बेदम बाजार, डंप हो रहा करोड़ों का माल

कुछ चुनिंदा सेक्टर को छोड़ दें तो गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) और इंडस्ट्रीयल एरिया की फैक्ट्रियों जैसे तैसे चल रही हैं।

पूर्णिमा श्रीवास्तव

गोरखपुर: लॉकडाउन से लेकर अनलॉक 2 तक पहुँचने के बाद भी उद्योगों की सेहत में सुधार नहीं आ रहा है। पेट की मजबूरी में मजदूरों की फैक्ट्रियों में वापसी तो हो गई है, लेकिन उद्यमियों को बेदम बाजार की दुश्वारियों से जूझना पड़ रहा है। कुछ चुनिंदा सेक्टर को छोड़ दें तो गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) और इंडस्ट्रीयल एरिया की फैक्ट्रियों जैसे तैसे चल रही हैं।

सर्वाधिक बुरी स्थिति टेक्सटाइल से जुड़े उद्योगों की हैं। इन फैक्ट्रियों में तैयार करोड़ों रुपये का तैयार माल डंप हो रहा है। उद्यमियों का कहना है कि स्थिति सामान्य नहीं हुई, और सरकार ऐसे ही हवा हवाई मदद करती रही तो फैक्ट्रियों को बंद करने के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचेगा।

उद्योग हुये बेपटरी

गीडा और इंडस्ट्रीयल एरिया की फैक्ट्रियों में 15 हजार से अधिक मजदूरों की रोजी-रोटी चलती है। यहां 50 करोड़ से लेकर 1000 करोड़ टर्न ओवर की फैक्ट्रियां संचालित हैं। लेकिन डिमांड और सप्लाई का बैलेंस बिगड़ने से उद्योग बेपटरी हो गए हैं। सरकार की तरफ से बिजली से लेकर जमीन की कीमतों में सब्सिडी और राहत के दावे तो हो रहे हैं, लेकिन हकीकत की धरातल पर पहुंच नहीं रहे हैं।

चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज के उपाध्यक्ष आरएन सिंह का कहना है कि लॉकडाउन के बाद से अभी तक फैक्ट्रियों में उत्पादन सामान्य नहीं हो सका है। बिजली को लेकर जो छूट देने की बात कही गई थी, वह अभी तक नहीं मिली है। फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप होने के बाद भी बिजली के फिक्स चार्ज में किसी प्रकार की राहत नहीं दी जा रही है। मांग और सप्लाई में बैलेंस नहीं होने का नतीजा यह है कि फैक्ट्रियां सामान्य शिफ्ट में नहीं संचालित हो रही हैं। कहीं काम के दिनों को घटा दिया गया है, तो कहीं तीन की जगह एक ही शिफ्ट में काम हो रहा है।

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इंडस्ट्रीयल एरिया में पूर्वांचल की प्रमुख धागा बनाने वाली अंकुर उद्योग लिमिटेड में मजदूरों के लौटने से उत्पादन लगभग सामान्य हो गया है। काम तीन शिफ्ट में होने लगा है। लेकिन डिमांड को लेकर दिक्कत बनी हुई है। फैक्ट्री के प्रमुख निखिल जालान का कहना है कि अभी भी राजस्थान में फैक्ट्रियां पूरी तरह बंद हैं।

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हालांकि पंजाब में धीरे-धीरे खुलने लगी हैं। अभी कुल उत्पादन के सापेक्ष डिमांड बमुश्किल 30 फीसदी ही है। गोदाम में तैयार माल से भर चुका है। डिमांड नहीं आई 10 जुलाई तक उत्पादन ठप करना पड़ सकता है। जालान कहते हैं कि मजदूरों के वेतन देना ही है, लेकिन डिमांड और सप्लाई का बैलेंस नहीं है। अब प्रोडक्शन लागत बढ़ गई है। आखिर कबतक माल डंप करें।

बढ़ गई प्रोडक्शन कास्ट

इंडस्ट्रीयल एरिया के वीएन डायर्स फैक्ट्री में बने कपड़ों की आपूर्ति स्थानीय बाजार के साथ ही दक्षिण अफ्रिका तक होती है। फैक्ट्री में मजदूर तो आ गए हैं, लेकिन डिमांड नहीं होने से 60 फीसदी क्षमता से ही उत्पादन हो रहा है। फैक्ट्री के मालिक विष्णु अजीत सरिया का कहना है कि गीडा और आसपास की टेक्सटाइल फैक्ट्रियों की निर्भरता स्कूलों के ड्रेस पर है। स्कूल बंद होने से फैक्ट्रियों के उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि दक्षिण अफ्रिका को एक्सपोर्ट होने वाले कपड़े की डिमांड में कोई फर्क नहीं पड़ा है। यह कुल क्षमता का करीब 10 फीसदी है। पहली जून से पूरी क्षमता से फैक्ट्री चल रही है। माल डंप हो रहा है। फैक्ट्री में 300 मजदूरों की क्षमता है, सभी को काम दिया है।

