अपना भारत/न्यूज़ट्रैक Exclusive: क्या होगा 30 जून की आधी रात को ?

जीएसटी

संजय तिवारी 
15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को जब पंडित जवाहर लाल नेहरू संसद के केंद्रीय हॉल से देश और दुनिया को संदेश दे रहे थे, कि भारत अब एक नये युग में प्रवेश कर रहा है। पंडित नेहरू के उस भाषण के बाद स्वाधीन भारत की संसद में कभी आधी रात को किसी प्रधानमंत्री ने न तो भाषण दिया है और न ही आधी रात को संसद का सत्र आहूत किया गया।

जाहिर है देश की नौजवान पीढ़ी के लिए यह बहुत ही उत्सुकता की बात है। देश में आखिर ऐसा क्या होने जा रहा है जिसके लिए संसद आधी रात को बैठ रही है। पंडित नेहरू के उस ऐतिहासिक उद्बोधन के बाद के स्वाधीन भारत के इतिहास ने बहुत से गंभीर अवसर देखे हैं। इन वर्षो में देश ने आपातकाल देखा है। पांच बड़े युद्ध देखे हैं। गाँधी, इंदिरा गाँधी,राजीव गांधी की हत्याओं के बाद की स्थितियों का भी सामना किया है। श्रीराम मंदिर आंदोलन देखा है।

मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने और उसके बाद आरक्षण विरोध की हिंसा को भी देखा है। देश ने बाबरी ढाँचे को ध्वस्त होते भी देखा है और गोधरा भी देखा है। यहाँ तक कि बीते वर्ष नोटबंदी जैसे बड़े निर्णय के लिए भी आधी रात को संसद बुलाने की जरुरत नहीं पड़ी। तब यह प्रश्न हर आदमी पूछ रहा है कि आखिर देश में ऐसा क्या होने जा रहा है ? 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को तो भारत को आज़ादी मिली थी लेकिन 30 जून की आधी रात को ?

इस प्रश्न  का उत्तर है कि एक जुलाई 2017 को देश एकीकृत बाजार में बदल जाएगा। ‘वन नेशन, वन टैक्स’ के तहत एक जुलाई 2017 को पूरा देश एक सूत्र में बंध जाएगा। नई टैक्स व्यवस्था के तहत देश की जो तस्वीर जेहन में उतर रही है, वो 71 वर्ष पहले की वो तस्वीर याद दिला रही है जब देश अंग्रेजी राज की गुलामी से आजाद हुआ था।ठीक वही इतिहास 30 जून 2017 को दोहराया जाएगा, जब पीएम नरेंद्र मोदी मध्य रात्रि को देश और दुनिया को संदेश देंगे कि अब जीएसटी के जरिए पूरा भारत एक सूत्र में बंध चुका है। यही वजह है कि सरकार ने इस बदलाव को एक बड़े अवसर के रूप में मनाने का फैसला किया है।

30 जून और एक जुलाई की आधी रात को जब से यह बदलाव प्रभाव में आएगा, संसद का एक विशेष सत्र बुलाया गया है। इस सत्र में सत्ता पक्ष, विपक्ष और संसद में मौजूद सभी राजनीतिक दल तो होंगे ही, दो पूर्व प्रधानमंत्रियों एच डी देवेगौड़ा और मनमोहन सिंह को भी मंच पर विशेष रूप से जगह दी जाएगी। अच्छी बात यह है कि इस अवसर को सरकार की उपलब्धि के रूप में नहीं, देश के एक महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर मनाया जा रहा है। इससे लोगों में यह संदेश जाएगा कि जीएसटी कर-व्यवस्था का एक बदलाव भर नहीं है, बल्कि देश की आर्थिक पुनर्रचना का एक बड़ा प्रयास भी है। हालांकि ऐसा संदेश देने में जलसों की भूमिका भी बहुत सीमित ही होती है, असली संदेश तो तभी पहुंचेगा, जब लोगों को लगेगा कि नई व्यवस्था में उनकी सुविधा और बेहतरी के ज्यादा इंतजाम हो रहे हैं।

दुनिया भर के किस्से- कहानियों में हमेशा से कर, लगान, चौथ, तरह-तरह के राजस्व को दुख भरी गाथाओं के साथ जोड़ा गया है। लेकिन इसके साथ ही टैक्स वह व्यवस्था है, जिस पर हमारे सभ्यता तंत्र की इमारत खड़ी होती है। कोई भी देश, कोई भी समाज बिना कर-व्यवस्था के न तो चल सकता है, और न ही आगे बढ़ सकता है। लेकिन इसी के साथ दुनिया का तकरीबन हर देश और हर समाज अपनी कर-व्यवस्था से सामंजस्य बनाने की कवायद में हमेशा जुटा रहता है। कभी व्यवस्था को समाज के अनुकूल बनाने की कोशिश चलती है, तो कभी समाज को कर-व्यवस्था के अनुकूल बनाने की।

