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चौतरफा घिरा चीन

अमेरिका सबसे बड़ी तैयारी कर चुका है। इसकी शुरुआत चीन की दिग्गज टेलीकॉम उपकरण कंपनी हुवावे और ज़ेडटीई को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा घोषित करके हो चुकी है।

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Updated on: 3 July 2020 11:14 AM GMT
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नई दिल्ली: दुनिया भर के लिए सिरदर्द बने चीन को अब बड़ी चोट पहुंचाने की तैयारी है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और भारत समेत तमाम देश चीन के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में जुट गए हैं। इस दिशा में अमेरिका सबसे बड़ी तैयारी कर चुका है। इसकी शुरुआत चीन की दिग्गज टेलीकॉम उपकरण कंपनी हुवावे और ज़ेडटीई को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा घोषित करके हो चुकी है।

अब अमेरिकी संसद ने हांगकांग में चीनी कार्रवाई के खिलाफ कानून को मंजूरी दे दी है। भारत ने भी जहां चीन के 59 एप्स को प्रतिबंधित कर दिया है, वहीं रेलवे के बाद सड़क के कामों में चीनी कंपनियों को ठेका न देने का फैसला हुआ है। आस्ट्रेलिया ने तो चीन के विरुद्ध सीधे तौर पर सैन्य ताकत बढ़ाने का एलान कर दिया है। ब्रिटेन में भी चीन से संबंधों की समीक्षा की मांग जोर पकड़ रही है।

अब बात नहीं, सीधी कार्रवाई

चीन से सबसे बड़ा खतरा दरअसल अमेरिका को है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई का कहना है कि अमेरिका की आर्थिक सुरक्षा, इनोवेशन और लोकतान्त्रिक मूल्यों को किसी अन्य देश से नहीं, बल्कि चीन से सबसे ज्यादा खतरा है। इसी खतरे के चलते अब अमेरिका ने फैसला किया है कि चीन के खिलाफ बयानबाजी ही नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई की जाएगी। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट सी ओ ब्रायन ने कहा है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और चीन के नेता शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन से पूरी दुनिया को खतरा पैदा हुआ है।

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चीन से पैदा होने वाले खतरे को समझने में दुनिया ने काफी देरी की है। उन्होंने कहा कि पूर्वी लद्दाख में चीन की कार्रवाई से पूरी दुनिया की आंख खुल जानी चाहिए। पूरी दुनिया को चीन की चाल से सतर्क होना होगा और तभी उसे मुंहतोड़ जवाब दिया जा सकता है। ब्रायन ने कहा कि अब चीन से निपटने में आक्रामक रुख अपनाया जाएगा।

जासूसी में जुटा है चीन

दूसरी ओर एफबीआई ने बताया है कि अमेरिका में आर्थिक जासूसी के कम से कम दो हजार मामलों के तार चीनी सरकार से जुड़े हुए हैं। अब औसतन हर दस घंटे में एफबीआई एक नई काउंटर इंटेलिजेंस जांच शुरू करता है जो चीन से जुड़े होते हैं। 2018 से अमेरिकी सरकार चीन द्वारा की जा रही सामरिक और वाणिज्यिक जासूसी के अलावा बौद्धिक संपदा की चोरी पर लगाम लगाने के उपाय बढ़ाती जा रही है।

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माना जा रहा है कि अगर अब अमेरिका चीन के प्रति अपने आक्रामक रुख को सीधी कार्रवाई में बदल देता है तो उसे सहयोगी देशों का भी साथ मिलेगा जिससे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और शी जिनपिंग पर जबर्दस्त ग्लोबल दबाव पड़ेगा। इसके चलते चीन को वैश्विक क़ानूनों का पालन करने को बाध्य होना पड़ेगा।

हांगकांग पर अमेरिका का सख्त रुख

हांगकांग में चीन की कार्रवाई के खिलाफ अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने पूर्ण सहमति से ट्रंप प्रशासन द्वारा लाए गए बिल का समर्थन किया है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव की स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने साफ कहा कि कायर चीनी सरकार के खिलाफ तत्काल जवाब देने की जरूरत है। अब चीन पर आर्थिक प्रतिबंधों का रास्ता साफ हो गया है और इस मुहिम में ट्रंप का साथ उनके मुखर विरोधी डेमोक्रेट पार्टी के सीनेटर भी दे रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप के प्रतिद्वंद्वी जो बिडेन ने यहां तक कह दिया है कि अगर वो चुनाव जीते तो चीन पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगा देंगे।

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अमेरिकी कानून के विरोध में चीन ने अमेरिकी नागरिकों को वीज़ा नहीं देने की धमकी दी है। इस पर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा है कि अब हमें जवाब देना ही पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका यूरोप से सैनिकों की संख्या कम करके उन्हें एशिया में तैनात करेगा ताकि चीन का मुकाबला किया जा सके। अमेरिकी विदेश मंत्री के इस बयान पर भी चीन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

