पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं गांधी

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा… अल्लामा इक़बाल की इन लाइनों को आज तक प्रासंगिक बनाये रखने के एक सूत्र, स्तंभ महात्मा गांधी भी हैं। गांधी के सौ साल पहले और उनके समकालीनों में कोई ऐसा विचारक, चिंतक, दार्शनिक, सिद्धांतकार, राजनेता, प्रेरणा पुरुष या शख्स नहीं हुआ है।

योगेश मिश्र

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा… अल्लामा इक़बाल की इन लाइनों को आज तक प्रासंगिक बनाये रखने के एक सूत्र, स्तंभ महात्मा गांधी भी हैं। गांधी के सौ साल पहले और उनके समकालीनों में कोई ऐसा विचारक, चिंतक, दार्शनिक, सिद्धांतकार, राजनेता, प्रेरणा पुरुष या शख्स नहीं हुआ है जो अपने जन्म से तकरीबन डेढ़ सौ साल बाद तक न केवल प्रासंगिक बना रहे बल्कि निरंतर उसकी प्रासंगिकता का दायरा और प्रसार बढ़ता ही जा रहा हो।

कार्ल मार्क्र्स 5 मई, 1818 को पैदा हुए। 2011 में उनका मार्क्सवाद खत्म हो गया। तकरीबन दो सौ साल वह तब चले, तब जबकि बड़ी सल्तनत की छत्रछाया थी। इसके बाद यह विचार ही खत्म हो गया। चीनी क्रांतिकारी और राजनीतिक विचारक माओ त्से-तुंग 83 साल जी पाए। पर उनकी विचारधारा को चीन के बाहर जगह नहीं मिली। चीन ने भी अब उससे अलग रास्ता बना लिया है। जोसिप ब्रोज़ टीटो युगोस्लाविया से बाहर तो निकले लेकिन गुट निरपेक्ष देशों से आगे नहीं बढ़ पाए। कमाल आतातुर्क उर्फ मुस्तफा कमाल पाशा भी टर्की के बाहर कोई बड़ा मील का पत्थर नहीं गाड़ पाए। हम यहां मार्टिन लूथर किंग, नेल्सल मंडेला, आंग सांग सू की जैसे ढेर सारे उन लोगों का जिक्र नहीं कर रहे हैं जो अपनी जिंदगी में गांधी को खंड-खंड या अखंड किसी न किसी रूप में स्वीकार करते हैं।

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गांधी की 150 वीं जयंती पर यह महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न हो जाता है कि आखिर दुनिया के 104 देशों ने गांधी पर 300 से अधिक डाक टिकट क्यों जारी कर रखे हैं? भारत सहित दुनिया के 84 देशों में 110 से अधिक गांधी की मूर्तियां क्यों लगी हैं? अकेले अमेरिका में आठ मूर्तियां हैं। ब्रिटेन में नीले रंग की तख्ती उन इमारतों पर लगाई जाती है, जिनका रिश्ता ऐतिहासिक लोगों से होता है। गांधी जिस किंग्सले हॉल में रहते थे उस पर आज भी नीले रंग का बोर्ड लगा है। गांधी जब फ्रांस गए थे तो रोम्या रोलां ने पियानो पर उन्हें बीथोविन की पांचवीं सिम्फनी सुनाई थी। आज हंगरी के शिक्षाविद् डेजो जेन्कोविक्स कहते हैं कि जब चर्च और क्रिश्चियन विश्व ने कुछ नहीं किया तो ईश्वर ने गांधी के रूप में शांति का मसीहा भेजा।

एप्पल के सीईओ टिम कुक के लिए प्रेरणा देने वाली चार किताबों में एक किताब महात्मा गांधी की सत्य के साथ मेरे प्रयोग भी हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के शांति, समानता, वैश्विक नागरिकता व सशक्तिकरण जैसे मुद्दे महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित हैं। 2007 से संयुक्त राष्ट्र संघ इनके जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में क्यों मना रहा है? वह भी तब जब गांधी सोशल मीडिया के युग के नहीं हैं। गांधी के समर्थक उनके अहिंसा को इस हद तक कायरता बना बैठे हैं कि गांधी पर की जाने वाली ओछी टिप्पणियों और हमलों पर उनमें कोई उबाल नहीं आता। आप जरा किसी भी नेता के खिलाफ दो शब्द बोल कर तो देखिये। सडक़ पर उनकी फौज आप का रास्ता रोके मिल जाएगी। आभासी दुनिया में आप ट्रोल कर दिए जाएंगे।