ऐसी ही एक कोशिश हमारा देश एक जुलाई से करने जा रहा है, जब पुरानी कर-व्यवस्था खत्म हो जाएगी और पूरी अर्थव्यवस्था वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी के नए प्रावधानों के हवाले होगी। यह बदलाव महत्वपूर्ण इसलिए है कि जो नई कर-व्यवस्था हम अपनाने जा रहे हैं, उसके लिए पिछले 19 साल से लगातार कोशिशें चल रही हैं। कर-व्यवस्था के प्रावधानों पर सब सहमत हो जाएं, ऐसा शायद कभी नहीं होता है, लेकिन यह भी सच है कि इस नई व्यवस्था पर आम सहमति बनाने की जितनी कोशिश पिछले तकरीबन दो दशक में की गई है, उतनी किसी और मुद्दे पर नहीं की गई। सभी राजनीतिक दलों और लगभग सभी दलों की प्रदेश सरकारों का इस पर सहमत हो जाना हमारे लोकतंत्र की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (नियति से वादा) भाषण में नेहरू ने क्या कहा था

कई सालों पहले, हमने नियति से एक वादा किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा निभायें, पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक तो निभायें। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग जाएगा। ऐसा क्षण आता है, मगर इतिहास में विरले ही आता है, जब हम पुराने से बाहर निकल नए युग में कदम रखते हैं, जब एक युग समाप्त हो जाता है, जब एक देश की लम्बे समय से दबी हुई आत्मा मुक्ति होती है। यह संयोग ही है कि इस पवित्र अवसर पर हम भारत और उसके लोगों की सेवा करने के लिए तथा सबसे बढ़कर मानवता की सेवा करने के लिए समर्पित होने की प्रतिज्ञा कर रहे हैं।

आज हम दुर्भाग्य के एक युग को समाप्त कर रहे हैं और भारत पुनः स्वयं को खोज पा रहा है। आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो केवल एक क़दम है, नए अवसरों के खुलने का। इससे भी बड़ी विजय और उपलब्धियां हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं।

भारत की सेवा का अर्थ है लाखों-करोड़ों पीड़ितों की सेवा करना। इसका अर्थ है निर्धनता, अज्ञानता और अवसर की असमानता मिटाना। हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही इच्छा है कि हर आंख से आंसू मिटें। संभवतः ये हमारे लिए संभव न हो पर जब तक लोगों कि आंखों में आंसू हैं, तब तक हमारा कार्य समाप्त नहीं होगा। आज एक बार फिर वर्षों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और स्वतंत्र है। भविष्य हमें बुला रहा है।

हमें कहां जाना चाहिए और हमें क्या करना चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानों और श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता और अवसर ला सकें, हम निर्धनता मिटा, एक समृद्ध, लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील देश बना सकें। हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं को बना सकें जो प्रत्येक स्त्री-पुरुष के लिए जीवन की परिपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सकें? कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या कर्म संकीर्ण हैं।

भारत में कर प्रणाली में यह बदलाव जहां सरकार के लिए पुनर्रचना का एक बड़ा अवसर है, तो वहीं यह उससे कहीं बड़ी चुनौती भी है। सबसे बड़ी चुनौती है, तंत्र से भ्रष्टाचार को खत्म करना, जिसकी वजह से राजस्व में कमी आती है और सार्वजनिक कल्याण के लिए सरकार के पास कम धन पहुंचता है। यह भी कहा जा रहा है कि जीएसटी अधिक राजस्व और कम भ्रष्टाचार के तरीकों की खोज का ही एक नूमना है।

हालांकि यही तर्क वैल्यू एडेड टैक्स यानी वैट के मामले में भी दिए गए थे, लेकिन इससे कितना फर्क पड़ा, यह कभी सामने नहीं आ पाया। अलबत्ता, जीएसटी से एक बड़ा फर्क यह जरूर पड़ेगा कि इससे ‘एक देश, एक कर-व्यवस्था’ की अवधारणा साकार होगी। अब कम से कम यह नहीं होगा कि एक प्रदेश के लोग उसी सामान को महंगा खरीद रहे होंगे और दूसरे प्रदेश के लोग उसी को सस्ता। साथ ही किस तरह की चीज पर कितना कर लगना चाहिए, इसका एक दीर्घकालीन नजरिया सामने आया है। हालांकि आधी रात के जश्न से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा नई व्यवस्था को लोगों के लिए ज्यादा लाभप्रद बनाना।

