नवरात्र 2019: आखिर क्यों खास है मां विंध्यवासिनी धाम, यहां जानें सबकुछ…

ध्याचल की पहाड़ियों में गंगा की धारा के बीच विंध्यधाम एक ऐसी जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा।

Published by Aditya Mishra Published: October 6, 2019 | 8:28 pm
Modified: October 6, 2019 | 8:29 pm

लखनऊ: विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा की धारा के बीच विंध्यधाम एक ऐसी जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा।

यहां देवी के तीन रूपों के दर्शन का सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है। विंध्य क्षेत्र की महत्ता पुराणों में तपोभूमि के रूप में वर्णित है।

देश के 51 शक्तिपीठों में से एक विंध्यवासिनी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केन्द्र है। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं।

विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी है। मान्यता है कि जो मनुष्य इस स्थान पर तप करता है, उसे अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है।

सभी संप्रदाय के उपासकों को मनोवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं।

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संकल्प मात्र से प्राप्त होती है सिद्धि

यहां पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्धि प्राप्त होती है। इस कारण यह क्षेत्र सिद्व पीठ के रूप में विख्यात है। आदि शक्ति की शाश्वत लीला भूमि मां विंध्यवासिनी के धाम में पूरे वर्ष दर्शनार्थियों का आना-जाना लगा रहता है।

ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं। तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। इसकी पुष्टि मार्कंडेय पुराण, श्रीदुर्गा सप्तशती की कथा से भी होती है।

वैदिक व वाम मार्ग विधि से होती है पूजा

शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है।. इस शक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है।

शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं सिर्फ विंध्याचल ही ऐसा स्थान है, जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं।

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महानिशा पूजन का महत्व

नवरात्र में महानिशा पूजन का भी अपना महत्व है। यहां अष्टमी तिथि पर वाममार्गी तथा दक्षिण मार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। आधी रात के बाद रोंगटे खड़े कर देने वाली पूजा शुरू होती है। ऐसा माना जाता है कि तांत्रिक यहां अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं।

नवरात्र में पताका पर वास करती हैं मां विंध्यवासिनी

कहा जाता है कि नवरात्र के दिनों में मां मन्दिर की पताका पर वास करती हैं ताकि किसी वजह से मंदिर में न पहुंच पाने वालों को भी मां के सूक्ष्म रूप के दर्शन हो जाएं।

त्रिकोण यात्रा का विशेष महत्व

मां के इस धाम में त्रिकोण यात्रा का विशेष महत्व होता है जिसमें लघु और बृहद त्रिकोण यात्रा की जाती है। लघु त्रिकोण यात्रा में मंदिर परिसर में मां के 3 रूपों के दर्शन होते हैं।

दूसरी ओर बृहद त्रिकोण यात्रा में तीन अलग-अलग रूपों में मां विंध्यवासिनी, मां महाकाली व मां अष्टभुजी के दर्शनों का सौभाग्य श्रद्धालुओं को मिलता है।

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