फिर हरा करना चाहते हैं बाटला इनकाउन्टर का जख्म, जानिए पूरी कहानी

आजमगढ़ की पहचान ऋषियों-मनीषियों की तपोस्थली और विद्वानों-साहित्यकारों की जन्मस्थली से थी, उस आजमगढ़ को आतंकगढ़ और आतंकियों की नर्सरी कहा जाने लगा। अपने ऊपर लगे इस बदनुमा दाग से आजमगढ़ जहां मर्माहत हुआ, वहीं यहां के युवाओं के लिए गैरजनपदों व गैरप्रान्तों में रोजगार के रास्ते भी बन्द हो गये। पूरे देश में यहां के लोगों को शक-संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा।

संदीप अस्थाना

आजमगढ़: आजमगढ़ के सीने पर लगा बाटला का जख्म अब सूख चुका है। इसके विपरीत यहां के विवादित मुस्लिम नेता आमिर रशादी उस जख्म को फिर हरा करना चाहते हैं। इसके लिए वह नस्तर लेकर तैयार नजर आ रहे हैं और बाटला की बरसी के बहाने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने के लिए इस बार भी कूच करने की प्रतिबद्धता दोहरा रहे हैं।
19 सितम्बर 2008 को दिल्ली में हुए बाटला हाउस मुठभेड़ ने आजमगढ़ की पूरी तस्वीर ही बदलकर रख दी।

आजमगढ़ की पहचान ऋषियों-मनीषियों की तपोस्थली के रूप में

जिस आजमगढ़ की पहचान ऋषियों-मनीषियों की तपोस्थली और विद्वानों-साहित्यकारों की जन्मस्थली से थी, उस आजमगढ़ को आतंकगढ़ और आतंकियों की नर्सरी कहा जाने लगा। अपने ऊपर लगे इस बदनुमा दाग से आजमगढ़ जहां मर्माहत हुआ, वहीं यहां के युवाओं के लिए गैरजनपदों व गैरप्रान्तों में रोजगार के रास्ते भी बन्द हो गये। पूरे देश में यहां के लोगों को शक-संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा।

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बाटला हाउस मुठभेड़ में आजमगढ़ जिले के सरायमीर थाना क्षेत्र के संजरपुर गांव के रहने वाले दो लड़के आतिफ अमीन पुत्र मो.अमीन एवं मो. साजिद उर्फ छोटा साजिद पुत्र अंसारूल हसनान मारे गये थे। सुरक्षा एजेन्सियों ने कई को फरार हो जाना बताया। बाद में विभिन्न आतंकी वारदातों में संलिप्तता के आरोप में 15 लड़के गिरफ्तार किये गये तथा कई अभी भी फरार चल रहे हैं। कहा जा रहा है कि फरार हुए इन आरोपित लड़कों ने कट्टर इस्लामिक देशों में शरण ले ली है और वह देश की सुरक्षा एजेन्सियों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं।

राष्ट्रीय अध्यक्ष बने आमिर रशादी रातों- रात हजार पति से करोड़पति बन गये

बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद आजमगढ़ का सियासी पारा भी तेजी से चढ़ा। इसी मुठभेड़ की कोख से एक नये सियासी दल का उदय हुआ। इस संगठन का नाम उलेमा कौंसिल रखा गया। इसका गठन शहर स्थित जमार्तुरशात मदरसे के नाजिम आमिर रशादी ने किया और इसकी पहली बैठक 20 अक्टूबर 2008 को हुई।

इस पहली बैठक में कहा गया कि यह गैर राजनीतिक मंच है और इसका मकसद आतंकवाद के नाम पर फंसाये गये निर्दोष मुस्लिम लड़कों की लड़ाई लडना होगा। जिले के मुसलमानों ने इस संगठन को हाथों हाथ उठा लिया।

परिणाम यह रहा कि इस संगठन का गठन करके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने आमिर रशादी रातो रात हजार पति से करोड़पति बन गये। भारी-भरकम बैंक बैलेंस के साथ उनके पास मंहगी गाडियों का लम्बा काफिला हो गया। साथ ही जिले के हर कोने में उनके समर्थकों व कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी हो गयी। ऐसे में श्री रशादी की महत्वाकांक्षायें उद्वेलित होने लगी।

