Cognizant Layoffs 2026 India: नौकरी पर मंडराया संकट! Cognizant का बड़ा फैसला, भारत में सबसे ज्यादा असर!
Cognizant Layoffs 2026 India: नौकरी पर संकट! Cognizant की बड़ी छंटनी योजना, भारत में हजारों IT कर्मचारियों पर असर
Cognizant Layoffs India 2026
Cognizant Layoffs India 2026: युवाओं के सामने रोजगार की बढ़ती चुनौती के बीच आईटी सेक्टर में एक बार फिर अनिश्चितता का माहौल बनता नजर आ रहा है। अमेरिकी आईटी दिग्गज कंपनी कॉग्निजेंट (Cognizant) अपने ‘Project Leap’ के तहत बड़े स्तर पर कर्मचारियों की छंटनी पर विचार कर रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 12,000 से 15,000 कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा मंडरा सकता है, और इसका सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे समय में जब टेक ऑफ सेक्टर पहले ही एआई और ऑटोमेशन के दबाव में है, यह खबर लाखों आईटी प्रोफेशनल्स के लिए चिंता बढ़ाने वाली है।
कॉग्निजेंट की छंटनी योजना, क्या है पूरा मामला
Cognizant ने हाल ही में अपने नए स्ट्रक्चरल बदलाव ‘Project Leap’ की घोषणा की है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य कंपनी को अधिक कुशल, तेज और लागत के मामले में मजबूत बनाना है। इसके तहत कंपनी अपने मौजूदा वर्कफोर्स का पुनर्गठन करना चाहती है, जिसमें कम उत्पादक या दोहराव वाले काम करने वाले रोल्स को खत्म किया जा सकता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटनी की चर्चा तेज हो गई है।
छंटनी पर कितना खर्च करेगी कंपनी
कंपनी ने संकेत दिए हैं कि इस प्रक्रिया में उसे करीब 230 मिलियन डॉलर से 320 मिलियन डॉलर तक खर्च करना पड़ सकता है। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 1900 करोड़ से 2600 करोड़ रुपये के बीच बैठता है। यह रकम मुख्य रूप से उन कर्मचारियों को दिए जाने वाले मुआवजे, नोटिस पीरियड की सैलरी और अन्य लाभों पर खर्च होगी। इतनी बड़ी रकम इस बात को दर्शाती है कि कंपनी यह कदम बेहद बड़े पैमाने पर उठाने की तैयारी में है।
भारत पर क्यों टूट सकता है सबसे बड़ा असर
कॉग्निजेंट के कुल कर्मचारियों में से बड़ी संख्या भारत में काम करती है। अनुमान के मुताबिक कंपनी के करीब 3.57 लाख कर्मचारियों में से लगभग 2.5 लाख भारत में ही हैं। यही कारण है कि अगर छंटनी होती है तो उसका सबसे ज्यादा असर भारत में देखने को मिल सकता है। इसके अलावा भारत में ऑपरेशनल रोल्स की संख्या अधिक होती है और यहां कर्मचारियों को मिलने वाला सेवरेंस पैकेज विकसित देशों की तुलना में कम होता है, जिससे कंपनियों के लिए यहां लागत कम करना आसान हो जाता है।
आईटी सेक्टर में छंटनी क्यों बढ़ रही है
पिछले कुछ वर्षों में आईटी सेक्टर तेजी से बदल रहा है। कंपनियां अब पारंपरिक तरीकों से हटकर नई तकनीकों को अपनाने पर जोर दे रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के कारण कई काम अब मशीनों द्वारा आसानी से किए जा रहे हैं, जिससे मानव श्रम की आवश्यकता कम हो रही है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता के चलते क्लाइंट्स अपने आईटी बजट में कटौती कर रहे हैं, जिससे नई परियोजनाओं की संख्या घट रही है। इन सभी कारणों से कंपनियां अपने खर्चों को कम करने के लिए छंटनी जैसे कदम उठा रही हैं।
पिरामिड मॉडल क्या होता है
आईटी कंपनियों में लंबे समय से ‘पिरामिड मॉडल’ का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस मॉडल में कर्मचारियों को एक पिरामिड की तरह व्यवस्थित किया जाता है, जहां सबसे नीचे बड़ी संख्या में जूनियर और फ्रेशर कर्मचारी होते हैं, बीच में मिड-लेवल मैनेजमेंट होता है और सबसे ऊपर कम संख्या में सीनियर अधिकारी होते हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य कम लागत वाले कर्मचारियों के जरिए अधिक काम कराना और ऊपर के स्तर पर रणनीतिक फैसले लेना होता है।
पिरामिड मॉडल क्यों बदल रहा है
समय के साथ यह मॉडल अब बदलता नजर आ रहा है। कंपनियां महसूस कर रही हैं कि बड़ी संख्या में जूनियर कर्मचारियों को रखने के बजाय कम लेकिन अधिक कुशल कर्मचारियों के साथ काम करना ज्यादा प्रभावी है। एआई और ऑटोमेशन के कारण कई बेसिक काम खत्म हो गए हैं, जिससे पिरामिड के निचले हिस्से की जरूरत कम हो रही है। इसके अलावा कंपनियां तेजी से फैसले लेना चाहती हैं, जिसके लिए कम लेयर वाला स्ट्रक्चर ज्यादा उपयोगी साबित हो रहा है।
लीन मॉडल क्या है और कैसे अलग है
लीन मॉडल एक ऐसा ढांचा है जिसमें कम कर्मचारियों के साथ अधिक कुशल तरीके से काम किया जाता है। इसमें टीम छोटी होती है, लेकिन हर सदस्य के पास कई स्किल्स होती हैं। इस मॉडल में टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन का अधिक इस्तेमाल किया जाता है, जिससे काम तेजी और सटीकता से होता है। यही वजह है कि आधुनिक कंपनियां अब इस मॉडल को तेजी से अपना रही हैं।
आईटी एक्सपर्ट की राय: बदलाव से डर नहीं, तैयारी जरूरी
आईटी इंडस्ट्री के विशेषज्ञ Mohandas Pai का मानना है कि टेक सेक्टर में हो रहे ये बदलाव अचानक नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से चल रहे ट्रेंड का हिस्सा हैं। उनके अनुसार, आईटी कंपनियां अब बड़े वर्कफोर्स की बजाय हाई-स्किल्ड और टेक-सेवी कर्मचारियों पर फोकस कर रही हैं। एआई के आने से लो-एंड जॉब्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, लेकिन जो लोग नई स्किल्स सीखेंगे उनके लिए अवसर भी उतने ही तेजी से बढ़ेंगे।
वे यह भी कहते हैं कि भारत के आईटी प्रोफेशनल्स को अब सिर्फ कोडिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि एआई, डेटा एनालिटिक्स और क्लाउड टेक्नोलॉजी जैसी उभरती फील्ड्स में खुद को मजबूत बनाना होगा।
कर्मचारियों के लिए क्या संकेत
इस बदलाव से साफ है कि अब आईटी सेक्टर में टिके रहने के लिए लगातार सीखना जरूरी हो गया है। जो कर्मचारी खुद को अपडेट नहीं करेंगे, उनके लिए जोखिम बढ़ सकता है, जबकि नई तकनीकों में दक्ष लोग आगे निकल सकते हैं।
अगर छंटनी बड़े स्तर पर होती है तो इसका असर नौकरी बाजार, सैलरी ग्रोथ और फ्रेशर्स के अवसरों पर पड़ सकता है। हालांकि, दूसरी ओर नई तकनीकों से जुड़े क्षेत्रों में नए अवसर भी तेजी से बढ़ रहे हैं।