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लद्दाख में चीन मुंह की खाएगाः ये भरोसेमंद साथी साबित होगा गेम चेंजर

कोरोना वायरस की वजह से देश में लॉकडाउन जारी है। दुनियाभर के तमाम देशों की तरह ही लॉकडाउन की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था भी डगमगाई हुई है।

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ShreyaBy Shreya

Published on 10 Jun 2020 5:19 AM GMT

लद्दाख में चीन मुंह की खाएगाः ये भरोसेमंद साथी साबित होगा गेम चेंजर
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नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच तनाव जारी है। पहले तो चीन से शुरू हुए कोरोना वायरस की वजह से पूरा देश परेशान है और अब चीन ने पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर नापाक हरकत कर उलझन बढ़ा दी है। हालांकि भारत चाहे तो दोनों ही मुद्दे पर चीन को मुंहतोड़ जवाब दे सकता है। हालांकि अब भारत को चीनी अर्थव्यवस्था से मुकाबला करना है। साथ ही अब बारी है भारतीय सामरिक तैयारियों में लद्दाखी बैक्ट्रियन ऊंट के इस्तेमाल करने की।

भारत के लिए बैक्ट्रियन कैमल साबित हो सकता है गेम चेंजर

कोरोना वायरस की वजह से देश में लॉकडाउन जारी है। दुनियाभर के तमाम देशों की तरह ही लॉकडाउन की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था भी डगमगाई हुई है। लेकिन साल 1979 में आर्थिक सुधार के बाद चीन भी आर्थिक मोर्चे पर मुंह के बल गिरा है। वहीं अगर LAC पर तनातनी से गिरती अर्थव्यवस्था की बात करें तो भारत के लिए बैक्ट्रियन कैमल गेम चेंजर साबित हो सकते हैं।

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हेरिटेज एनिमल में शामिल करने पर चर्चा

बैक्ट्रियन कैमल वो ऊंट हैं जिन पर कभी सिल्क रूट का सारा व्यापार निर्भर था। लेकिन अब रिसर्च इकोनॉमिस्ट शेली शौर्य ने इन्हें हेरिटेज एनिमल की कैटेगरी में शामिल करने की बात कही है। इसे लेकर रिसर्च इकोनॉमिस्ट शेली शौर्य ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) समेत अन्य मंत्रालय को भी पत्र लिखा है।

प्रोडेक्टिविटी और सेना दोनों के लिए फिट हैं बैक्ट्रियन कैमल

अगर मौजूदा स्थिति की बात करें तो लद्दाख का बैक्ट्रियन कैमल प्रोडेक्टिविटी और सेना दोनों ही के लिए फिट बैठता है। इनमें खासकर नुब्रा घाटी और लद्दाख को समृद्ध बनाने की क्षमता है। बैक्ट्रियन कैमल सेना के लिए एक अच्छे ट्रांसपोर्टर के तौर पर काम आ सकते हैं। खासकर ऐसी जगहों पर भी जहां पर वाहनों की आवाजाही संभव नहीं है। भारतीय सेना ने इसे अपने बेड़े में शामिल करने पर पहले ही विचार कर चुकी है।

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पैंगोंग झील के किनारे कुछ जगह वाहनों की आवाजाही मुश्किल

दरअसल, चीनी सेना झील के किनारे बीते कुछ सालों से सड़क निर्माण में लगी हुई। चीन ने भारत-पाकिस्तान के बीच साल 1999 में चल रहे कारगिल युद्ध के समय भी मौके का फायदा उठाते हुए भारतीय सीमा में झील के किनारे पर पांच किलोमीटर लंबी सड़क बना ली थी। अब भारत भी तेजी से सड़क निर्माण कर रहा है, जिससे चीन बौखलाया हुआ है। पैंगोंग झील के किनारे कुछ रास्ते ऐसे हैं, जहां पर वाहनों की आवाजाही बहुत मुश्किल है।

