धरती पर मौजूद हैं खरबों वायरस, हर जीवित चीज को करते हैं कंट्रोल

दुनिया पिछले बीस साल से सार्स, मर्स, इबोला, निपाह और अब कोरोना वायरस का प्रकोप झेल रही है। एक के बाद एक सामने आ रहे खतरनाक और अनजान वायरस के सामने वैज्ञानिक बेबस नजर आ रहे हैं। एक अनुमान है कि धरती पर करीब 10 खरब वायरस हैं।

नीलमणि लाल

लखनऊ: दुनिया पिछले बीस साल से सार्स, मर्स, इबोला, निपाह और अब कोरोना वायरस का प्रकोप झेल रही है। एक के बाद एक सामने आ रहे खतरनाक और अनजान वायरस के सामने वैज्ञानिक बेबस नजर आ रहे हैं। एक अनुमान है कि धरती पर करीब 10 खरब वायरस हैं। बहुत कम वायरस हैं जिनकी गिनती हो पायी है या जिनका नामकरण हो पाया है।

यूनीवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलम्बिया के वैज्ञानिक कर्टिस सटल का कहना है ब्रह्मांड में जितने तारे हैं उतने वायरस सिर्फ महासागरों में हैं। अगर सब वायरसों की कतार लगा दी जाये तो वह एक करोड़ प्रकाश वर्षों जितनी लंबी होगी। इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि प्रतिदिन 70 करोड़ वायरस सिर्फ जलीय स्रोतों से प्रति वर्ग मीटर जमीन पर जमा होते रहते हैं। धरती पर जीवन का प्रारम्भ ही वायरसों से हुआ है। और सब वायरस खराब भी नहीं होते। धरती के चारों ओर वायरसों का सतत प्रवाह चलता रहता है।

स्पेन में सिएरा नेवाडा पर्वतों में वैज्ञानिकों की एक इंटेरनेशनल टीम ने आसमान से गिरते वायरसों पर एक रिसर्च भी की हुई है। शोधकर्ताओं ने बाल्टियों को पहाड़ों में अलग अलग जगह रखा। हर दिन इनमें जमा वायरसों की गिनती के बाद पाया गया कि रोजाना 80 करोड़ वायरस पृथ्वी के प्रत्येक वर्ग मीटर पर गिरते हैं। अधिकांश वायरस समुद्रों की फुहारों से हवा में मिल जाते है। इनकी तुलना में कम ही वायरस ऐसे है जो धूल के गुबारों से पृथ्वी पर आते हैं। वैज्ञानिक कर्टिस सटल के अनुसार वायरसों का एक स्थान से बहुत दूर दूसरे स्थान तक जाना कोई ताज्जुब की बात नहीं है।

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आमतौर पर ये माना जाता है कि वायरस पृथ्वी पर पैदा होते हैं और हवा के साथ ऊपर की ओर उठते हैं। लेकिन कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि वायरस ऊपर वातावरण में पैदा होते हैं। ऐसे भी शोधकर्ता हैं जिनका मानना है कि वायरस बाहरी ग्रह से आते हैं।

वायरस कहीं से भी आते हों लेकिन तथ्य यही है कि हमारे ग्रह पर इनकी भरमार है। जहां प्रत्येक वर्ग मीटर में सैकड़ों करोड़ वायरस हैं वहीं इतने ही क्षेत्र में दसियों करोड़ बैक्टीरिया मौजूद हैं।

जार्जिया यूनिवर्सिटी के जोशुआ वीट्ज़ और टेनेसी यूनिवर्सिटी के स्टीवन विल्हेल्म का कहना है कि वायरस सभी जीवित चीजों के कार्य और विकास को नियंत्रित करते हैं। लेकिन यह किस सीमा तक होता है ये अब भी रहस्य है।

