क्यों मनोरोग का शिकार हो कर दमतोड़ रही युवा शक्ति

 

पंडित रामकृष्ण वाजपेयी, लखनऊ: देश एक तरफ 21वीं सदी में जाने की तैयारी कर रहा है। नित नए आविष्कार हो रहे हैं। कुल मिलाकर बाबा तुलसीदास ने रामचरित मानस में कही एक चौपाई हर जगह चरितार्थ होती दिख रही है कि जो इच्छा करिहो मनमाहीं राम कृपा कुछ दुर्लभ नाहीं। लेकिन संतोषं परमं सुखम को हमने भुला दिया। संतोष को छोड़कर हमारी जिंदगी में सबकुछ है।

पूरी दुनिया बाजारवाद की गिरफ्त में

 

पूंजीवाद के खेल ने लोगों के मन में रोटी कपड़ा और मकान से ऊपर उठकर चमक दमक की ऐसी लालसा के पीछे ढकेल दिया है। जिसका सर्वाधिक दबाव बच्चों, युवाओं और महिलाओं पर आ रहा है। पैसे के पीछे भागने की इस अंधी और अंतहीन दौड़ से सफलता मृगमरीचिका बन गई है। अततः हाथ लग रही है सिर्फ निराशा हताशा और अवसाद। ऐसा नहीं है कि ये स्थिति भारत में ही है पूरी दुनिया बाजारवाद की गिरफ्त में है। इसके चलते तीस करोड़ लोग अवसाद के शिकार हो चुके हैं।

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26,600 छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या की

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में छठा आदमी अवसाद का शिकार है। गत वर्ष संसद में अवसाद के चलते बढ़ रही आत्महत्याओं पर चिंता जताए जाने पर सरकार ने बताया था कि वर्ष 2014 से 2016 के बीच देश भर में 26,600 छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या की। यानी प्रतिदिन तीन चार छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। यह स्थिति भयावह है। बच्चों का बचपना छिन चुका है। किताबों के बैग के बोझ तले वह कुंठित किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे हैं।

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लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट भयावह आंकड़े पेश करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में तीस करोड़ लोग अवसाद के रूप में मनोरोग के शिकार हैं। यह आंकड़े तब और भी खतरनाक हो जाते हैं जब यह जानकारी सामने आती है कि अवसाद के चलते हर साल आठ लाख लोग जान दे देते हैं, और इन आठ लाख लोगों में वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा ग्रुप उन लोगों का है जो 15 से 29 वर्ष के हैं।

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होगा ट्रिलियन डालर का नुकसान

आंकड़े बता रहे हैं कि भारत जहां पांच ट्रिलियन डालर की इकनॉमी बनने की तैयारी कर रहा है वहीं यदि उसने जनता के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया तो 2030 तक आत्महत्या और मानसिक विकार के चलते कई ट्रिलियन डालर का नुकसान उठाना पड़ सकता है। भारत और चीन को मिलाकर यह अनुमान नौ ट्रिलियन डालर का है।

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सरकारी स्तर पर एक अवसर पर दी गई जानकारी के अनुसार कि वर्ष  2016  में  9हजार  474, 2015  में  8 हजार  934 और 2014 में  8 हजार 68 छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या की है। आंकड़े लगातार बढ़े हैं। हाल के तीन सालों के आंकड़े फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं।

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छात्र-छात्राओं की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुए हैं मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ में इसके नीचे हैं।

भारत में पिछले कई सालों से छात्र-छात्राओं की आत्महत्या रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। इसे देखते हुए यह कहने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि हम अपनी युवा शक्ति को सही दिशा नहीं दे पा रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 15 से 29 साल के किशोरों-युवाओं की आत्महत्या की ऊंची दर के मामले में भारत शीर्ष के कुछ देशों में शामिल है।

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पिछले दिनों एक रिपोर्ट जवाहर नवोदय विद्यालय (जेएनवी) के बारे में आई थी। यह केंद्र सरकार द्वारा प्रतिभाशाली ग्रामीण बच्चों के लिए स्थापित स्कूल है। इसमें 49 बच्चों ने पांच सालों के दौरान आत्महत्या की है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार 2013 से 2017 के बीच में 49 आत्महत्या की घटना हुई है। जिसमें से आधे दलित और आदिवासी बच्चे हैं। इसमें भी अधिकांश संख्या लड़कों की है।