इस संगठन के गठन के 6 माह बाद ही अप्रैल 2009 में लोकसभा का आम चुनाव था। चुनाव के ठीक पहले अपने संगठन का राजनीतिकरण करते हुए उन्होंने संगठन के बैनर से प्रत्याशी लड़ाने का ऐलान कर दिया और इस संगठन का नाम राष्ट्रीय उलेमा कौंसिल कर दिया।

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जिले की दोनों लोकसभा सीटों आजमगढ़ व लालगंज सीट पर इस संगठन के प्रत्याशी को करीब दो-दो लाख मत मिले। इसके साथ ही बाटला काण्ड की हर बरसी पर यह संगठन दिल्ली जाकर धरना-प्रदर्शन करता रहा। यह अलग बात है कि आतंकी वारदातों में आरोपित लड़कों को न्याय दिलाने के लिए कोई जमीनी लड़ाई न लड़ पाने के कारण यह संगठन जिले के मुसलमानों की नजर में गिर गया और लोगों ने इससे दूरी बना ली।

ऐसा नहीं है कि बाटला इनकाउन्टर के बाद सियासत केवल राष्ट्रीय उलेमा कौंसिल ने ही की। सपा, बसपा के आला हाकिम भी संजरपुर गांव में पहुंचकर आग में घी डाले और इस इनकाउन्टर के लिए केन्द्र और दिल्ली प्रदेश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराये।

आतंकवाद के नाम पर यहां के लोग प्रताड़ित हुए हैं

इसी का नतीजा रहा कि इस जिले के रहने वाले सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव जब संवेदना व्यक्त करने संजरपुर पहुंचे तो उनके ऊपर पथराव किया गया। बाद में कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह भी यहां पर घडियाली आंसू बहाने के लिए आये थे। उन्होंने तो केन्द्र की अपनी सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था।

पीड़ित परिजनों के बीच उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बाटला इनकाउन्टर फर्जी है। यहां तक कि वह अपने सिर के बीच का हिस्सा दिखाते हुए कहे कि मासूम छोटा साजिद को यहां गोली मारी गयी थी। किसी भी असली मुठभेड़ में यहां गोली नहीं लग सकती है। कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद तो उनसे भी दो कदम आगे निकले थे। वह 2012 के विधानसभा चुनाव में जिले में आये तो कहा कि आजमगढ़ का दर्द समझते हैं वह।

उन्हें मालूम है कि आतंकवाद के नाम पर यहां के लोग प्रताड़ित हुए हैं। यहां तक कहा कि बाटला मुठभेड़ की तस्वीरें देखकर सोनिया जी की आंख में आंसू आ गये थे। सब मिलाकर बाटला मुठभेड़ का आजमगढ़ के सीने पर लगा जख्म अब सूख चुका है और लोग उसे भूलने लगे हैं, यह अलग बात है कि सियासी लोग बाटला को लेकर शुरू हुई सियासत को अभी भी जिन्दा रखना चाहते हैं। यही वजह है कि 11 वर्ष गुजर जाने के बाद भी बन्द बोतल से बाटला का जिन्न निकलकर फिर उठ खड़ा हुआ है और बाटला की इस बरसी पर भी उलेमा कौंसिल बड़ा सियासी ड्रामा करने के लिए दिल्ली कूच करने की तैयारी में है।

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सम्पन्न परिवार के हैं आतंकवाद में आरोपित नौजवान

आतंकवाद में आरोपित ज्यादातर लड़के सम्पन्न परिवार के हैं। बस एकाध ऐसे हैं, जिनकी माली हालत खराब है। साथ ही वह खुद पढ़े-लिखे थे और परिवार भी एजुकेटेड है। बाटला हाउस मुठभेड़ में मारा गया आतिफ अमीन जामिया से बीटेक कर रहा था। एक भाई दिल्ली में एक बड़े टीवी चैनल में नौकरी करता है। उसके वालिद लम्बे समय तक विदेश में रहकर काफी रूपया कमाये। कई एकड़ में पुश्तैनी खेती-बाड़ी है।

