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कोरोना के बाद मनोरोगों की होगी चुनौती, बदलना पड़ सकता है उपचार का तरीका

कोरोना महामारी के बाद चिकित्सकों के सामनेे सबसे बड़ी चुनौती मानसिक रोगों से निपटने की होगी। इसको देखते हुए राजधानी लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय ने आनलाइन सर्वे भी शुरू कर दिया है।

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ShreyaBy Shreya

Published on 23 April 2020 12:34 PM GMT

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लखनऊ: कोरोना महामारी के बाद चिकित्सकों के सामनेे सबसे बड़ी चुनौती मानसिक रोगों से निपटने की होगी। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि लॉकडाउन की वजह से लोगों में व्यापार, नौकरी, कमाई और बचत को खोने डर भी इसका एक बड़ा कारण है। ऐसे में चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यह नए तरीके के मानसिक रोग होंगे इसलिए आने वाले समय में मानसिक चिकित्सा के उपचार के तरीके को भी बदलना पड़ सकता है। इसको देखते हुए राजधानी लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय ने आनलाइन सर्वे भी शुरू कर दिया है।

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केजीएमयू ने शुरू किया आनलाइन सर्वे

देश में मनोचिकित्सकों की सबसे बड़ी एसोसिएशन इंडियन साइक्रेटिक सोसाइटी के सर्वे के मुताबिक कोरोना वायरस के आने के बाद देश में मानसिक रोगों से पीड़ित मरीजों की संख्या 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गई है। सर्वे बताता है कि मरीजों की ये संख्या देश में लाकडाउन लागू होने के तीन-चार दिन बाद से ही बढ़ना शुरू हुई है। ऐसे में कोरोना से निजात मिलने के बाद मानसिक बीमारियों के मरीज ज्यादा देखने में आयेंगे।

इसलिए उत्पन्न होती है एंग्जायटी डिसआर्डर की समस्या

केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के डा. आदर्श त्रिपाठी बताते हैं कि महामारी के दौरान लोग एक अज्ञात भय से ग्रस्त रहते हैं। इसके साथ ही जब लाकडाडन और सोशल डिस्टेंसिंग जैसी स्थितियां जुड़ जाती हैं तो अकेलेपन के कारण उनमे एंग्जायटी डिसआर्डर होने लगता है। लोग चिडचिड़े हो जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होने लगते है।

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मानसिक रोगों के मरीज में हो रही बढ़ोत्तरी

वह बताते हैं कि जो देश सार्स और मर्स जैसे रोगों से प्रभावित हुए है वहां भी देखा गया कि बीमारी समाप्त होने के साल भर बाद वहां मानसिक रोगों के मरीज बड़ी संख्या में सामने आये। उन्होंने बताया कि सार्स के बाद हुए सर्वे में सामने आया कि वहां सात प्रतिशत में एंग्जायटी और 17 प्रतिशत में गुस्से के लक्षण देखे गये।

तीन साल बाद भी क्वारंटीन के तनाव का असर

अध्ययन में सार्स फैलने के दौरान हुई समस्याओं का भी जिक्र किया गया है। कहा गया है कि बीमारी खत्म होने के बाद करीब 26 फीसदी लोग नियमित तौर पर भीड़भाड़ वाले इलाके में जाना छोड़ दिया था और 21 फीसदी ने पूरी तरह से सार्वजनिक जगह पर जाना छोड़ दिया था। सार्स के चलते अस्पताल कर्मचारियों पर क्वारंटीन के तनाव का असर तीन साल बाद तक देखा गया था।

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क्वारंटीन की वजह से बच्चों में 4 गुना अधिक तनाव

डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि चीन के लोगों पर हुए एक अध्ययन में बताया गया कि वहां लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी लोग अपने बगल से किसी के गुजरने पर चौंक जाते हैं। क्वारंटीन में रहने वालों में 73 फीसदी में उदासी और 57 फीसदी में चिड़चिड़ेपन की शिकायत सामने आयी, जबकि क्वारंटीन की वजह से बच्चों में चार गुना अधिक तनाव पाया गया।

ऑनलाइन सर्वे में किए जाएंगे ये सवाल

उन्होंने बताया कि केजीएमयू के ऑनलाइन सर्वे में लोगों से कोरोना महामारी व लॉकडाउन के संबंध में उनकी समस्याओं के बारे में सवाल किए जायेंगे। जिसमें इस दौरान उनकी दिनचर्या, तनाव की स्थिति और भविष्य की चिंताओं के संबंध में सवाल कर उनके जवाबों का डाटा बैंक बनाया जायेगा। इस डाटा बैंक का आकलन करके इलाज का तरीका विकसित किया जायेगा।

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बदलना पड़ सकता है उपचार का तरीका

मनोचिकित्सक डॉ. शाश्वत सक्सेना के मुताबिक कोरोना वायरस के बाद संभावित मानसिक रोगों मे तो मनोचिकित्सा का उपचार का तरीका भी बदलना पड़ेगा। उनका कहना है कि अभी जो लोग अवसाद, घबराहट या चिड़चिड़ेपन की शिकायत लेकर आते हैं तो मनोचिकित्सक उन्हें लोगों से ज्यादा मिलने-जुलने और कम से कम अकेले रहने को कहा जाता है। कोरोना वायरस के कारण लाकडाउन भले ही खत्म हो जाए लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग का पालन लंबे समय तक करना पड़ सकता है। ऐसे में मानसिक रोगियों के उपचार के तरीके में बदलाव भी करना पड़ सकता है।

WHO ने मानसिक रोगों से बचने के लिए जारी किए गाइलाइन

इसी को देखते हुए मनोरोग एसोसिएशन ने भी अपने सदस्यों से हर मरीज का डाटा रखने को कहा है तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मानसिक रोगों से बचने के लिए गाइडलाइन तक जारी की है। जिसमें कहा गया है कि इस दौरान अपनी सोच को सकारात्मक बनाये रखे, अपनी दिनचर्या को पूर्ववत रखे और व्यायाम करने के साथ ही शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के विकास के लिए हरी सब्जियां, दाल, फल, दूध, दही का सेवन करें तथा प्राकृतिक संगीत को सुने।

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रिपोर्टर- मनीष श्रीवास्तव

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