगी बयान

राज्यसभा में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों के लोगों को आरक्षण पर उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था के मुद्दे पर सरकार अपराह्न दो बजे अपना रुख साफ करेगी। सभापति एम वेंकैया नायडू ने कहा कि न्यायालय की व्यवस्था पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की जा सकती। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि सदस्य अत्यंत संक्षेप में अपनी बात रख सकते हैं।

आसन की अनुमति से सदन में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, माकपा सदस्य के के रागेश, भाकपा के विनय विश्वम और बसपा के सतीश चंद्र मिश्र ने अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों के लिए पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया। इस पर सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि पदोन्नति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोगों को आरक्षण पर उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था के बारे में सरकार अपराह्न दो बजे अपना रुख स्पष्ट करेगी।

ये है पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकारें नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए कोटा या आरक्षण की मांग करना मौलिक अधिकार नहीं है। शुक्रवार को जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा था कि इस अदालत द्वारा निर्धारित कानून के मद्देनजर, इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है।

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पीठ ने कहा, सरकारी सेवा में कुछ समुदायों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न दिए जाने का आंकड़ा सामने लाए बिना राज्य सरकारों को ऐसे प्रावधान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर करता है कि उन्हें प्रमोशन में आरक्षण देना है या नहीं? कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार की अपील पर यह फैसला सुनाया था। पीठ ने ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने को प्रतिबद्ध नहीं है। लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा इसको लेकर दावा करना मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं है और न ही इस संबंध में कोर्ट राज्य सरकार को कोई आदेश जारी कर सकता है।

अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-ए) आरक्षण लागू करने की शक्ति देता है

कोर्ट ने आगे कहा, अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-ए) आरक्षण लागू करने की शक्ति जरूर देता है, लेकिन यह तभी हो सकता है जब राज्य सरकार यह मानती हो कि सरकारी सेवाओं में कुछ समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा 2012 में दिया गया फैसला निष्प्रभावी हो गया, जिसमें विशेष समुदायों को कोटा प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को आदेश दिया गया था।