Varansi : कागजों पर दौड़ते सफाई के घोड़े

Varansi : कागजों पर दौड़ते सफाई के घोड़े

आशुतोष सिंह
वाराणसी। देव दीपावली की भव्यता को जिसने भी देखा, बस देखता ही रह गया। अर्धचंद्राकार घाटों पर मानो स्वर्गलोक उतर आया हो। रात जितनी ही सुहानी थी, सुबह उतनी ही भयावह। देव दीपावली की अगली सुबह बनारस के अधिकांश घाटों पर गंदगी का साम्राज्य फैला था। चारों ओर कूड़े के ढेर और सामान बिखरे थे। इन तस्वीरों को देखने के बाद मन में सिर्फ यही बात सामने आई सफाई को लेकर लोग कब संजीदा होंगे? सफाई के मोर्चे पर सिर्फ यहां के लोग ही नहीं सरकारी मशीनरी भी फेल हो चुकी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाख कोशिशों के बाद भी शहर में सफाई व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त है। नगर निगम की लापरवाही और दुव्र्यवस्था के चलते सफाई के काम में लगी एजेंसियों ने हाथ खड़े करने शुरू कर दिए हैं। 90 वार्डों में सिर्फ 34 वार्डों में ही एजेंसियां काम कर रही हैं। इनमें भी सिर्फ कूड़ा उठाने तक ही काम सीमित है। यही नहीं पूरे शहर में करोड़ों की लागत से लगे 2500 डस्टबीन अब खोजने पर भी नहीं मिलते।

सफाई एजेंसियों ने खड़े किए हाथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सफाई को लेकर बेहद संजीदा रहते हैं। जब उन्होंने देश की कमान संभाली तो अपने संसदीय क्षेत्र के अस्सी घाट पर गंगा की सफाई और गलियों में झाड़ू लगाकर बड़ा संदेश दिया था। ऐसा लगा कि अगले पांच सालों में काशी की किस्मत पलट जाएगी। सड़कों, गलियों में गंदगी का अंबार नहीं लगेगा। ऐसा नहीं था कि ये सिर्फ सपना भर नहीं था बल्कि इसे हकीकत का शक्ल देने की कोशिश भी की गई। सफाई के लिए पूरे शहर में पानी की तरह पैसा बहाया गया, लेकिन पांच साल बाद भी बनारस खुद को वहीं खड़ा पाता है। अलबत्ता ये जरूर है कि चुनिंदा घाट और कुछ सड़कों की हालत पहले से कुछ जरूर बेहतर हुई है।

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नगर निगम की ओर से सफाई व्यवस्था को बेहतर करने के लिए निजी एजेंसियों को मोर्चे पर लगाया गया। आईएंडएसएफ और केआना नाम की दो एजेंसियों को सफाई का काम सौंपा गया। आईएंडएसएफ को जहां 30 वार्डों का जिम्मा दिया गया, वहीं केआना को 15 वार्डों का। पांच साल गुजर जाने के बाद अब दोनों एजेंसियां प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र से अपना काम समेटने लगी हैं। आईएंडएसएफ ने जहां खुद को 14 वार्डों तक समेट लिया है वहीं केआना 15 वार्डों में सिर्फ कूड़ा उठान का काम कर रही है। इसके पीछे बड़ी वजह नगर निगम का अडिय़ल रवैया रहा है। पेमेंट में लेटलतीफी और प्रशासनिक अड़ंगेबाजी के चलते दोनों एजेंसियां अब अपना बोरिया बिस्तर समेटने के चक्कर में है। एजेंसियों के आला अफसरों की मानें तो नगर निगम अनावश्यक दबाव डाल रहा है। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए पूरा ठीकरा सफाई एजेंसियों के मत्थे मढ़ दिया जाता है। ऐसे में अब यहां काम कर पाना मुश्किल है।

कमिश्नर का आदेश भी हवा हवाई

मौजूदा वक्त में शहर की सफाई व्ययस्था बेहद खराब है। खुद सीएम योगी आदित्यनाथ भी इसे महसूस कर चुके हैं। उन्होंने 20 अक्टूबर तक सफाई व्यवस्था को ठीक करने के साथ ही सड़कों को दुरुस्त करने की डेडलाइन निर्धारित की थी, लेकिन बनारस के अफसर कान में तेल डालकर सोए हुए हैं। उन्हें ना तो पीएम की प्रतिष्ठा का ख्याल है और ना ही सीएम के आदेश का खौफ। सीएम की डेडलाइन गुजर जाने के बाद भी ना सड़क बनी और ना ही सफाई को लेकर अफसर गंभीर दिख रहे हैं।

