बंगाल-तमिलनाडु में संवैधानिक 'इमरजेंसी'? ममता की कुर्सी छिनी, विजय का राजतिलक रुका, जानिए कैसे दो राज्यों के नतीजों ने बढ़ाई राज्यपालों की टेंशन

West Bengal and Tamil Nadu constitutional crisis: बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव नतीजों के बाद बढ़ा संवैधानिक संकट! एक तरफ ममता बनर्जी के इस्तीफे से इनकार ने राज्यपाल की टेंशन बढ़ाई, तो दूसरी ओर विजय की TVK बहुमत से पीछे फंस गई। जानिए कैसे दोनों राज्यों में सरकार गठन बना सबसे बड़ा सियासी ड्रामा।

Update:2026-05-07 22:40 IST

West Bengal and Tamil Nadu constitutional crisis: भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब एक ही समय पर दो अलग-अलग राज्यों के राज्यपालों को इतनी जटिल संवैधानिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा हो। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, लेकिन तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की सियासी तपिश ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक तरफ तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर 'त्रिशंकु विधानसभा' के बीच सरकार बनाने का सही चेहरा तलाश रहे हैं, तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर.एन. रवि को हार के बाद भी इस्तीफा न देने वाली सरकार पर 'संवैधानिक हंटर' चलाना पड़ा है। इन दोनों राज्यों की अनूठी परिस्थितियों ने संविधान विशेषज्ञों को भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

तमिलनाडु में 'थलापति' विजय की जीत और बहुमत का पेच

तमिलनाडु में इस बार का चुनाव किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा। अभिनेता से नेता बने विजय थलापति की पार्टी 'तमिलाग वेट्री कड़गम' (TVK) ने अपने पहले ही बड़े इम्तिहान में कमाल कर दिखाया और 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि, 234 सीटों वाली विधानसभा में राज करने के लिए 118 का जादुई आंकड़ा जरूरी है, जिससे विजय अभी 10 कदम दूर हैं। कांग्रेस ने अपने 5 विधायकों का समर्थन देकर विजय की ताकत को 113 तक तो पहुंचा दिया है, लेकिन बहुमत की दहलीज अब भी 5 मील दूर खड़ी है। राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वो सबसे बड़ी पार्टी को मौका दें या फिर पूर्ण बहुमत का इंतजार करें?

लोक भवन बनाम विधानसभा: कहां साबित होगा बहुमत?

तमिलनाडु की राजनीति में फिलहाल 'लिखत-पढ़त' की जंग चल रही है। राज्यपाल आर्लेकर ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक विजय 118 विधायकों के समर्थन का भौतिक प्रमाण यानी लिखित पत्र नहीं सौंपते, तब तक उन्हें सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया जाएगा। विजय अब तक दो बार राज्यपाल से मिल चुके हैं, लेकिन राजभवन का रुख सख्त है। अब बहस इस बात पर छिड़ गई है कि क्या बहुमत का परीक्षण राजभवन के बंद कमरों में होना चाहिए या विधानसभा के पटल पर? सुप्रीम कोर्ट के 'एस आर बोम्मई' मामले का हवाला देते हुए विजय समर्थक कह रहे हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाकर सदन में बहुमत साबित करने का मौका मिलना चाहिए, लेकिन राज्यपाल किसी भी तरह के पक्षपात के आरोप से बचने के लिए फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में ममता की 'जिद' और राज्यपाल का कड़ा प्रहार

वहीं, पश्चिम बंगाल की कहानी बिल्कुल जुदा और चौंकाने वाली है। वहां भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिल चुका है और 15 साल पुराने ममता बनर्जी के दुर्ग में सेंध लग चुकी है। भारतीय राजनीति की परिपाटी रही है कि हार के तुरंत बाद मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप देता है, लेकिन ममता बनर्जी ने 'नैतिक जीत' का हवाला देते हुए इस्तीफा देने से ही इनकार कर दिया। इस संवैधानिक संकट को देखते हुए राज्यपाल आर.एन. रवि ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 174 (2)(b) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए विधानसभा को ही भंग कर दिया। राज्यपाल के इस एक फैसले ने ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यकाल को तकनीकी और कानूनी रूप से समाप्त कर दिया है।

शपथ ग्रहण तक राज्यपाल के हाथों में राज्य की कमान

ममता बनर्जी के इस्तीफे न देने के फैसले ने बंगाल में एक नया प्रशासनिक शून्य पैदा कर दिया था। विधानसभा भंग होने के साथ ही अब राज्य की विधायी कमान राज्यपाल के पास आ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह राष्ट्रपति शासन नहीं है, बल्कि एक 'अंतरिम व्यवस्था' है। जब तक नई सरकार शपथ नहीं ले लेती, तब तक राज्यपाल ही राज्य के संरक्षक के रूप में कार्य करेंगे। बंगाल में अब सबकी निगाहें भाजपा के शपथ ग्रहण समारोह पर टिकी हैं, जबकि तमिलनाडु में हर किसी की धड़कनें इस बात पर रुकी हैं कि क्या विजय वो जरूरी 5 विधायक जुटा पाएंगे या राज्य एक बार फिर चुनाव की ओर बढ़ेगा? दोनों ही राज्यों के राज्यपाल इस समय भारतीय लोकतंत्र की शुचिता और संविधान की रक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

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