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लेकिन मांग नहीं मिली तो उत्पादन ठप करना मजबूरी है। इसी तरह गीडा की अंबे प्रोसेसिंग यूनिट में पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं हो रहा है। फैक्ट्री में क्षमता का 25 फीसदी ही उत्पादन हो रहा है। फैक्ट्री के मालिक राजकुमार बथवाल का कहना है कि फैक्ट्री में स्कूलों के ड्रेस के लिए ही कपड़े बनते हैं। स्कूल बंद होने से डिमांड नहीं आ रही है। यह सेक्टर पूरी तरह वेंटीलेटर पर चल रहा है। यूनिट में काम कर रहे 200 मजदूर काम देना ही है, ऐसे में प्रोडक्शन कास्ट में काफी बढ़ोत्तरी हो गई है। ऐसे ही हालात दो से तीन महीने रह गए तो फैक्ट्री बंद करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा।

लॉकडाउन के साथ ही बंद है उत्पादन

गीडा और इंडस्ट्रीयल एरिया में रेडीमेड गारमेंट की फैक्ट्रियों में उत्पादन लॉकडाउन के बाद से ही ठप है। लॉकडाउन से पहले वैवाहिक सीजन को लेकर तैयार रेडीमेड शर्ट ही अभी खप नहीं रहा है। स्थिति यह है कि फैक्ट्री में काम करने वाले सैकड़ों कारीगर भी बेकार हो गए हैं। इंडस्ट्रीयल एरिया में स्थापित फैक्ट्री के मालिक गोविंद चावला का कहना है कि डिमांड के सीजन से पांच से छह महीने पहले ही फैशन के हिसाब से शर्ट बनवाया जाता है। जनवरी से जून महीने की शादियों के सीजन को देखते हुए शर्ट का उत्पादन किया गया था, लेकिन लॉकडाउन के चलते तैयार माल फंस गया है।

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फैक्ट्री में तैयार शर्ट की डिमांड पूर्वांचल के सभी जिलों में है। अभी तैयार माल ही काफी अधिक है, ऐसे में नये उत्पादन का सवाल ही नहीं उठता है। फैक्ट्री के विस्तार की योजना भी अब भविष्य के लिए टाल दी गई है। सरकार को सरकारी स्कूलों के ड्रेस के लिए लोकल फैक्ट्रियों को नामित करना होगा। तभी फैक्ट्रियां बचेगीं। वहीं गौरव अग्रवाल का कहना है कि नुकसान से बचने के लिए उत्पादन ठप रखना बेहतर विकल्प है।

मांग भरपूर, स्किल्ड मजदूरों की कमी

इंडस्ट्रीयल एरिया में प्लास्टिक का बोरा बनाने वाली फैक्ट्री में लॉकडाउन में अपने गाँव लौटे मजदूर वापस नहीं आए हैं। 200 मजदूरों के सापेक्ष अभी तक बमुश्किल 140 मजदूर ही काम पर लौटे हैं। इनमें अहमदाबाद से आए करीब 30 प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं। फैक्ट्री के मालिक किशन बथवाल का कहना है कि डिमांड को लेकर कोई दिक्कत नहीं है। जितना बोरा बनाएंगे, उतने की खपत है। फैक्ट्री में स्किल्ड मजदूरों की ही जरूरत है। अभी बिहार और बंगाल से मजदूर लौटे नहीं है। इस ट्रेड के जितने प्रवासी मजदूर मिले हैं, सभी को काम पर रख लिया गया है।

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मजदूरों की उपलब्धता पर ही उत्पादन निर्भर है। बथवाल कहते हैं कि कोरोना का सबक यही है कि स्किल्ड मजदूरों की संख्या बढ़ानी होगी। तमाम आईटीआई के बाद भी तकनीकी रूप से सक्षम कर्मचारियों की कमी है। यहां 1.75 लाख बोरा प्रतिदिन बन सकता है, लेकिन स्किल्ड मजदूरों की कमी से सिर्फ 90 हजार बोरा ही बन रहा है। सामान्य दिनों में 8.50 करोड़ प्रति महीने की बिक्री की जगह वर्तमान में बमुश्किल 4 करोड़ रुपये की बिक्री हो रही है।

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गीडा की प्रमुख ब्रेड और बेकरी बनाने वाली फैक्ट्री क्रेजी ब्रेड में मजदूरों की कमी से उत्पादन सामान्य नहीं हो पा रहा है। अभी भी बड़ी संख्या में मजदूर बंगाल में फंसे हुए हैं। उन्हें लाने के लिए बसें भी भेजी जा रही हैं। ब्रेड और बेकरी की आपूर्ति उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमांचल, उत्तराखंड समेत करीब दस प्रदेशों में हैं। फैक्ट्री के मालिक नवीन अग्रवाल बताते है कि कुछ प्रदेशों को छोड़ दें तो डिमांड में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं है। मजदूर अभी 70 फीसदी ही पहुंच सके हैं। जिससे उत्पादन सामान्य दिनों की तुलना में 75 फीसदी ही हो पा रहा है।

