अपना भारत/न्यूज़ट्रैक Exclusive : भाजपा के त्रासद नायक लालकृष्ण आडवाणी

सुशील कुमार वर्मा
कश्मीर, जनसंघ, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बलराज मधोक। भाजपा से जुड़े  इतिहास के जानकारों के लिए यह रुचिकर विषय हो सकता है। आज जब भाजपा के रूप में जनसंघ की वह धारा थोड़ी सी बदली है, तो बहुत कुछ याद आ रहा है। यह भी सोचना पड़ रहा है, कि आखिर क्यों लालकृष्ण आडवाणी अब भाजपा के त्रासद नायक बन गए है।
प्रधानमंत्री बनने के क्रम में वेटिंग रह गए भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी समेत उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि वे पीएम नहीं बन पाए तो क्या हुआ? राष्ट्रपति तो बन ही जाएंगे, लेकिन इस बार भी आडवाणी वेटिंग ही रह गए।
दरअसल निजी जीवन हो अथवा सार्वजनिक जीवन एक कहावत दोनों क्षेत्रों में अक्षरश: सत्य साबित होता दिखाई देता है, वह यह है, कि जो जैसा बोता है, उसे वैसा ही काटना भी पड़ता है। आडवाणी जी पर भी यह कहावत अक्षरश: सत्य साबित हो रही है। हालांकि उन्हें आज शायद प्रो. बलराज मधोक के प्रति अपनी प्रतिशोधात्मक राजनीति याद भले ही न हो। पर जो लोग सत्तर और अस्सी के दशक में जनसंघ की राजनीति से जुड़े थे, उन्हें आज भी अच्छी तरह से याद होगा कि पं. दीन दयाल उपाध्याय की हत्या के बाद जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बलराज मधोक का नाना जी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी के त्रिगुट से वैचारिक संघर्ष शुरू हो गया था।

प्रो. मधोक, पं. दीन दयाल जी की मृत्यु को उत्तर प्रदेश के एक घोटाले से जुड़ा विशुद्ध राजनीतिक हत्या मानते थे और अनेक बार इस हत्याकाण्ड की निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी करते रहे। पर यह मांग जनसंघ का शीर्ष नेतृत्व व सत्ता पक्ष दोनों अनसुना करता रहा। जनसंघ के इस त्रिगुण को दीन दयाल जी की अनुपस्थिति से तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिलने लगा था। चूंकि नाना जी देशमुख जनसंघ में उस समय राष्ट्रीय संगठन मंत्री नियुक्त थे और उन्हें पर्याप्त संगठनात्मक अधिकार मिला था, इसलिए उन्हीं दिनों प्रो. मधोक जनसंघ में संगठन मंत्रियों के अधिकार सीमित करने की आवाज भी उठाने लगे थे।
इसकी अंतिम परिणिति 1973 में फूलबाग कानपुर में आयोजित जनसंघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रो. मधोक का पार्टी से इस्तीफा और निष्कासन के रूप में हुई। मगर जनसंघ के इस गुट को इतने से भी संतोष नहीं रहा, परिणाम स्वरूप 1977 के आम चुनाव में भारतीय लोकदल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर रहे प्रो. मधोक को इस त्रिगुट ने दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी चरण सिंह पर दबाव डाल कर जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के टिकट तक से वंचित करा दिया।
इतना ही नहीं बाद के दिनों में बरेली से हो रहे लोकसभा चुनाव जब प्रो. मधोक लड़़ रहे थे, उनके अलावा कांग्रेस से बेगम आबिदा, जनता पार्टी से संतोष गंगवार के अलावा एक अन्य निर्दल प्रत्याशी बलराज भी चुनाव मैदान में था। उस समय लाल कृष्ण आडवाणी केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री थे। जिस दिन चुनाव प्रचार बंद हुआ, उसी दिन से मतदान के दिन तक आकाशवाणी ने लगातार प्रसारित किया बलराज चुनाव मैदान से हट गए।

