मेड इन चाइना को गुड बॉय कहना आसान नहीं

हम यह क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि चीन हमारा कभी दोस्त नहीं हो सकता। लेकिन हमारी सरकारें हमेशा भ्रम पाले हुए हैं और दोस्ती के लिए लालायित रहती हैं।

मदन मोहन शुक्ला

चीन ने एक बार फिर 1962 की याद दिला दी। हिंदी-चीनी भाई भाई की आड़ में जो किया था उसकी पुनरावृत्ति फिर 2020 में हो गयी। हमारे निहत्थे सैनिकों को जान गंवानी पड़ी। अब हमारे नेता अपने बंकरों से बाहर आकर टीवी चैनलों पर काबिज़ हो गए हैं और वहीं से चीन पर गोले पे गोले दाग रहे हैं। सैनिकों की जाँबाज और जोश से लबरेज़ कुर्ता धारी वीरों को चीनी सैनिकों से आर पार की लड़ाई के लिए मोर्चे पर भेज देना चाहिए।

जिनपिंग पर अतिविश्वास एक बहुत बड़ी चूक

हम यह क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि चीन हमारा कभी दोस्त नहीं हो सकता। लेकिन हमारी सरकारें हमेशा भ्रम पाले हुए हैं और दोस्ती के लिए लालायित रहती हैं। लेकिन चीन का मकसद मात्र अपने व्यापारिक हित्त को सर्वोपरि मानना है। मोदी सरकार की उदारनीति और शी जिनपिंग चीनी राष्ट्रपति पर अतिविश्वास एक बहुत बड़ी चूक रही। क्या कारण था कि पिछले छह साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति की 18 मुलाकातें हुई? इसमें जो वार्ता हुई उसका क्या निष्कर्ष रहा? वो कौन से कारण थे कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने अपने 6 साल के कार्यकाल में चीन के नौ दौरे किये और मिला क्या?

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जिसको अपना सबसे बड़ा दोस्त समझा उसी ने पीठ में छुरा भोंक दिया। हमारे नेता जो सत्ता में हैं चीख चीख कर कह रहें है चीनी सामान का वहिष्कार करो। एक मंत्री जी तो यहां तक कह गए चीनी खाने का लोग बहिष्कार करें। सवाल यहां फिर उठता है चीनी खाना यहां चीनी नहीं बनाता। इस खाने की बदौलत करोड़ों परिवार को रोज़गार मिला हुआ है। उनका घर चलता है। रोज़गार तो सरकार दे नहीं पा रही। जो रोजगार में हैं उनकी भी रोटी छीनने की मंशा मंत्री जी ज़ाहिर कर चुके हैं।

चीन का भारत से व्यापार करीब 5.7 लाख करोड़

दूसरा सवाल चीनी सामान के वहिष्कार का,जिस पर बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं। वो केवल भ्रमित करने वाले हैं जबकि असलियत कुछ और है। कैसे संभव है कि चीनी सामानों को हम एक झटके में तिलांजलि दे दें। सोशल मीडिया में जो खबरें तैर रही हैं जिसके परिणाम स्वरूप कई जगह लोगों ने सामानों को आग के हवाले कर दिया। अगर ऐसा हुआ है तो नुकसान चीन का नहीं, आपकी गाढ़ी कमाई का हो रहा है। चीन को तो उसका पैसा मिल गया है। मानिए दिल्ली के सदर बाज़ार या सिलीगुड़ी के व्यापारी ने पैसा देकर सामान अपने यहां डंप कर लिया है। इसका बहिष्कार करने का मतलब मरेगा भारतीय व्यापारी न कि चीन क्योंकि उसको तो इसका पैसा मिल चुका है।

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चीन भारत को बेचता है मशीनरी, टेलीकॉम उपकरण, बिजली से जुड़े उपकरण, ऑर्गेनिक केमिकल्स यानि जैविक रसायन और खाद। भारत के रसोईघर से लेकर बेड रूम में एयर कंडीशनिंग मशीनों की शक्ल में,मोबाइल फ़ोन और डिजिटल वॉलेट के रूप में चीन किसी न किसी रूप में मौजूद है। कुछ नया मिले सस्ता मिले बहुत सुंदर मिल जाये ,जब हर ग्राहक की मांग होती है तो व्यापारी के पास चीनी सामान के अलावा दूसरा विकल्प नहीं होता है। चीन का भारत से व्यापार करीब 5.7लाख करोड़ (75बिलियन डॉलर)और भारत का चीन से केवल 1.37 लाख करोड़ (15बिलियन डॉलर) का है।

भारतीय बाजार पर चीन का कब्ज़ा

स्मार्ट फ़ोन में हर 10 में 8 चीनी ब्रांड है। 2लाख करोड़ के मार्केट में 1.44लाख करोड़ केवल चीन का निवेश है। स्मार्ट टीवी के 25 हज़ार करोड़ के मार्किट में 45% पर चीनी पकड़ है। टेलीकम्यूनिकेशन के 12हज़ार करोड़ में 25%निवेश चीन का, ऑटो में 75 बिलियन में 15 अरब चीन का है। सोलर पावर मार्किट में 90 %प्रोजेक्ट चीन के पास है। इसी तरह 108 लाख मीट्रिक टन स्टील मार्किट में 70% पर चीनी पकड़ है। सवाल फिर वही बहिष्कार की शुरुवात कहाँ से हो यह मोदी सरकार को तय करना है साथ में इसका विकल्प और आर्थिक नुकसान को भी ध्यान में रखना होगा। चीन ने भारत मे 6 बिलियन डॉलर से भी ज़्यादा का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कर रखा है। तकनीकी क्षेत्र में निवेश की प्रकृति के कारण चीन ने भारत पर अपना कब्जा जमा लिया है।

