Election 2019: आज भी पिछड़ा है 9 मुख्यमंत्री देने वाला पूर्वांचल क्षेत्र

विडम्बना यह है कि हर मामलें में पिछडा पूर्वांचल जनसंख्या में आगे है। राजनीतिक प्रयोग के लिए हमेशा जन्नत कहलाने वाले पूर्वाचल में गरीब और ग्रामीण आबादी का हिस्सा अधिकतर रोजी रोटी की चिंता में ही उलझे रहते हैं।

श्रीधर अग्निहोत्री
लखनऊ: कई राजनीतिक दलों को ताकत देने वाला उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल आज भी विकास अशिक्षा और पिछडेपन के कारण अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। हर चुनाव में इसके विकास की चिता करने वाले राजनेताओं के लिए यह क्षेत्र प्रयोगशाला से कम नहीं है। यहां तक कि जिस क्षेत्र ने उ.प्र. को 8 मुख्यमंत्री दिये हों, वह पूर्वाचंल क्षेत्र अब अपराध की आउटसोर्सिंग बनता जा रहा है।

उपजाऊ भूमि सिंचाई बीज खाद के अभाव व नदियों का जल स्तर हर साल बढने के कारण यहां गरीबी का प्रभाव ज्यादा दिखता है। इसी कारण हर साल सैकडों युवा रोजगार पाने के लिए मुम्बई,कोलकाला,सूरत आदि निकल जाते हैं। जापानी इंसेफलाइटिस के शिकार हर साल कई बच्चे होते हैं।

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पहली बार योगी सरकार ने लोकसभा चुनाव के पहले अपने वित्तीय बजट में पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के निर्माण के लिए एक हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की । जबकि गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे परियोजना के प्रारंभिक कार्यों के लिए 550 करोड़ रुपये की व्यवस्था करने का काम किया है। विकास के लिए सड़क सबसे बड़ा साधन है और सरकार ने इस सड़क के जरिये लोकसभा चुनाव में वोटरों को साधने का काम किया है। वाराणसी में लाल बहादुर शास्त्री के पैतृक आवास को स्मृति संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है । गोरखपुर में आधुनिक प्रेक्षागृह के निर्माण पर 29 करोड़ 50 लाख रुपये की व्यवस्था की जानी है।

पिछले कई दशकों से पूर्वांचल क्षेत्र का विकास तो नही हुआ लेकिन पृथक पूर्वाचल के नाम पर राजनेताओं ने अपना विकास जरूर कर लिया। बुनियादी सुविधाओं और रोजगार के अभाव ने पूर्वाचंल को पलायन की सौगात दी है। पूर्वाचंल क्षेत्र में वाराणसी, चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर,मिर्जापुर, सोनभद,संतरविदासनगर, गोरखपुर,कुशीनगर,देवरिया, आजमगढ, मऊ,महाराजगंज,बस्ती,संतकबीर नगर,सिद्वार्थनगर तथा बलिया जिले आते हैं।

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15844 वर्ग किलोमीटर युक्त इस क्षेत्र की आबादी प्रदेश की आबादी की 40 प्रतिशत है। पूर्वाचंल 137 विधानसभा सदस्यों तथा 30 सांसदों को अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि करने के लिए भेजता पूर्वांचल में साक्षरता व महिला साक्षरता के मामलें में यह अंचल पश्चिम मध्य व बुंदेलखण्ड से भी पिछडा है। 55.22 प्रतिशत साक्षरता वाला पूर्वाचल 60.32 प्रतिशत साक्षर वाले बुंदेलखण्ड से भी पीछे है। जहां पश्चिम में 32.30 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में वाणिज्यिक फसले होती है। वहीं पूर्वांचल में सिर्फ 10.23 प्रतिशत ही।

जहां तक राजनीतिक दृष्टिकोण की बात है तो जब 1952 में पहले आम चुनाव हुए तो मछली शहर और राबर्टसगंज की सीट कांग्रेस हार गयी और यहां से निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए जबकि गाजीपुर सीट से समाजवादियों के हाथों में आ गयी। इसी तरह 1957 में कांग्रेस के दौर में वामदलों ने सैदपुर घोसी और वाराणसी लोकसभा सीट जीती, 1989 मे बोफोर्स कांड के समय जब पूरे देश में जनता दल की लहर थी तो आजमगढ सीट बसपा राबर्टसगंज सैदपुर भाजपा तथा गाजीपुर सीट पर निर्दलीय जीतें। इसके बाद 1989 में राजनीतिक अस्थिरता का जो दौर शुरू हुआ, उसने इस क्षेत्र को और कमजोर कर दिया।

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इसके पूर्व भी पूर्वाचल के वैचारिक बदलाव के लिए 3 नवम्बर 1996 को पूर्वाचल बनाओं मंच का गठन किया गया था। यही नहीं पूर्वांचल क पिछडेपन को दूर करने के लिए 1991 में भाजपा सरकार ने भी पूर्वाचल विकास निधि की भी स्थापना की थी। लेकिन अलग पूर्वांचल की मांग करने वालों का कहना है कि इस सबसे काम चलने वाला नही है। क्योकि साल 2022 में जब उ.प्र. की आबादी 25 करोड हो जायेगी तो फिर एक विधानसभा एक राजभवन तथा एक सचिवालय से शासन व्यववस्था नही चल सकती है।

विडम्बना यह है कि हर मामलें में पिछडा पूर्वांचल जनसंख्या में आगे है। राजनीतिक प्रयोग के लिए हमेशा जन्नत कहलाने वाले पूर्वाचल में गरीब और ग्रामीण आबादी का हिस्सा अधिकतर रोजी रोटी की चिंता में ही उलझे रहते हैं।