यूपी में चुनाव नजदीक आते ही बढ़ी वोटकटवा दलों की सक्रियता

Update: 2016-07-13 11:25 GMT

लखनऊ: यूपी में चुनाव नजदीक आते ही वोटकटवा दलों की सक्रियता बढ़ गई है। यानि ऐसे दल जिनका प्रदेश स्तर पर भी ठीक-ठाक जनाधार नहीं है। पर वह अपनी जीत का दावा करने में आगे हैं। हर छोटे दल यह संभावना देख रहे हैं कि किस दल के साथ लामबंद होने पर आगामी चुनाव में मजबूत स्थिति हो सकती है और कुछ अकेले दम पर ही मैदान में उतरने को तैयार हैं।

सिम्बल मिला नहीं आर्थिक सहायता के लिए पेशकश शुरू

इसी तरह की एक पार्टी बहुजन सेना ने आर्थिक सहायता के लिए विज्ञापन दिया है। इसमें विधानसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों से 8 से 18 जुलाई तक संंपर्क करने को कहा गया है और साथ में कांशीराम और डा. भीमराव अंंबेडकर के मिशन का हवाला देते हुए आर्थिक मदद की भी पेशकश की गई है। खास बात यह है कि अभी तक इस पार्टी को सिम्बल मिला नहीं है।

-1952 में हुए पहले चुनाव में 53 सियासी दल हुए शामिल।

-2014 के चुनाव में 1600 से ज्यादा दल चुनाव मैदान में थे।

-बड़ी पार्टियों के सामने मुश्किल। इससे जीत के औसत मार्जिन में कमी आती है।

यूपी में सक्रिय हैं सैकड़ो छोटे दल

-यूपी में लगभग 120 छोटे दल हैं।

-जिनका वोट शेयर 0.2 प्रतिशत से लेकर 3.5 प्रतिशत तक है।

-ये दल राष्ट्रीय पार्टियों के ‘वोटकटवा’ की भूमिका में रहते हैं।

-पिछले चुनाव में इन दलों ने कई सीटों पर खेल बिगाड़ने का काम किया।

-जातीय वोट बैंक इन दलों का एजेंडा।

-फूलपुर, भदोही, प्रतापगढ़ और वाराणसी में अपना दल का प्रभाव।

-यही वजह है कि चुनाव में भाजपा ने इनसे हाथ मिलाया।

-कुर्मी जाति के समीकरण के साथ महान दल।

-राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी ने 2009 में यूपी की मोहनलाल गंज लोस क्षेत्र से 144341 मत पाये।

-मथुरा में राष्ट्रीय लोकहिन्द पार्टी, झांसी में राष्ट्रीय समानता दल और डुमरियागंज में पीस पार्टी ने का प्रभाव।

क्या कहते हैं बसपा के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर

बसपा के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर का कहना है कि ये वोटकटवा दल हैं और ऐन चुनाव के पहले आते हैं और चुनाव के बाद कहीं दिखाई नहीं देते। जनता भी ऐसे लोगों को समझती है। बसपा के वोटर चट्टान की तरह उसके साथ खड़े हैं।

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