असमंजस भी

जीएसटी को लेकर व्यापारियों के साथ एक बड़े तबके में असमंजस है। यह तबका जीएसटी के विरोध में नहीं है लेकिन इसके लिए थोड़ा और समय चाहता है। व्यवस्था को लागू करने वाला सरकारी तंत्र भी इसको लेकर पूरी तरह से तैयार है इस बात को विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता।

सरकार का नोटबंदी का फैसला सही कदम माना जा सकता है लेकिन उसे जिस तरह लागू किया उसने अनेक विसंगतियां पैदा कर दी। कहीं ऐसा न हो कि बिना तैयारी के जीएसटी भी उसी राह पर चल निकले।

सरकार का मानना है कि नई कर व्यवस्था अपनाने में कुछ समय के लिए परेशानियां आ सकती हैं लेकिन दीर्घावधि में देश को इससे बहुत फायदा होने की उम्मीद है। लम्बे चिंतन-मंथन के बाद जीएसटी का लागू होना देश में एकीकृत बाजार की व्यवस्था को मजबूत करेगा। लेकिन छोटे व्यापारियों का अब भी मानना है कि जीएसटी के प्रावधान और प्रक्रियाएं जटिल हैं लिहाजा इसे समझने के लिए कुछ और समय मिलना चाहिए। सरकार आखिरी समय तक वस्तुओं पर करों की दरों में बदलाव कर रही है। ऐसे में व्यापारियों को आशंका है कि इससे उनका व्यापार प्रभावित हो सकता है।

साथ ही उन्हें ‘इंस्पेक्टर राज’ का डर भी सता रहा है। अधिकांश की चिंता ये भी है कि उन्हें अब पहले से अधिक फार्म भरने होंगे और कोई भी गलती उन्हें आर्थिक जुर्माना भरने को मजबूर कर सकती है। सही है कि जीएसटी के लागू होने में आने वाली परेशानियों को छोड़ दिया जाए तो नई व्यवस्था व्यापार में सुगमता लाएगी। केन्द्र के साथ राज्यों का राजस्व भी बढ़ेगा और देश की जीडीपी भी। जाहिर है इससे घाटे में कमी आएगी। दीर्घावधि में विदेशी निवेश बढऩे के आसार भी बनेंगे।

वन नेशन, वन टैक्स के जरिए जब देश होगा एक

‘वन नेशन, वन टैक्स’ की कवायद वैसे तो यूपीए के जमाने में ही शुरू हो गई थी। लेकिन आम सहमति न बनने की वजह से जीएसटी का सपना मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान अधूरा रह गया। 2014 में पीएम मोदी की अगुवाई में एनडीए का दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना, कई मायनों में महत्वपूर्ण था। 1984 के बाद पहली बार कोई एक पार्टी अकेले अपने दम पर सत्ता पर काबिज हो चुकी थी। पूर्ववर्ती सरकार की खामियों को सफलतापूर्व जनता के बीच रखने में सफल रहने वाले पीएम मोदी के सामने जीएसटी एक बड़ी चुनौती थी। संसद के निचले सदन यानि लोकसभा में एनडीए को जीएसटी बिल पारित कराने में किसी तरह की मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा।

लेकिन राज्यसभा में संख्या बल की कमी, विपक्ष के तार्किक विरोध के सामने जीएसटी बिल पारित कराना सरकार के लिए बड़ी चुनौती थी।

वित्त मंत्री अरुण जेटली विपक्ष के नेताओं से लगातार ये अपील करते रहे कि देश की आर्थिक प्रगति के लिए वो सरकार के प्रयासों का समर्थन करें। इसी कड़ी में आंध्रप्रदेश के सीएम चंद्र बाबू नायडू की अध्यक्षता में एक समिति बनायी गई जो राज्यों की चिंताओं को बड़े परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश कर रही थी। राज्यों और विपक्षी दलीलों को सरकार ने तवज्जो दी और चार संशोधनों के साथ जीएसटी बिल राज्यसभा से पारित हो गया।

