Gorakhpur News: बच्चों को शांत कराने को मोबाइल दे रहे, थम रहा मानसिक और शारीरिक विकास, मेडिकल कॉलेज के आकड़े बढ़ा रहे चिंता

Gorakhpur News: बीआरडी मेडिकल कॉलेज स्थित सीआरसी में बीते छह साल में आटिज्म के 4700 बच्चे पंजीकृत हुए हैं। इनमें से 2572 वर्चुअल आटिज्म के मरीज हैं। खास बात यह है कि कोविड से पहले ज्यादातर पंजीकृत बच्चों में क्लासिकल आटिज्म था।;

Update:2025-04-02 09:00 IST

बच्चों को शांत कराने को मोबाइल दे रहे, थम रहा मानसिक और शारीरिक विकास   (photo:  social media )

Gorakhpur News: 2 अप्रैल को आटिज्म दिवस है। बच्चों में यह जिस तरह तेजी से बढ़ रहा है, यह महामारी का रूप ले रहा है। बच्चों को शांत कराने से लेकर उनकी जिद को पूरा करने को अभिभावक मोबाइल देकर अपनी जिम्मेदारी भूल रहे हैं। ऐसे में बच्चे आटिज्म के शिकार हो रहे हैं। नतीजा यह है कि बच्चों का मानसिक ही नहीं शारीरिक विकास रूक रहा है। गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में 2500 से अधिक मामले पहुंच चुके हैं।

राप्तीनगर क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक दंपति की चार वर्ष की बेटी है। वह जब नौ माह की थी तब मां ने उसे दूध पिलाने के लिए मोबाइल देखने की लत लगा दी। अब वह बिना मोबाइल नहीं रह पाती है। दिन में माता-पिता अलग-अलग विद्यालयों में जाकर बच्चों को पढ़ाते हैं। परिवार में बुजुर्ग गार्जियन के नाम पर सिर्फ नानी हैं। अब मासूम आटिज्म से पीड़ित हो गई है। वह सही से बोल नहीं पाती। इसके कारण उसकी आंखों पर भी असर पड़ रहा है। आकड़े तस्दीक कर रहे हैं कि गोरखपुर, बस्ती व आजमगढ़ मंडल में इस प्रकार के करीब 2572 मामले हैं। इन्हें वर्चुअल आटिज्म कहते हैं। इन बच्चों का जन्म तो सामान्य हुआ था। इनके विकास में मोबाइल और टीवी का शौक अवरोध बन गया। माता-पिता अपनी व्यस्तताओं की वजह से बच्चों के हाथ में मोबाइल, लैपटॉप, आईपैड या टीवी का रिमोट पकड़ा रहे हैं। यह बच्चों को आटिज्म की बीमारी दे दी है। डिजिटल दुनिया में गोते लगा रहे बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास नहीं हो पा रहा है। सीआरसी के निदेशक जितेंद्र कुमार यादव ने बताया कि क्लासिकल आटिज्म प्रीमेच्योर डिलीवरी, हाइपाक्सिया, झटके आना या जेनेटिक कारण से होता है। जबकि वर्चुअल आटिज्म मोबाइल, टीवी, लैपटॉप, आईपैड से बच्चों के जुड़ने के कारण होता है।

बीआरडी में 4700 बच्चे पंजीकृत

बीआरडी मेडिकल कॉलेज स्थित सीआरसी में बीते छह साल में आटिज्म के 4700 बच्चे पंजीकृत हुए हैं। इनमें से 2572 वर्चुअल आटिज्म के मरीज हैं। खास बात यह है कि कोविड से पहले ज्यादातर पंजीकृत बच्चों में क्लासिकल आटिज्म था। कोरोना के दौरान या उसके बाद वर्चुअल आटिज्म के मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। बच्चों के डॉक्टर आरके पांडेय का कहना है कि आटिज्म एक डिसऑर्डर है। माताएं अब तो स्तनपान की उम्र वाले बच्चों को मोबाइल की लत लगा दे रही हैं। ऐसे बच्चे धीरे-धीरे एकांकी होते जा रहे हैं। दो साल की उम्र से बच्चों में इसका लक्षण दिखने लगता है। उनका शारीरिक और मानसिक विकास सही से नहीं हो पा रहा है। पुनर्वास से आटिज्म के प्रभाव को सीमित किया जा सकता है।

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