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गांधी ही थे जो भारत को वैश्विक फलक पर लेकर आए। महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में लेकर आने वाले लोगों में गांधी ही हैं। उनके जीवन का आखिरी दो साल सांप्रदायिक हिंसा के जख्मों को भरने में लगा। उन्होंने भारत को जकड़े हुए डर से बाहर निकाला। तभी अंग्रेजों के खिलाफ लडऩे के लिए सैलाब उतरा। उनकी अहिंसा का रिश्ता अंग्रेजी के नॉन वायलेंस से नहीं है। उनका अहिंसा का विचार सत्याग्रह के आचरण पर आधारित है। अहिंसा ने आतंक से लडऩे की ताकत दी। वे धर्म परायण वैष्णव थे। विश्व प्रेम की उनकी धारणा वसुधैव कुटुंबकम् से बनती है। धर्म निरपेक्षता की उनकी समझ भरत की सनातन परंपरा से निकलती है। संस्कृतियों के साथ वे रचनात्मक संवाद स्थापित करते थे। ब्रह्मचर्य पर वह विश्वास की परीक्षा लेते थे। सत्य की शिक्षा उन्हें राजा हरिश्चंद्र नाटक से मिली थी।

टालस्टाय की किताब द किंगडम ऑफ गाड इज विदिन यू और रस्किन की किताब अन टू द लास्ट उनकी प्रिय पुस्तकें थीं। नरसी मेहता का वैष्णव जन उनका प्रिय भजन था। उठ जाग मुसाफिर भोर भयो अब रैन कहां जो सोवत है, भी गांधी का प्रिय था। यरवदा जेल में गांधी ने इसे सरदार वल्लभ भाई पटेल और महादेव देसाई के सामने गाया भी था। वे बुनियादी अर्थ में नितांत मौलिक थे। खादी उनके लिए वस्त्र नहीं विचार था। ग्राम स्वराज उनका मुख्य सपना था। दरिद्र को भगवान मानना और ईश्वर को गरीब के तौर पर पेश कर उन्होंने भगवान की अवधारणा को मूल रूपांतकारी और मुक्त करने वाली क्षमता लौटा दी।

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गांधी ने अपनी आत्मकथा में बहुत सी असहज सच्चाइयों के बारे में लिखा है। यह शक्ति दुनिया के किसी शख्स में देखने को नहीं मिली कि वह अपनी जिंदगी को एक खुली किताब के रूप में पेश करे। संबंधों को लेकर उनकी संवेदनशीलता प्रेरक है। 1947 में ब्रिटेन की भावी महरानी एलिजाबेथ की शादी के अवसर पर अपने काते सूत से बना मेजपोश उन्होंने उपहार में भेजा था। 1944 में जिन्ना जब बुरी तरह बीमार थे तब गांधी ने उनके खाने के लिए खाखरा बनाया था। जिन्ना ऐसे शख्स थे जो गांधी विरोध का परचम लेकर टहलते थे।

दक्षिण अफ्रीका की जेल में बंदी के दौरान उन्होंने एक सैंडिल बनाया था। जिसे गोरे अधिकारी जॉन स्मट्स को दिया। बहुत कोशिश के बाद भी गांधी को गोपाल कृष्ण गोखले की सर्वेंटस ऑफ इंडिया सोसायटी की सदस्यता नहीं मिल पाई। तब जबकि गोखले उनके राजनीतिक गुरु थे। गोखले के कहने पर ही भारत लौटने के बाद उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। यही नहीं गोखले को दिए गए वायदे के मुताबिक गांधी ने इस यात्रा के दौरान कोई राजनीतिक वक्तव्य भी नहीं दिया। गांधी कहा करते थे कि यदि मुझमें सेंस ऑफ ह्यूमर न होता तो मैंने जाने कब आत्महत्या कर ली होती। विदेशी अनुभवों से भारत के प्रति उनकी प्रीत प्रगाढ़ हुई। गांधी साध्य और साधन दोनों की पवित्रता जरूरी मानते थे। सत्य के प्रति उनका आग्रह मुण्डक उपनिषद के सत्यमेव जयते का विस्तार था।