चीन का असली चेहरा उजागर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि चीन ने न सिर्फ भारत के खिलाफ बल्कि दूसरे देशों के खिलाफ भी आक्रामक रवैया अख्तियार कर रहा है। ट्रंप ने कहा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और चीनी सरकार का असली चेहरा उजागर हो गया है। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका भारत और चीन के बीच पैदा हुए तनाव पर पैनी नजर रख रहा है। उन्होंने कहा कि कई हफ्तों से जारी इस तनाव को हल्के में नहीं लिया जा सकता। बात सिर्फ भारत या एशिया की नहीं है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में दिल चीन का यही रवैया दिख रहा है। अमेरिका अब इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

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अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि जैसे-जैसे दुनिया में कोरोना के मरीज बढ़ रहे हैं, वैसे वैसे चीन के प्रति मेरा गुस्सा बढ़ता जा रहा है। दुनिया में कोरोना के संक्रमण के साथ ही मेरा गुस्सा भी बढ़ रहा है। एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने कहा चीन की नीतियों के कारण मैं बेहद नाराज हूं। अमेरिकी कांग्रेस के इंटेलिजेंस कमेटी के चेयरमैन एडम शिफ ने भी कहा कि पिछले महीने चीन ने भारतीय सैनिकों के साथ हिंसा की घटना की है। चीन को भी इस झड़प के दौरान काफी नुकसान होगा, लेकिन उसने यह बात दुनिया से छिपा ली। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के दौर में दुनिया के कई देश परेशान हैं और चीन इसका फायदा उठाने में जुटा हुआ है।

ऑस्ट्रेलिया ने भी खोला मोर्चा

अब ऑस्ट्रेलिया ने भी चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा है कि हिन्द प्रशांत क्षेत्र में चीन के आक्रामक तेवरों का जवाब देने के लिए देश की रक्षा क्षमताएं बढ़ाई जाएंगी और इसके आधुनिकीकरण पर 270 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर खर्च किया जाएगा।

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उनका कहना है कि चीन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए ऑस्ट्रेलिया की ओर से यह कदम उठाया गया है। हिंद प्रशांत क्षेत्र रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है और इस क्षेत्र में चीन के तेवर आक्रामक दिख रहे हैं। क्षेत्र में किसी भी प्रकार के आक्रमण को रोकने और जवाबी कार्रवाई करने के लिए हमने रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने का फैसला किया है।

चीन के खतरे से किया सचेत

उन्होंने कहा कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में नई चुनौतियां बढ़ रही हैं और हमें क्षेत्र में बढ़ रही गतिविधियों को रोकने के लिए नया तरीका अपनाना होगा ताकि हम अपने हितों की रक्षा कर सकें। मॉरिसन ने कहा कि हिंद प्रशांत क्षेत्र रणनीतिक स्पर्धा और तनाव का केंद्र बन चुका है। इस क्षेत्र में चीन का सैन्य दबाव लगातार बढ़ रहा है और इसके प्रति सचेत होना होगा।ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने कहा कि दक्षिण और पूर्व चीन सागर में भी चीन क्षेत्रीय विवाद पैदा करने में जुटा हुआ है।

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चीन ने इन क्षेत्रों में अपने नियंत्रण वाले कई द्वीपों पर नए सैन्य अड्डों का विकास किया है। दोनों ही क्षेत्रों में खनिज, तेल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के भंडार हैं और वैश्विक व्यापार के लिए ये काफी अहम हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना से जंग लड़ने के साथ ही हमें कोरोना से बाद की दुनिया के लिए भी तैयार होना होगा। कोरोना से बाद की दुनिया में गरीबी,खतरा और अनिश्चितता और बढ़ेगी और इसके लिए हम सभी को तैयार रहना होगा।

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हाल के दिनों में अमेरिका के साथ ही ऑस्ट्रेलिया ने भी चीन के खिलाफ आक्रामक नीति अपना रखी है। कोरोना संक्रमण के लिए भी ऑस्ट्रेलिया ने खुलकर चीन को दोषी ठहराया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अलावा ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मॉरिसन ने भी कहा था कि चीन की लापरवाही के कारण ही दुनिया इस गहरी मुसीबत में फंसी है। अब ऑस्ट्रेलिया ने सैन्य मोर्चे पर भी चीन के खिलाफ आक्रामक नीति अपनाने का संकेत दिया है।

चीन के रवैये से ब्रिटेन भी नाराज

भारत के साथ सीमा विवाद में उलझे चीन के धमकी भरे बर्ताव पर ब्रिटिश सांसदों ने गहरी नाराजगी जताई है। हाउस ऑफ कॉमंस में चीन को लेकर हुई चर्चा के दौरान ब्रिटिश सांसदों ने चीनी रुख की निंदा करते हुए इस पर गहरी चिंता जताई। सांसदों ने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिटेन को भी चीन पर निर्भरता कम करनी चाहिए और इसके लिए समीक्षा किए जाने की जरूरत है। सांसदों ने चीन में मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठाते हुए भी ड्रैगन को घेरा।