इसके अलावा यहां मारे गये छोटा साजिद की उस समय उम्र महज 17 वर्ष थी। वह हाईस्कूल पास करके जामिया में दाखिले के लिए गया था। उसके वालिद डाक्टर हैं। बड़ा भाई दुबई में एक मल्टीनेशनल कम्पनी में मोटी तनख्वाह पर टेलीफोन रिशेप्सनिस्ट के पद पर नौकरी करता था। सब मिलाकर रूपये-पैसे की कोई कमी नहीं थी।

आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार बाटला हाउस में रहने वाला सैफ गोविन्द बल्लभ पंत विश्वविद्यालय से इतिहास से एमए था। वह कम्प्यूटर व इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स कर रहा था। उसके वालिद सामाजिक कार्यकर्ता हैं और दो भाई विदेश में बेहतर तनख्वाह पर अच्छी नौकरी करते हैं। जिशान एमबीए करने के बाद मोनार इण्टरनेशनल कम्पनी विकास प्लाजा दिल्ली में मार्केटिंग मैनेजर के पद पर नौकरी पा गया था। उसके वालिद शहर के प्रतिष्ठित शिब्ली नेशनल इण्टर कालेज में प्रवक्ता हैं।

आरिफ नसीम इण्टरमीडिएट पास करके सीपीएमटी की तैयारी के लिए गया हुआ था। उसके वालिद विदेश रहते हैं तथा भाइयों का भी ठीक-ठाक कारोबार है। सलमान बीसीए में दाखिला चाहता था। उसके अब्बू लम्बे समय से खाड़ी देश में कमाते हैं। रूपये-पैसे की कोई कमी नहीं थी। मु. हाकिम बीटेक कर रहा था। उसके वालिद विद्युत विभाग के रिटायर्ड एसडीओ हैं। भाई अबू सालिम इंजीनियर, एक चाचा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, एक चाचा एमबीबीएस डाक्टर हैं। शाहजाद कम्यूटर से डिप्लोमा किया था।

उसकी सम्पन्नता का मूल्यांकन इसी से किया जा सकता है कि उसके परिजनों ने उसे तब लैपटाप खरीदकर दिया था जब जिले में दस-पांच गिने-चुने लोगों के पास ही लैपटाप था। इसी तरह की सम्पन्नता आतंकी वारदातों में आरोपित 95 फीसदी लड़कों की है। वैसे आरिफ बदर व मुफ्ती बशर जैसे कुछ गरीब युवक भी आतंकी वारदातों में आरोपित हैं।

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देश की जिन बड़ी आतंकी वारदातों में आया आजमगढ़ का नाम

देश की जिन बड़ी आतंकी वारदातों में आजमगढ़ का नाम आया और यहां के नौजवानों की संलिप्तता उजागर हुई उनमें 11 जुलाई 2006 को हुआ मुम्बई लोकल ट्रेन ब्लास्ट, 22 मई 2007 को हुआ गोरखपुर ब्लास्ट, 23 नवम्बर 2007 को वाराणसी, फैजाबाद व लखनऊ की कचहरियों में हुआ सीरियल ब्लास्ट, 13 मई 2008 को हुआ जयपुर ब्लास्ट, 26 जुलाई 2008 को हुआ अहमदाबाद ब्लास्ट, 13 सितम्बर 2008 को हुआ दिल्ली ब्लास्ट एवं 19 सितम्बर 2008 का बाटला हाउस मुठभेड़ प्रमुख है। इसके अलावा भी कुछ अन्य आतंकी वारदातों में जिले का नाम उभरकर सामने आया है।

अभी भी खाड़ी देशों पर ही निर्भर है आजमगढ़ की रोजी-रोटी

आजमगढ़ में आज भी कोई कल-कारखाना नहीं है। ऐसे में यहां के लोगों की रोजी-रोटी खाड़ी देशों पर ही निर्भर है। आजमगढ़ पहले काफी गरीब था। यहां कमाई का कोई साधन न होने के कारण बहुत पहले से यहां के लोगों के बीच परदेश जाने का चलन शुरू हुआ। पहले लोग कमाने के लिए वर्मा आदि देशों में जाया करते थे और कड़ी मेहनत किया करते थे। बाद के दिनों में खाड़ी देशों में जाने की परम्परा शुरू हुई। विदेशों में जाकर लोग खूब धन सम्पदा तो कमाये मगर वहां बसे नहीं। यहां के मिट्टी की महक उन्हें यहां खींच लायी। यहां आने के बाद लोग अपने रूपयों को बैंक में नहीं रखे, वरन खर्चीला व शौकिया मिजाज होने के कारण जमीन व गाडियां खरीदने तथा कोठी अट्टालिका बनाने पर धन खर्च किया।