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कभी जनसंघ को गांधी की विचारधारा का विरोधी माना जाता था। पर यह विचार रखने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि गांधी की अपील पर असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन, दोनों में जेल काटने वाले डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार ने ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ बनाया है। संघ के बाबा साहब आप्टे कहा करते थे कि गांधी भारत की आत्मा थे और वीर सावरकर शरीर। आप्टे के प्रयास से ही संघ ने महात्मा गांधी का नाम सुबह की प्रार्थना में शामिल किया। गांधी व डॉ. हेडगेवार 1934 में मिले। दोनों ने अस्पृश्यता निवारण के लिए देशव्यापी यात्रा की। डॉ. हेडगेवार की जीवनी में इससे जुड़ा एक अध्याय है। भारतीय जनता पार्टी पहले जनसंघ ही थी। भाजपा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक धारा है।

गांधी का विरोध करने वाले वह लोग हैं जिन्हें सस्ती लोकप्रियता चाहिए होती है या फिर वे जो गांधी को जानते नहीं। गांधी और जनसंघ के बीच आधारहीन तथ्य पेश करना भी इसी जमात का काम है। अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद का रास्ता अपनाया था। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा गांधी संकल्प यात्रा निकाल रही है। जो स्वच्छता, अहिंसा, स्वदेशी, स्वराज और सादगी के उनके विचारों का प्रचार-प्रसार करेगी। गांधी ने कम अपमान नहीं सहा है। उनका अपमान करके कई लोग मजबूत होते हैं।

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सोशल मीडिया के दौर में जब सच और झूठ का भेद मिटाया जा रहा है तब गांधी पर हमले के हालात और बढ़ गए हैं। अमेजन ने चप्पलों पर गांधी का चित्र छाप दिया। कोई हंगामा नहीं हुआ। वजह सच और झूठ के भेद को मिटाने की निरंतर की जा रही कोशिश ही है जो जाने-अनजाने गांधी को खारिज करती है। गांधी ने प्रभाव पैदा करने की कोशिश नहीं की। प्रेरणा बन गए। भारत के ऋषियों की शक्तिशाली परंपरा को उन्होंने आगे बढ़ाया। गांधी स्वीकार और अस्वीकार के उस चौखट पर खड़े हैं जहां से वह एक भी कदम इधर या उधर नहीं चल पा रहे हैं। कोई उन्हें स्वीकार करने के ओर की यात्रा नहीं कर रहा है। क्योंकि यह कठिन है। अस्वीकार करना असंभव। क्योंकि गांधी ने अपने समय के और अपने आगे-पीछे सौ साल के विचारकों, चिंतकों, क्रांतिकारियों, प्रेरणा पुरुषों सबको काफी पीछे छोड़ रखा है। सवाल लोकप्रियता का हो, स्वीकार्यता का, लोकतंत्र का, धर्म निरपेक्षता का, धर्म और आध्यात्म का, आश्रम और अर्थ का, सत्य और ब्रह्चर्य का, संवेदना और संबंध का, युद्ध और विजय का, सबका जवाब गांधी के पास ही है।

गांधी हमारे समाज में लैंप पोस्ट की तरह लगते हैं। गांधी को इस बात का एहसास हो गया था कि भारतीय संस्कृति में एक अंतस चेतना है जो उसे नाजुक से नाजुक मोड़ पर अपना सर्वस्व झोकने के लिए तैयार कर लेती है। इसी भरोसे को गांधी ने भारत में आजमाया, जिस पर दुनिया चकित हो उठी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)