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हाउस ऑफ कॉमंस में कंजरवेटिव पार्टी के सांसद इयान डंकन स्मिथ ने कहा कि चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों का उत्पीड़न किया जा रहा है। चीन की सरकार यहां रहने वाले उइगर मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार कर रही है। स्मिथ ने चीन में मानवाधिकारों के उल्लंघन, हांगकांग की स्वतंत्रता पर हमला, भारत के साथ सीमा विवाद में चीन के धमकी भरे व्यवहार का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने इन सभी मुद्दों को लेकर चीन पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि चीन पर ब्रिटेन की निर्भरता की आंतरिक समीक्षा होनी चाहिए।

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विपक्षी लेबर पार्टी के सांसद स्टीफन किन्नॉक ने कहा कि ब्रिटेन सरकार को चीन के बारे में अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। सांसदों की चिंता का जवाब देते हुए एशिया मामलों के ब्रिटिश मंत्री निगेल एडम्स ने कहा कि ब्रिटेन सरकार विभिन्न मुद्दों पर अपनी चिंताओं से चीन को समय-समय पर अवगत कराती रही है। उन्होंने कहा कि द्विपक्षीय बातचीत के दौरान ब्रिटेन हमेशा यह मुद्दा उठाता रहा है। इसके साथ ही ब्रिटेन ने संयुक्त राष्ट्र में भी प्रमुखता से इन मुद्दों को उठाया है।

ड्रैगन के खिलाफ अब आक्रामक कूटनीति

चीनी कंपनियों पर शिकंजा कसने और 59 चीनी एप्स पर पाबंदी लगाने के बाद अब भारत ने हांगकांग के मुद्दे पर भी चीन की घेरेबंदी शुरू कर दी है। भारत ने हांगकांग के मुद्दे पर पहली बार खुलकर बोलते हुए संयुक्त राष्ट्र में हांगकांग की स्थिति पर चिंता जताई है। इसे कूटनीति की दिशा में भारत का बड़ा कदम माना जा रहा है।

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संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजीव के चंदर ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि भारतीय समुदाय को हितों को देखते हुए हम हांगकांग के हाल के घटनाक्रमों पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में हांगकांग से जुड़ी कई चिंताजनक जानकारियां सामने आई हैं। उन्होंने उम्मीद जताई सभी संबंधित पक्ष गंभीरता व सही तरीके से हांगकांग में उचित कदम उठाएंगे।

हांगकांग में मानवाधिकारों का उल्लंघन

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दरअसल चीन ने हाल में हांगकांग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू किया है। इस कानून के लागू होने के बाद माना जा रहा है कि अब हांगकांग भी चीन के दूसरे राज्यों की तरह ही होगा और वहां के नागरिकों को मिले लोकतांत्रिक अधिकार पूरी तरह खत्म कर दिए जाएंगे। अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों ने हांगकांग में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर गंभीर चिंता जताई है। अब भारत ने भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए अपने बयान से इस बात का एहसास करा दिया है की द्विपक्षीय रिश्तों में अब वह चीन को किसी तरीके की रियायत देने के मूड में नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन की घेरेबंदी

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जानकारों का कहना है कि अभी तक भारत हांगकांग के मुद्दे पर इसलिए चुप्पी साधे रहता था कि कहीं चीन बदले में कश्मीर मुद्दे को हवा देने में न जुट जाए। पिछले साल अगस्त में जम्मू -कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद चीन कश्मीर पर भी बयानबाजी देने से बाज नहीं आ रहा है। इस कारण भारत का यह भय भी पूरी तरह समाप्त हो गया है। लद्दाख में दोनों देशों के बीच में तनाव के बाद इसीलिए भारत ने चीन के प्रति अपनी नीतियों में बदलाव लाते हुए अब हांगकांग के मुद्दे पर भी चीन की घेरेबंदी शुरू कर दी है।

हांगकांग में विवादित कानून का जबर्दस्त विरोध

हांगकांग में विवादास्पद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने के खिलाफ तीखे विरोध प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया है। इस कानून के खिलाफ प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए और उन्होंने चीन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। कानून में विरोध प्रदर्शन या तोड़फोड़ पर सख्त सजा का प्रावधान होने के बावजूद हांगकांग में विरोध प्रदर्शन का दौर नहीं थम रहा है। कानून लागू होने के पहले दिन ही 30 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

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प्रदर्शनकारियों का कहना है की चीन की बर्बर कार्रवाई को मूकदर्शक बनकर नहीं सहा जा सकता। प्रदर्शनकारियों को काबू में करने के लिए पुलिस ने काली मिर्च का स्प्रे करने के साथ ही पानी की तेज बौछार भी छोड़ी मगर प्रदर्शनकारी चीन के खिलाफ डटे रहे। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में प्रदर्शन का यह दौर और तेज होगा।

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