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2018 में कारोबारी रिश्तों ने एक नई ऊंचाई हासिल की, इस साल दोनों के बीच करीब 95.54 बिलियन डॉलर का कारोबार हुआ। कारोबार बढ़ने का कतई यह मतलब नहीं कि फायदा दोनों का हो रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक 2018 में भारत-चीन के बीच 95.54 बिलियन डॉलर का व्यापार हुआ लेकिन इसमें भारत ने जो सामान निर्यात किया वो केवल 18.84 बिलियन डॉलर का था। इसका मतलब चीन ने भारत से कम समान खरीदा और चार गुने से ज़्यादा का सामान भारत को बेचा। ऐसे में इस डील में चीन को ज़्यादा फायदा हुआ। 2018 में चीन के साथ व्यापार में 57.86 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। साफ है चीनी सामान को गुड बाई कहने से पहले भारत को दूसरे सस्ते और टिकाऊ विकल्प तलाशने होंगे।

चीनी उत्पादों को बंद करने में ज्यादा नुकसान भारत का

चीन के द्वारा सबसे ज्यादा नुकसान भारत के खिलौना उद्योग को हुआ है। चाइनीज खिलौनों की लागत इतनी कम है कि कोई भी भारतीय कम्पनी चीन की प्रतियोगिता का मुकाबला करने में असमर्थ है। पिछले साल भारतीय खिलौनों के केवल 20% बाजार पर भारतीय कंपनियों का अधिकार था बाकी के 80% बाजार पर चीन और इटली का कब्ज़ा था। एसोचैम के एक अध्ययन के अनुसार पिछले 5 साल में 40% भारतीय खिलौना बनाने वाली कम्पनियां बंद हो चुकी हैं और 20 % बंद होने की कगार पर हैं। भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि डब्ल्यूटीओ नियमों के कारण अब किसी देश से आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है चाहे कितनी भी राजनायिक, सैन्य और क्षेत्रीय तनाव और समस्या हो।

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यहाँ पर यह बात भी ध्यान दिलाने योग्य है कि भारत अपने कुल निर्यात का 8% चीन को भेजता है जबकि चीन अपने कुल निर्यात का केवल 2% भारत को भेजता है। इस प्रकार यदि भारत चीन के उत्पादों को बंद करता है तो चीन भी ऐसा ही करेगा जिससे ज्यादा नुकसान चीन का ना होकर भारत का और उसके निवासियों का होगा। यदि भारत ने इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों पर रोक लगा भी दी तो भी इतनी जल्दी इन चीजों का उत्पादन भारत में शुरू नहीं हो सकता क्योंकि इसमें अधिक समय और अधिक निवेश की जरूरत होती है।

भारत क्या कर सकता है?

डब्ल्यूटीओ नियमों के कारण भारत चीन के सामान पर प्रत्यक्ष नियंत्रण तो नहीं लगा सकता लेकिन भारत सरकार चीनी सामान पर “एंटी डंपिंग ड्यूटी” जरूर लगा सकती है। यह एक प्रकार का शुल्क है जिससे चीनी वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाएंगी और भारतीय उत्पादक उनका मुकाबला कर सकेंगे। यदि चीन के उत्पादक इस ड्यूटी की वजह से भारत में सामान नहीं भेजते हैं तो भारतीय उत्पादक उन्हें भारत में बनाना शुरू करेंगे।

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जिससे हमारे देश में रोजगारों का सृजन होगा और हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। अब हालातों को देखते हुए इतना अवश्य कहा जा सकता है कि चीन के उत्पादों को भारत में घुसने से भारत सरकार नहीं बल्कि भारत के लोग अवश्य ही रोक सकते हैं। हम थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली वाली विचारधारा को अपनाना ही होगा तभी हमारे देश के हाथ मजबूत होंगे।

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लोकल फ़ॉर वोकल का नारा जमीन पर उतरना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि सरकार औद्योगिक क्लस्टर विकसित करें और उद्योगों को सहयोग दे ताकि उत्पादन की लागत कम हो और उत्पादकता में वृद्धि हो।मेड इन इंडिया सामान की गुणवत्ता में भी सुधार ज़रूरी है। छोटे उद्योगों को स्टार्टअप से जोड़कर विकास की एक नई दिशा दी जा सकती है।

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हमें जातिगत एवं दलगत राजनीति से ऊपर उठकर केवल विकास पर ही ध्यान केंद्रित करना होगा तथा देश मे साम्प्रदायिक सौहार्द होगा तभी देश में विकास की गंगा बहेगी हमें जो स्वर्णिम अवसर मिला है उसको हाथ से नहीं जाने देना है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)