ये है बैक्ट्रियन कैमल की खासियत

नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल और सेंट्रल सिल्क बोर्ड के कंसल्टेंट शेली शौर्य ने बताया कि बैक्ट्रियन कैमल एक ऐसा जानवर है, जो खारा पानी तक पी सकता है। यहीं नहीं ये रस्सी, कपड़ा, कांटेदार भोजन तक को आसानी से पचा सकते हैं। बता दें कि पैंगोंग झील का पानी भी खारा है, इसलिए बैक्ट्रियन कैमल सेना के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकते हैं।

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65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक दौड़ सकते हैं

दो-कूबड़ वाले बैक्ट्रियन कैमल लंबे वक्त तक बिना पानी पिए रह सकते हैं। यह अपने पास 60 से 65 लीटर तक पानी जमा कर रख सकते हैं। यह भोजन को अपने कूबड़ में संग्रहीत कर लेते हैं। दो कूबड़ होने की वजह से ये एक कूबड़ वाले से ज्यादा प्रभावी होते हैं। जानकारी के मुताबिक ये बहुत अच्छे वॉकर और साथ ही तेज धावक होते हैं। ये 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक दौड़ सकते हैं।

नुब्रा घाटी के अर्थशास्त्र को बदलने की दमदार क्षमता

बैक्ट्रियन ऊंट के पास घंटो तक चलने की क्षमता होती है। ये रोजाना तकरीबन 50 से 60 किलोमीटर की दूरी एक अच्छी गति के साथ तय करने में सक्षम हैं। साथ ही 170 से 240 किलोग्राम तक के बीच भार ले जाने की क्षमता है। शेली के मुताबिक, लद्दाख के बैक्ट्रियन ऊंट में नुब्रा घाटी के अर्थशास्त्र को बदलने की दमदार क्षमता होती है।

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भयंकर ठंड आसानी से सहने की क्षमता

ये भयंकर ठंड आसानी से सह लेते हैं और बर्फ पर तेजी से चलने में भी सक्षम हैं। इन लद्दाखी कैमल के बालों से शॉल और स्वेटर, अन्य कपड़े बनाए जा सकते हैं। इनकी कीमत की अगर बात की जाए तो यह पश्मीना की तरह होगी, बल्कि उससे ज्यादा भी हो सकती है।

शुगर पेशेंट्स के लिए बहुत फायदेमंद है इनका दूध

बैक्ट्रियन कैमल का दूध भी काफी फायदेमंद होता है। शेली के मुताबिक, इनकी स्तनपान अवधि तकरीबन 14 से 16 महीने तक होती है। अगर इनकी अच्छे से देखभाल की जाए तो रोजाना पांच से सात लीटर तक दूध आसानी से मिलता है। इसके एक लीटर दूध की कीमत 2500 से 3500 रुपये के बीच होती है। बैक्ट्रियन कैमल का दूध शुगर पेशेंट्स के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसके चीज (cheese) की कीमत 20 हजार रुपये प्रति किलो से ज्यादा बताया जाता है। विदेशों में इनकी बहुत मांग है।

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इसलिए इन पर विचार करने की जरूरत

शेली का मानना है कि कपड़ा मंत्रालय को बैक्ट्रियन कैमल को भारतीय राष्ट्रीय सिल्क विरासत पशु एलेन कर देना चाहिए। क्योंकि एक समय में सिल्क रूट इन्हीं पर चलता था और जो लद्दाख से होकर आगे पाक अधिकृत कश्मीरल (PoK) होते हुए कजाकिस्तान, इजिप्ट व यूरोप तक जाता था। उस दौर में ह्वेनसांग और फाह्यान जैसे खोजी चीनी यात्री सिल्क रूट से बैक्ट्रियन कैमल के सहारे ही भारत पहुंचे थे।

यहीं नहीं मार्कोपोलो भी बैक्ट्रियन कैमल के सहारे ही भारत आया था। सिल्क रूट पर आज भी चीन के कुछ शहर काशी, तर्पण, कासघर, डुन्हुअंग या धनु-अंग पड़ते हैं। खरोष्ठी और अन्य लिपियां भी मिली हैं। ऐसे में चीन को इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि उसकी सभ्यता और आर्थिक विकास में भारत का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। शेली ने कहा कि बैक्ट्रियन कैमल को हेरिटेज एनिमल घोषित करने पर विचार करना चाहिए।

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