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क्या वायरस में होती है जान

वायरस सूक्ष्मजीवों के टॉप शिकारी होते हैं लेकिन वायरस में जन्म देने या प्रजनन की क्षमता नहीं होती। उनको एक से दो होने के लिए किसी कोशिका पर कब्जा करना पड़ता है। कोशिका पर कब्जे को ही संक्रमण होना कहते हैं। जिस कोशिका पर वायरस कब्जा करता है उसे ‘होस्ट’ या मेजबान कोशिका कहा जाता है। अपने मेजबान की मशीनरी का इस्तेमाल करके वायरस अपनी संख्या बढ़ाता है। इसके लिए वायरस अपना खुद का डीएनए होस्ट सेल में इंजेक्ट करता और इससे बना नया जीन कभी कभी होस्ट सेल के ही जीनोम का हिस्सा बन जाता है।

वायरस आक्रमण से बना इंसान

शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि मानवों के पूर्वजों में एक वायरस आया था जिसके जेनेटिक कोड आज के मानव के नर्वस सिस्टम का हिस्सा हैं। मानव की मस्तिष्क की शक्तियों में उसी जेनेटिक कोड की बहुत बड़ी भूमिका है। मानव जीनोम (जीन संरचना) का 40 से 80 फीसदी हिस्सा प्राचीन वायरस आक्रमण से जुड़ा हुआ है।

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बीस साल पहले वैज्ञानिक स्टीफन मोर्स ने कहा था कि उनके अनुमान से पृथ्वी पर 10 लाख वायरस है। उनका आंकलन था कि पृथ्वी पर 50 हजार किस्म मे रीढ़वाले जीव-जन्तु हैं जो वायरस के करियर हैं और इनमें से हरेक में अगर 20 अलग-अलग तरह के वायरस हैं तो दस लाख वायरस होंगे।

प्रकृति में संतुलन बनाते हैं वायरस

वायरस पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र या इकोसिस्टम में संतुलन बनाए रखने का भी काम करते हैं। इसके लिए वह सूक्ष्मजीवों की संरचना बदलते रहते हैं। मिसाल के तौर पर जब समुद्रों में विषाक्त शैवाल बड़ी मात्रा में बढ़ते हैं तो एक वायरस उनपर आक्रमण करके उनमें विस्फोट करा देता है जिससे शैवाल नष्ट हो जाते हैं। ये काम एक दिन में पूरा जाता है। कुछ वायरस और अन्य सूक्ष्मजीव साथ साथ विकसित हुये हैं और एक दूसरे के साथ संतुलन बना लिया है लेकिन एक आक्रमांकारी वायरस व्यापक बदलाव लाने के साथ साथ किसी जीवित चीज को विलुप्त भी कर सकते हैं।

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विध्वंसकारी ताकत

वायरसों में विध्वंसकारी ताकत होती है। मिसाल के तौर पर वेस्ट नाइल विरस ने अमेरिका के बड़े हिस्से में पक्षियों की संख्या और नस्लें ही बाद कर रख दीं। इस वायरस से कौवे खत्म हो गए लेकिन उस प्रजाति के अन्य पक्षी बच गए।

हवाई द्वीप में अविपो वायरस ने बड़े पैमाने पर पक्षियों का सफाया कर उनको विलुप्त कर दिया। मच्छर इस वायरस के करियर थे और वे पहाड़ों के उन जंगलों में पहुँच गए जहाँ इतना ठंडा था कि मच्छर वहाँ जीवित ही नहीं रह पाते थे।