यही वजह रही कि जो लोग विदेश गये वह तो अमीर हुए ही,उनके साथ इस जिले के विदेश न जाने वाले इसलिए सम्पन्न हो गये क्योंकि विदेश से कमाकर लाया गया रूपया जिले में खर्च हुआ और तमाम लोगों के बीच बंटा। कोई कल-कारखाना न होने के बावजूद आजमगढ़ की सम्पन्नता का राज भी यही है। विदेश से कमाकर लौटे लोगों का धन-वैभव देखकर युवाओं के बीच विदेश जाने की होड़ मची। आज लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी कोई मजबूरी नहीं कि उनके बच्चे विदेश जायें। बावजूद इसके विदेश जाना यहां के लोगों के बीच एक परम्परा का रूप ले चुका है। ऐसे में यहां के लोगों के बीच विदेश जाने और अधिक से अधिक रूपया कमाने की होड़ अभी भी कायम है।

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मोदी सरकार पर बढ़ा है आजमगढ़ के प्रबुद्ध मुसलमानों का भरोसा

देश की मोदी व प्रदेश की योगी सरकार के प्रति आजमगढ़ के मुसलमानों का भरोसा बढ़ा है। यहां के प्रबुद्ध मुसलमान कहते हैं कि देश व प्रदेश की इस बार की भाजपा सरकार में आजमगढ़ के किसी नौजवान को आतंकवाद के आरोप में आरोपित नहीं किया गया है। इससे साफ जाहिर होता है कि यह सरकार किसी भी निर्दोष को फर्जी नहीं फंसाना चाहती है। वह यह भी कहते हैं कि पूर्व की देश व प्रदेश की सरकारों ने यहां के मुसलमानों के साथ छल किया है और मुसलमानों को डराकर वोट हथियाने के लिए आतंकवाद में आरोपित किया गया।

जबकि सच यह है कि आजमगढ़ की माटी में जन्में युवक आतंकी हो ही नहीं सकते। वह कहते हैं भी कि एकाध अपवाद अलग बात है। बाटला इनकाउन्टर और उसके बाद एक साथ बड़ी तादात में पढ़े-लिखे, सम्पन्न परिवार के मुस्लिम नौजवानों को आतंकवाद के मामले में आरोपित किये जाने को वह एक कौम विशेष के साथ गहरी साजिश मानते हैं।

साजिश रचने वाले अपने मंसूबे में पूरी तरह से कामयाब हुए हैं

वह कहते हैं कि आजमगढ़ का मुसलमान देश के किसी भी हिस्से के मुसलमान से ज्यादा पढ़ा-लिखा है और हर क्षेत्र में वह तेजी से तरक्की कर रहा था। उसकी तरक्की रोकने के लिए ही उसे फंसाया गया। यह सोचा गया कि ऐसा हो जायेगा तो मुस्लिम लड़के और उनके अभिभावक सहम जायेंगे। अच्छी तालीम के लिए अभिभावक न तो अपने बच्चों को बाहर भेजेगा और न ही सहमे लड़के बाहर जाने की कूबत जुटा पायेंगे।

वह कहते हैं कि साजिश रचने वाले अपने मंसूबे में पूरी तरह से कामयाब हुए हैं। इसके साथ ही देश की मोदी व प्रदेश की योगी सरकार से उनकी अपेक्षायें बढ़ी हैं। वह कहते हैं कि अब तो उनको लगता है कि यही सरकार उनको न्याय दिला पायेगी। उनका यह भी मानना है कि यदि सरकार आतंकवाद में अब तक के आरोपितों के मामले में न्यायिक जांच करा दे तो सारा सच सामने आ जायेगा। सच सामने आने के बाद जो आतंकी साबित हो उसे सीधे गोली मार दी जाय और जो निर्दोष हो उसे बरी कर दिया जाय।