संसद के दोनों सदनों से जीएसटी बिल पारित होने के बाद अब ये साफ हो गया कि ‘वन नेशन, वन टैक्स’ के सपनों को धरातल पर उतारने में सरकार एक कदम आगे बढ़ चुकी है।

लालनपुर से लालकिले का सफर

15 अगस्त 2013 को देश दो भाषणों का गवाह बना। लालकिले की प्राचीर से तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह जिस वक्त यूपीए सरकार की उपल्बधियों का बखान कर रहे थे, ठीक उसी वक्त दिल्ली से हजारों किमी दूर गुजरात के लालनपुर से नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार को चुनौती दे रहे थे। मनमोहन सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि नाकामियों से भरी सरकार के मुखिया के बातों में दम नहीं है। ये वर्ष इस सरकार का आखिरी साल है।

किसी मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह के उद्बबोधन की राजनीतिक गलियारों में कड़ी आलोचना हुई थी। लेकिन ये सच था कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी राज्य का सीएम किसी पीएम को खुली चुनौती दे रहा था।

सरकार स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े कर सुधार कहे जा रहे माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरूआत देश की स्वाधीनता की उद्घोषणा के समय हुए समारोह की तर्ज पर करने की तैयारी में है। केंद्र और राज्यों के विभिन्न शुल्कों को समाहित कर पूरे देश में एक जैसी नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली की औपचरिक शुरूआत 30 जून की आधी रात को संसद के ऐतिहासिक केंद्रीय कक्ष में समारोह पूर्वक की जाएगी। इससे पूरा देश एक एकीकृत बाजार के रूप में उभरेगा।

संसद भवन वही कक्ष है जहां 15 अगस्त 1947 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने आज़ादी का आगाज करते हुए अपना ऐतिहासिक भाषण ‘नियति के साथ मिलन’ दिया था। इस बारे में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह जानकारी देते हुए आज कहा कि जीएसटी व्यवस्था के शुभारंभ का यह कार्यक्रम करीब घंटेभर चलेगा।

इसमें इस क्रांतिकारी कर सुधार की दिशा में विभिन्न राजनीतिक दलों और राज्यों के योगदान की झांकी मिलेगी। संसद के केंद्रीय कक्ष में पहले इस तरह आधी रात को एक कार्यक्रम आजादी की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर हुआ था।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे। गौरतलब है कि मुखर्जी ने ही सबसे पहली बार इस नयी कर प्रणाली के लिए संविधान संशोधन विधेयक को 2011 में तब पेश किया था। उस समय वह तत्कालीन संप्रग सरकार में वित्त मंत्री थे।

मुखर्जी और मोदी के साथ कार्यक्रम के दौरान मंच पर उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और एच.डी. देवगौड़ा एवं लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी मौजूद होंगी। लोकसभा और राज्यसभा के सभी सदस्य, राज्यों के मुख्यमंत्रियों और वित्त मंत्रियों को भी इस कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया है। साथ ही जीएसटी परिषद और राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति के पूर्व और वर्तमान सदस्यों को भी निमंत्रण भेजा गया है।

केंद्र और राज्यों का राजस्व बढ़ेगा

मध्यम और दीर्घावधि में केंद्र और राज्यों का राजस्व बढ़ेगा साथ ही घोषित अर्थव्यवस्था का आधार भी विस्तृत होगा। जेटली ने जोर देकर कहा कि जीएसटी ज्यादा प्रभावी व्यवस्था है और इसका असर बेहतर कर अनुपालन के रूप में दिखेगा। हालांकि उन्होंने माना कि लघु अवधि में जीएसटी की नयी व्यवस्था को अपनाने में ‘कुछ चुनौतियों का सामना’ करना होगा। उद्योग मंडलों के यह कहने कि लघु एवं मध्यम उद्योग इस प्रणाली के लिए तैयार नहीं हैं के बारे में प्रश्न किए जाने पर जेटली ने कहा कि ‘हम पहले से कहते आ रहे हैं कि जीएसटी पहली जुलाई से लागू होगा। ऐसे में किसी के पास तैयार नहीं होने का बहाना नहीं हो सकता।’

इसके अलावा हमने शुरुआती समय में रिटर्न दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया है जो बदलाव के लिए दिया गया पर्याप्त समय है। जीएसटी कानून में मुनाफाखोरी-रोधी प्रावधान के बारे में जेटली ने कहा कि इसे केवल डराने के लिए रखा गया है। इसके तब तक इस्तेमाल का इरादा नहीं है जब तक कि यह अपरिहार्य ना हो।

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :

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