‘रिंडरपेस्ट’ ने बादल डाला अफ्रीका को

जब जीवों की नस्लें खतम हो जाती हैं तो इसका असर इकोसिस्टम पर पड़ता है। इसका उदाहरण है ‘रिंडरपेस्ट’ नामक बीमारी। उत्तरी अफ्रीका में इटली की सेना कुछ मवेशी ले कर आई थी। 1887 में इस पूरे महाद्वीप में एक वायरस फैला जिसने खुरों वाले पशुओं पर ऐसा कहर बरपाया कि 95 फीसदी तक मवेशी खतम हो गए। बड़ी संख्या में मवेशियों के मारे जाने से वनस्पतियों पर असर पड़ा क्योंकि चरागाह में चरने वाले पशु ही नहीं बचे थे सो वहाँ पेड़ उग गए। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के परिस्थितिकी बदलाव सैकड़ों-हजारों साल तक बने रह सकते हैं। ‘रिंडरपेस्ट’ फैलने से इन्सानों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा। एक अनुमान है कि भुखमरी के कारण 1891 में अफ्रीका के दो तिहाई मसाई आदिवासियों का खात्मा हो गया। ये आदिवासी मवेशियों पर निर्भर थे। एक झटके में ‘रिंडरपेस्ट’ ने अफ्रीका में सब कुछ बादल डाला। व्यापाक टीकाकारण के बाद 2011 में जाकर आफिका और पूरी दुनिया से ‘रिंडरपेस्ट’ का पूरी तरह सफाया हो सका।

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एक से बढ़ कर एक खतरनाक वायरस हैं हमारे इर्द गिर्द

मारबुर्ग: इसे दुनिया का सबसे खतरनाक वायरस कहा गया है। इस वायरस का नाम जर्मनी के मारबुर्ग शहर पर पड़ा जहां 1967 में इसके सबसे ज्यादा मामले पाये गए थे। ये इतना खतरनाक है कि 90 फीसदी मामलों में मारबुर्ग के शिकार मरीजों की मौत हो जाती है।

इबोला: वर्ष 2013 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में इबोला संक्रमण टेजे से फैला था। इबोला ने ग्यारह हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इबोला की कई किस्में होती हैं और सबसे घातक किस्म के संक्रमण से 90 फीसदी मामलों में मरीजों की मौत हो जाती है।

हंता: हंता वायरस श्वसन तंत्र पर हमला करता है। 1993 में अमेरिका में इसके 600 मामले आए थे। शोधकर्ताओं ने इस वायरस का स्रोत एक खास किस्म के चूहे में पता लगाया। इस वायरस से बीमार 36 फीसदी लोगों की मौत हो गई थी। पचास के दशक में इस वायरस के एक अन्य स्ट्रेन से तीन हजार लोग संक्रमित हुये थे जिनमें से 12 फीसदी मारे गए।

रेबीज: कुत्तों, लोमड़ियों या चमगादड़ों के काटने से रेबीज का वायरस फैलता है। एक बार वायरस शरीर में पहुंच जाए तो मौत निश्चित है।

एचआईवी: अस्सी के दशक में एचआईवी की पहचान हुई थी। अब तक तीन करोड़ से ज्यादा लोग इस वायरस के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं। एचआईवी के कारण एड्स होता है जिसका आज भी पूरा इलाज नहीं है।

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इन्फ्लुएंजा: दुनिया भर में हर साल हजारों लोग इन्फ्लुएंजा या फ्लू के शिकार होते हैं। 1918 में जब इसकी महामारी फैली तो दुनिया की 40% आबादी संक्रमित हुई और पांच करोड़ लोगों की जान गई थी।

डेंगू: मच्छर के काटने से डेंगू वायरस फैलता है लेकिन अन्य वायरस के मुकाबले इसका मृत्यु दर काफी कम है। 2019 में अमेरिका ने डेंगू के टीके को अनुमति दी थी।

रोटा: ये वायरस छोटे बच्चों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। 2008 में रोटा वायरस के कारण पांच साल से कम उम्र के लगभग पांच लाख बच्चों की जान गई।

कोरोना वायरस : इस वायरस की कई किस्में हैं। 2012 में सऊदी अरब में फैला मर्स भी कोरोना वायरस की ही एक किस्म है। इससे पहले 2002 में सार्स फैला था जिसका पूरा नाम सार्स कोरोना वायरस था। मौजूदा कोरोना वायरस का नाम सार्स-कोव-2 है और ये दुनिया के हर देश तक पहुंच चुका है।