शाहिद बद्र को मिली जमानत से न्यायपालिका में भी बढ़ा विश्वास

आजमगढ़ के सीजेएम कोर्ट से सिमी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शाहिद बद्र को मिली जमानत से यहां के मुसलमानों का न्यायपालिका में विश्वास और भी बढ़ा है। प्रबुद्ध मुसलमानों का कहना है कि अब अपने देश में उनके साथ न तो कोई भेदभाव हो रहा है और न ही उनको फर्जी फंसाये जाने की ही घटनायें घट रही है। इस सरकार में जो भी अमनपसंद है, उसको अमन से रहने देने में कोई खलल नहीं पैदा कर रहा है।

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हुआ यह था कि वर्ष 2001 में भड़काउ भाषण देने, सरकारी कामकाज में बाधा उत्पन्न करने सहित विभिन्न धाराओं में दर्ज मुकदमें में गुजरात के कच्छ जिले के भुज सीजेएम कोर्ट से बीते 5 सितम्बर को वारंट लेकर गुजरात पुलिस आजमगढ़ आयी और शहर से सटे मनचोभा स्थित शाहिद बद्र के पैतृक गांव से जिले की पुलिस की मदद से उनको गिरफ्तार कर लिया। गुजरात पुलिस ने ट्रांजिट रिमांड के लिए 6 सितम्बर को शाहिद बद्र को आजमगढ़ केे सीजेएम आलोक कुमार की अदालत में पेश किया।

यहां के सीजेएम ने ट्रांजिट रिमांड देने की बजाय शाहिद बद्र के वकील अरूण कुमार सिंह, मुहम्मद खालिद व रफीक अहमद की दलील सुनने के बाद उनको इस शर्त पर जमानत दे दी कि वह 13 सितम्बर तक भुज के सीजेएम कोर्ट में पेश हों। शाहिद बद्र को मिली इस जमानत के खिलाफ गुजरात पुलिस ने 7 सितम्बर को आजमगढ़ जिला जज के यहां रिवीजन दाखिल किया जिसे जिला जज ने एडमिट कर लिया।

इस मामले में 9 सितम्बर को जिला जज के यहां सुनवाई हुई तो आवश्यक कागजात दाखिल करने के लिए गुजरात पुलिस ने समय मांग लिया। इस मामले में 11 सितम्बर को फिर सुनवाई शुरू हुई तोे शाहिद बद्र के वकीलों ने बताया कि उनके मुवक्किल 13 सितम्बर को भुज सीजेएम कोर्ट में हाजिर होने के लिए निकल चुके हैं। फिलहाल जिस मामले में भुज सीजेएम कोर्ट में शाहिद बद्र को वारंट जारी हुआ है, उस मामले में शाहिद बद्र सहित कुल 18 आरोपित थे और उसमें से 17 पहले ही बरी किये जा चुके हैं।

आजमगढ़ के मनचोभा गांव के रहने वाले शाहिद बद्र लम्बे समय तक प्रतिबंधित संगठन सिमी के अध्यक्ष रहे। उनके जीवन का लम्बा दौर जेल की सलाखों के पीछे गुजरा। अब जेल से छूटने के बाद शहर में अपना यूनानी दवाखाना चलाते हैं मगर उनके मन में व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा जस का तस है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डा. अहमदुल्ला सिद्दीकी ने 25 अप्रैल 1977 को सिमी का गठन किया और वही पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। फरवरी 2000 में आजमगढ़ जिले के मनचोभा गांव के रहने वाले डा. शाहिद बद्र के कंधे पर राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद की जिम्मेदारी डाल दी गयी। वह लम्बे समय तक राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे तथा उन्हीं के कार्यकाल में इस संगठन पर प्रतिबन्ध लगा।

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ऐसे में उन्होंने लम्बी जेल यातना भी सही। अब वह जेल से बाहर हैं और आजमगढ़ शहर में ही अपना यूनानी दवाखाना चलाते हैं। जेल से बाहर होने के बावजूद व्यवस्था के प्रति उनके तेवर अभी भी खासे तल्ख हैं। कहते हैं कि मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व शैक्षिक प्रगति को रोकने के लिए ही आतंकवाद के नाम का हथकण्डा अपनाया गया है। उनका मानना है कि आतंकवाद के नाम पर वहीं के मुसलमान प्रताड़ित किये गये हैं जहां के मुसलमानों ने तेजी से हर क्षेत्र में तरक्की की है।