 बलराज नाम का निर्दल प्रत्याशी संतोष गंगवार खेमे से ही डमी के रूप में खड़ा किया गया। बहरहाल संतोष गंगवार को जिताने के लिए किए गए इस दुष्प्रचार का परिणाम बेगम आबिदा की जीत के रूप में आया। बाद के दिनों में भी प्रो. मधोक की राजनीतिक हत्या करने में इस त्रिगुट ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। आज भले ही प्रो. मधोक इस दुनिया में नहीं रहे, पर जो लोग उनकी पीड़ा और उपेक्षा को नजदीक से देखे हैं, वे आज आडवाणी जी की उपेक्षा और पीड़ा से भी बेहद दु:खी हैं। ऐसे ही वक्त में ऐसे संयोग भी याद आते हैं। उसी के बाद बलराज मधोक ने जनससंघ मधोक बनाया था जिसमें मुझे उन्होंने उतर प्रदेश के महासचिव का दायित्व दिया था।
 भारतीय जनता पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी पीएम इन वेटिंग के बाद अब प्रेसिडेंट इन वेटिंग बनकर ही अपनी राजनीतिक पारी के अवसान की ओर बढ़ चले हैं। 89 साल के बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य लालकृष्ण आडवाणी अब बीजेपी में किस रोल में हैं, इस सवाल का उत्तर अब शायद वह ही जानते हैं।

राष्ट्रपति चुनाव की घोषणा से कई महीने पहले ही मीडिया और राजनीतिक हलकों में ये चर्चा चल रही थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने राजनीतिक गुरु लालकृष्ण आडवाणी को गुरुदक्षिण स्वरूप देश का राष्ट्रपति पद सौंपेंगे। लेकिन आज इन सारी चर्चाओं पर विराम लग गया है। मीडिया में ऐसी चर्चाएं आई थीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद ही लाल कृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति बनवाना चाहते हैं। इसी साल मार्च महीने में सोमनाथ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और लालकृष्ण आडवाणी के बीच एक मुलाकात हुई थी।
इस मीटिंग में नरेन्द्र मोदी ने संकेत दिया था कि अगर यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के पक्ष में हुए तो वे आडवाणी को राष्ट्रपति पद पर देखना चाहेंगे। आडवाणी को राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी क्यों नहीं मिली इसे समझने के लिए बीजेपी और देश की सियासत के पिछले 25 सालों के घटनाक्रम का अध्ययन भी जरूरी है। 9 जून 2013 को गोवा में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जब नरेन्द्र मोदी का नाम प्रचार समिति के प्रमुख के रूप में किया गया तो आडवाणी इस बैठक में नहीं पहुंचे।
13 सितबंर 2013 को बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक में नरेन्द्र मोदी का नाम पीएम पद के उम्मीदवार के रूप में किया जाना था तो भी आडवाणी इस बैठक में नहीं पहुंचे। और बीजेपी ने अपने स्टार लीडर की गैरहाजिरी में ही नरेन्द्र मोदी का नाम पीएम कैंडिडेट के लिए घोषित किया। तब आडवाणी ने पार्टी को एक चिट्ठी लिखी और कहा कि बीजेपी एक व्यक्ति के स्वार्थ की पूर्ति के लिए दीन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी के सिद्धातों से भटक गई है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कभी लालकृष्ण आडवाणी के दुलारे थे। 1990 में आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या का प्रसिद्ध रथयात्रा शुरू की थी तो उन्होंने अपने सारथी के रूप में नरेन्द्र मोदी को चुना था। देश की सियासत में हलचल मचा देने वाले 2002 के गुजरात दंगों के दौरान भी आडवाणी चट्टान की तरह मोदी के पक्ष में खड़े रहे।
मोदी पर कई आरोप लगे और उन्हें सीएम पद से हटाने की मांग उठी, लेकिन उन्हें आडवाणी का वरदहस्त हासिल था और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा नरेन्द्र मोदी को राजधर्म पालन की नसीहत देने के बावजूद वे गुजरात के सीएम बने रहे। लेकिन मोदी द्वारा गुजरात में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ही समीकरण बदल गया।
मोदी अब 7 आरसीआर की दावेदारी ठोंक रहे थे और आडवाणी को मोदी की उभरती शख्सियत में अपना प्रतिद्वन्दी साफ झलक रहा था। 2014 में प्रचंड बहुमत से जीत के बाद मोदी ने मार्गदर्शक मंडल बनाकर आडवाणी की भूमिका तय कर दी। कहा जाता है कि तभी से बीजेपी के दोनों पावर सेंटर के बीच अघोषित शीत युद्ध चलता रहता है। लेकिन अब तो यह प्रमाणित हो चुका, कि नरेन्द्र मोदी ने आडवाणी को त्रासद नायकों सूची में हमेशा के लिए डाल दिया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और बलराज मधोक के सहयोगी रहे हैं)