SP-BSP जोड़ो अभियान में लगीं ममता, अखिलेश के बाद मायावती से मिलेंगी

Update:2017-12-20 10:10 IST

योगेश मिश्र

कह रहीम कैसे निभें केर बेर के संग,

वे डोलत रस आपनों उनके फाटत अंग

उत्तर प्रदेश की सियासत में रहीम दास के इस दोहे को सार्थक साबित करने वाली सपा और बसपा के रिश्तों और रहीम के इस दोहे को गलत साबित करने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों जुटी हैं। वह अगले लोकसभा चुनाव के लिए सपा और बसपा के बीच मध्यस्थता की भूमिका मे इन दिनों हैं। उनकी कोशिश इन दोनों दलों के बीच एका कराकर नरेंद्र मोदी के अश्वमेघ रथ को उत्तर प्रदेश में रोकने की है।

पिछले लोकसभा चुनाव में सहयोगियों के साथ 73 सीटें मिली थीं। मायावती का हाथी शून्य पर सिमट गया था। कांग्रेस के पास सिर्फ दो हाथ बचे थे। समाजवादी पार्टी भी परिवार तक सिमट गई थी। भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने का अवसर उत्तर प्रदेश की इन 73 सीटों ने दिया था। किसी भी स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने के लिए उत्तर प्रदेश में 50 से अधिक सीटें चाहिए। ममता बनर्जी जानती हैं कि उनके प्रदेश में बीजेपी कोई बड़ा स्कोर नहीं खड़ा कर सकती है।

ये भी पढ़ें ...क्या होगा गुजरात के मुख्यमंत्री का फार्मूला, रिजल्ट ने उलझाई इक्वेशन

पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में फिलहाल बीजेपी के पास 2 ही हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 325 सीटें मिली थीं, जबकि 2014 के विधानसभा चुनाव में वह विधानसभा के लिहाज से भी तकरीबन इतनी ही सीटों पर आगे थी। उत्तर प्रदेश पहला प्रदेश है जहां लोकसभा से विधानसभा के तकरीबन ढाई साल में बीजेपी के ग्राफ में कोई अंतर नहीं आया है। इसलिए ममता की नज़रें उत्तर प्रदेश पर टिकी हैं। ममता के सपा और बसपा जोड़ो अभियान के तहत ही पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ममता बनर्जी से मुलाकात की थी। भरोसेमंद सूत्रों की माने तो जल्दी ही ममता बनर्जी की मुलाकात बसपा सुप्रीमो से होने वाली है।

ये भी पढ़ें ...हिमाचल प्रदेश : सबसे बड़ी पार्टी BJP में सबसे ज्यादा दागी विधायक

सूत्रों के मुताबिक, ममता की कोशिश दोनों को बराबर सीटों पर अगले लोकसभा चुनाव के लिए तैयार करना है। मायावती अपना वोट ट्रांसफर कराने की माहिर मानी जाती है पर सपा ने कभी भी वोट ट्रांसफर कराने का करिश्मा करके नहीं दिखाया है। सपा और बसपा के चार बार के कार्यकाल में यादव और दलितों के बीच के रिश्ते इतने तल्ख हुए हैं कि वे ममता बनर्जी की उम्मीद को पंख लगा पाएंगे यह मुश्किल हैं। बावजूद इसके उनकी कोशिश जारी है।

Tags:    

Similar News