MGR से विजय तक... तमिलनाडु में क्यों 'सुपरस्टार' ही बनता है मुख्यमंत्री?

थलपति विजय की TVK ने तमिलनाडु की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। जीत के साथ विजय ने एमजीआर और जयललिता जैसे ‘सुपरस्टार मुख्यमंत्री’ की परंपरा को आगे बढ़ाया है। तमिलनाडु में 70 के दशक से सिनेमा और राजनीति का गहरा संबंध रहा है, जहां फिल्मी सितारे लंबे समय तक जनता के दिलों और सत्ता दोनों पर छाए रहे हैं।

By :  Shivam
Update:2026-05-07 22:19 IST

तमिलनाडु में क्या 50 साल पुरानी पारंपरिक द्रविड़ राजनीति का सूर्य अस्त हो रहा है? 'थलपति' विजय की पार्टी तमिलगा वेट्ट्री कजगम (TVK) ने वह कर दिखाया है, जिसकी कल्पना बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों ने भी नहीं की थी। 70 एमएम के फिल्मी पर्दे से निकलकर सत्ता के गलियारों तक का यह सफर क्या विजय को नया 'MGR' या 'अम्मा' बनाएगा? आइए, इतिहास के पन्नों से समझते हैं तमिलनाडु की इस अनोखी 'सिनेमाई सियासत' का पूरा सच।

वर्ष 2024 में फिल्मी दुनिया को अलविदा कहकर राजनीति में कदम रखने वाले विजय ने अपनी पार्टी TVK के जरिए विधानसभा चुनावों में 108 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया है। तमिलनाडु की यह पुरानी परंपरा रही है कि यहाँ का 'सुपरस्टार' ही अक्सर 'मुख्यमंत्री' की कुर्सी तक पहुँचता है। विजय का यह प्रदर्शन संकेत है कि जनता आज भी अपने फिल्मी नायक में ही अपना राजनीतिक रक्षक तलाश रही है।

नींव रखने वाले: MGR और करुणानिधि का दौर

तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति के अटूट रिश्ते की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी।

एम.जी. रामचंद्रन (MGR): इन्होंने फिल्मी लोकप्रियता को वोट बैंक में बदलने की नींव रखी। 1972 में DMK से अलग होकर उन्होंने AIADMK बनाई और 1977 में देश के पहले अभिनेता मुख्यमंत्री बने। 1987 तक उनका करिश्मा बरकरार रहा।

एम. करुणानिधि: हालांकि वे मुख्य रूप से पटकथा लेखक थे, लेकिन उनके संवादों ने द्रविड़ विचारधारा को घर-घर पहुँचाया। उन्होंने 5 बार राज्य की कमान संभाली और साबित किया कि कलम और कैमरा मिलकर सत्ता बदल सकते हैं।

'अम्मा' का उदय: जयललिता की शक्तिशाली विरासत

MGR के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को जे. जयललिता ने संभाला। अपनी फिल्मों की लोकप्रियता और प्रशासनिक कुशलता के दम पर वे 'अम्मा' कहलाईं। उन्होंने AIADMK को न केवल एकजुट रखा, बल्कि दशकों तक राज्य की सबसे शक्तिशाली महिला नेता के रूप में राज किया।

जब पर्दे के 'बादशाह' राजनीति में हुए नाकाम

हर सितारा MGR या जयललिता जैसी सफलता हासिल नहीं कर पाता। इतिहास में ऐसे कई नाम हैं जिनका जादू चुनावी मैदान में फीका पड़ गया:

शिवाजी गणेशन: तमिल सिनेमा के दिग्गज अभिनेता होने के बावजूद, चुनावी राजनीति में उन्हें वह सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी।

विजयकांत (कैप्टन): 2005 में DMDK बनाकर उन्होंने 'तीसरे विकल्प' के रूप में उम्मीद जगाई। 2011 में वे नेता प्रतिपक्ष भी बने, लेकिन समय के साथ उनकी पार्टी का प्रभाव कम होता गया।

आधुनिक राजनीति: कमल हासन और सीमन की चुनौती

वर्तमान दौर में भी कई चेहरे अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं:

कमल हासन: 2018 में 'मक्कल नीधि मय्यम' (MNM) बनाकर भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का दांव खेला, लेकिन बड़ी चुनावी जीत अभी भी उनसे दूर है।

सीमन: 'नाम तमिलर काची' (NTK) के जरिए तमिल राष्ट्रवाद की प्रखर आवाज बनकर उभरे हैं और युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं।

राष्ट्रीय दलों में फिल्मी चेहरों की पैठ

तमिलनाडु में अभिनेता होना राजनीति का 'पासपोर्ट' माना जाता है। खुशबू सुंदर और गौतमी जैसी अभिनेत्रियों ने राष्ट्रीय दलों (BJP/Congress) का दामन थामा, तो वहीं आर. सरथकुमार और करुणास जैसे सितारों ने अपनी छोटी पार्टियों के जरिए विधानसभा तक का सफर तय किया।

दक्षिण भारत का 'सिनेमाई' फॉर्मूला: आंध्र से केरल तक

फिल्मी सितारों का यह राजनीतिक प्रभाव सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है:

आंध्र प्रदेश: एन.टी. रामा राव (NTR) ने 'तेलुगु देशम पार्टी' के जरिए रातों-रात कांग्रेस का किला ढहा दिया था। आज उसी विरासत को पवन कल्याण और उनकी 'जनसेना पार्टी' आगे बढ़ा रही है।

कर्नाटक और केरल: कर्नाटक में अम्बरीश और अनंत नाग जैसे दिग्गजों ने सफलता पाई, तो केरल जैसे वैचारिक राज्य में भी सुरेश गोपी और मुकेश ने साबित किया कि लोकप्रिय चेहरा चुनावी जीत की गारंटी बन सकता है।

क्या विजय बनेंगे अगले किंग?

विजय की पार्टी TVK का 100 से अधिक सीटें जीतना यह दर्शाता है कि 10 साल के DMK शासन के बाद जनता बदलाव चाहती है। क्या विजय एम.जी. रामचंद्रन की तरह एक स्थायी राजनीतिक शक्ति बन पाएंगे? यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 'थलपति' का फिल्मी स्क्रीन वाला 'स्वैग' जमीनी प्रशासन में भी उतना ही प्रभावी साबित होता है।

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