गैलेंट के अच्छे दिन

गीडा की प्रमुख सरिया फैक्ट्री गैलेंट में अनलॉक 02 में उत्पादन सामान्य हो गया है। लॉकडाउन से पहले 4 करोड़ रुपये की सरिया प्रतिदिन बिकती थी और वर्तमान में पूरा उत्पादन हो रहा है। बिहार के मजदूरों की किल्लत उद्यमी ने स्थानीय मजदूरों से पूरी कर ली है। बीते 26 जून को गैलेंट सरिया के प्रबंध निदेशक चन्द्र प्रकाश अग्रवाल ने मुख्यमंत्री से मिलकर 865 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्ताव सौंपा है। इससे सरिया प्लांट की क्षमता तो बढ़ेगी ही, बल्कि पूर्वांचल की पहली सिमेंट फैक्ट्री की स्थापना होगी।

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सीमेन्ट प्लान्ट के लिए गीडा द्वारा ग्राम उज्जीखोर में 60 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जायेगा। प्रबंध निदेशक का कहना है कि इन्टीग्रेटेड स्टील प्लान्ट की वर्तमान क्षमता को बढ़ाकर 528000 मिट्रिक टन करने और पावर प्लान्ट की क्षमता बढ़ा कर 73 मेगावाट करने का निर्णय लिया गया है। सीमेंट प्लांट की क्षमता चार लाख टन की होगी। श्री अग्रवाल ने बताया कि प्रस्तावित परियोजना का कार्य प्रगति में है। प्रथम चरण का उत्पादन अगले साल जून से शुरू हो जाएगा।

उद्यमियों की बात

विष्णु अजीत सरिया, अध्यक्ष, चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज

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पिछले एक साल में गीडा में जमीन की कीमतें 50 फीसदी तक बढ़ी हैं। पिछले वर्ष के शुरूआत में गीडा में जमीन की कीमतें 4400 रुपये प्रति वर्ग मीटर थी। जो वर्तमान में 6800 रुपये वर्ग मीटर हो गई है। गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र में भी गोरखपुर से सस्ती जमीनें हैं। फैक्ट्री लगाने में जमीन की कीमत प्रोजेक्ट कास्ट का 10 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। यहां 40 से 50 फीसदी कास्ट जमीन की खरीद में ही लग जा रही है।

एसके अग्रवाल,पूर्व अध्यक्ष, चेम्बर ऑफ इंडस्ट्रीज

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गोरखपुर और आसपास के जिलों को टेक्सटाइल उद्योग को लेकर जबरदस्त संभावना है। इसीलिए प्रशासन ने इसे ओडीओपी के दूसरे उत्पाद को लेकर प्रस्ताव शासन में भेजा है। स्थानीय स्तर पर कोई भी उद्योग बिना सरकार के सहयोग के नहीं चल सकता है। सरकार सिर्फ सरकारी स्कूलों के ड्रेस के कपड़ों और सिलाई की जिम्मेदारी यहां की फैक्ट्रियों को दे दे तो काफी मदद हो जाएगी।

निखिल जालान, निदेशक, अंकुर उद्योग लिमिटेड

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तैयार धागे की आपूर्ति पंजाब और राजस्थान को होती है। दोनों प्रदेशों में कोरोना को चलते बिगड़े हालात से आपूर्ति सामान्य नहीं है। वर्तमान में करीब 25 करोड़ रुपये का तैयार माल डंप पड़ा हुआ है। वर्तमान में हम चीन को चुनौती दे रहे हैं, लेकिन हमें वहाँ मिल रहीं सहूलियतें भी देखनी होंगी। चीन इसलिए सस्ता समान बना लेता है कि वहाँ की सरकार सस्ती बिजली से लेकर अन्य सहूलियत देती है। यहाँ भी मैन पवार है। सरकार सहूलियत तो दे, उद्यमी चीन से मुकाबला कर लेंगे।

डॉ.आरिफ साबिर, फर्नीचर उद्यमी

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अप्रैल और मई में वैवाहिक कार्यक्रमों के चलते बेहतर बिक्री की उम्मीद में आसपास के डीलरों को करीब 4 करोड़ रुपये का फर्नीचर उधार में दे दिया। फैक्ट्री अचानक बंद होने से करीब 15 लाख कीमत के केमिकल बर्बाद हो गया। लॉकडाउन में बंदी के बाद भी कर्मचारियों का वेतन, बैंक की किस्त और बिजली का फिक्स चार्ज देना पड़ रहा है। शादियां बहुत कम हुई हैं। मांग भी सामान्य दिनों की आधी नहीं है।