जवाहर नवोदय विद्यालय हजारों गरीब और वंचित बच्चों के लिए गरीबी से बाहर निकलने का मौका देनी की एक आदर्श जगह है। इन स्कूलों की स्थापना 1985-86 के बीच हुई थी। नवोदय विद्यालय समिति मानव संसाधन विकास मंत्रालय का एक स्वायत्त संगठन है जो देशभर में 635 स्कूल संचालित करता है।

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यदि जेएनवी के बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं तो यह सरकार के लिए सर्वाधिक चिंता का विषय होना चाहिए। इन स्कूलों में आत्महत्या करने वाले 16 बच्चे अनुसूचित जाति के थे। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों की संख्या को मिलाकर यह आंकड़ा 25 हो जाता है। वहीं सामान्य और पिछड़ी जाति के 12-12 बच्चों ने मौत को गले लगाया है।

विश्व में हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है, इस तरह वर्ष में आठ लाख से अधिक लोग मर जाते हैं तथा इससे भी अधिक लोग आत्महत्या का प्रयास करते हैं जो बचा लिए जाते हैं।

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वास्तव में इस बारे में सोचने की जरूरत है कि क्यों हम अपनी युवाशक्ति को रोबोट में तब्दील कर देना चाहते हैं। माता-पिता के पास आज अपने बच्चों से बात करने के लिए वक्त क्यों नहीं है। बेरोजगारी, बीमारी, पारिवारिक कलह, दांपत्य जीवन में संघर्ष, गरीबी, मानसिक विकार, परीक्षा में असफलता, प्रेम में असफलता, आर्थिक संकट आत्महत्या की वजहें बतायी जाती हैं।

अगर देखा जाए तो किसी के भी अवसाद का शिकार होने की सबसे पहले पहचान उसके घर से होती है। ऐसे में माता-पिता को संतानों पर निगाह रखने की जरूरत है। कई बार व्यक्तिगत दोषों की अधिकता के कारण सामाजिक जीवन से अपना तालमेल करने में असमर्थ रहने पर भी व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है। छात्रों के सिर पर परीक्षा का तनाव प्रतिस्पर्धा के दौर में और भी बढ़ गया है। कुछ अभिवावक अपने बच्चों पर सर्वाधिक अंकों, उन्नत कैरियर जैसे आईएएस, सीए, मेडिकल की पढ़ाई के लिए दबाव बनाते हैं। जिससे छात्र पर मानसिक दबाव और बढ़ जाता है। जबकि छात्र की रुचि कुछ और करने की होती है।

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आज रोजगार के अवसर लगभग समाप्त हैं। सरकारी नौकरियां न के बराबर हैं। प्राइवेट सेक्टर में जाने पर वहां प्रतिस्पर्धा और टारगेट हासिल करने का जबर्दस्त दबाव है। नौकरी की अनिश्चितता तो हर क्षण बनी रहती है। एक जमाने में बीए, बीएससी या बीकाम व्यक्ति को बड़ी आसानी से नौकरी मिल जाया करती थी। आज ग्रेजुएशन कर चुकने वाला व्यक्ति केवल आठ दस हजार की नौकरी के लिए किसी दफ्तर में अपने लिए सम्भावनाएं तलाशता है। यह नौकरी भी आसानी से मिलती नहीं है। सीमित संसाधनों में व्यक्ति सामाजिक दायरे में खुद को अनफिट महसूस कर रहा है।

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आज जरूरत मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम में शामिल करने की है। हर स्कूल कालेज यूनिवर्सिटी में मानसिक स्वास्थ्य का स्तर लगातार जांचा जाना चाहिए और अत्यधिक सेंस्टिव या मानसिक दबाव के शिकार बच्चों युवाओं को चिह्नित किया जाना चाहिए। कर्ज लेकर जीवन यापन की शैली पर अंकुश लगना चाहिए।