कमिश्नर दीपक अग्रवाल भी अफसरों के पेंच कसते-कसते थक चुके हैं। पिछले दिनों उन्होंने शहर के सभी 90 वार्डों में सफाई व्यवस्था बनाये रखने के लिए अधिकारी नियुक्त किए। अधिकारियों को निर्देशित किया गया था कि उनके इलाके के किसी भी खाली प्लाट, तालाब में कूड़ा करकट ना हो, पॉलीथिन का प्रयोग ना किया जाए। ऐसा करने पर आरोपी के साथ ही संबंधित अधिकारी के भी खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान तय किए गए। कमिश्नर के इस आदेश के कुछ दिनों तक अधिकारी अपने-अपने वार्डों की सुध लेते रहे, बाद में वही ढाक के तीन पात। अधिकारियों ने वार्डों की जिम्मेदारी को किनारे कर दिया और अपनी दुनिया में मस्त हो गए।

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भारी जुर्माना भी बेअसर

गंदगी फैलाने वालों पर नकेल कसने के लिए नगर निगम ने भारी जुर्माने का भी प्रावधान किया है। इसके तहत 500 से लेकर 50 हजार रुपये पेनाल्टी लगाई जा सकती है, लेकिन लोगों के बीच जुर्माने का खौफ नहीं है। पिछले दिनों शहर में जब स्मॉग ने असर दिखाया तो लोग प्रदूषण को लेकर सचेत जरूर दिखे, लेकिन कुछ दिनों के बाद हालात फिर जस के तस हो गए हैं। नगर निगम की ओर से जो नियम बनाए गए हैं उसके मुताबिक बड़े फर्म अगर गंदगी करते हैं तो 20 हजार रुपया जुर्माना वसूला जाएगा। सड़क पर निर्माणाधीन मकान का मलबा फेंकने पर 50 हजार रुपये देने पड़ेंगे। घर के बाहर कूड़ा फेंकने पर 500 से लेकर 2 हजार रुपये का प्रावधान है। इसी तरह कूड़ा जलाने पर नगर निगम ने एक हजार रुपये जुर्माना तय किया है। शहर में गंदगी की एक बड़ी वजह है पशुपालक। प्रशासन की तमाम कोशिशों के बाद भी पशुपालकों पर लगाम नहीं लग पा रही है। जिला प्रशासन ने कुछ महीने पहले पशुपालकों को शहर से बाहर भेजने की तैयारी की थी, लेकिन राजनीतिक और पशुपालकों के दबाव के चलते इसे अगले कुछ साल के लिए टाल दिया गया। नगर निगम की ओर से गोबर निस्तारण पर पशुपालकों के खिलाफ भारी जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान तय किया गया है। इसकी राशि 20 हजार रुपये तय की गई है।

किसी काम की नहीं टास्कफोर्स

गंदगी करने से पहले लोगों के जेहन में खौफ हो, खुले स्थानों पर कूड़ा फेंकने से पहले लोग सौ बार सोचें, इसे लेकर नगर निगम की ओर से जोनवार टास्कफोर्स का गठन किया गया। प्रत्येक टास्कफोर्स में कर्मचारी से लेकर अफसर की तैनाती की गई। इसके तहत निर्माणाधीन मकान की गंदगी करने वालों के खिलाफ अभियान चलाया गया। साथ ही प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने की योजना थी। लेकिन छह माह गुजर जाने के बाद भी बेहतर परिणाम सामने नहीं आए हैं। अधिकांश इलाकों में टास्कफोर्स का अता-पता नहीं रहता। इसमें लगे कर्मचारी और अफसर सिर्फ अपनी जेब भरने में मशगूल रहते हैं।
सफाई के नाम पर सिर्फ छोटे दुकानदारों को परेशान किया जाता है। दुकानदारों का कहना है कि प्लास्टिक चेकिंग के नाम पर नगर निगम वाले परेशान करते हैं। आये दिन उनसे वसूली की जाती है। दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का कहना है कि कूड़ा उठान सिर्फ रस्मअदायगी भर है। गलियों की हालत तो सबसे ज्यादा खराब है। अंदरूनी इलाकों में मनमानी चल रही है। जिन घरों के लोग पैसे देते हैं, उनके घरों के बाहर से कूड़ा तो उठाया जाता है, लेकुन जो नहीं देते उनके घरों के बाहर सफाईकर्मी जाते ही नहीं। नतीजा ये हो रहा है कि गलियों में कूड़े के ढेर लगे रहते हैं। नगर निगम की इसी लापरवाही के चलते ही पिछले दिनों यहां के नगर आयुक्त आशुतोष द्विवेदी का ट्रांसफर कर दिया गया। फिलहाल नगर को साफ करने का जिम्मा यहां के सीडीओ रह चुके युवा आईएएस गौरांग राठी के कंधों पर है।

सफाई के आंकड़ों में भी फेल बनारस

प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के नाते यहां की सफाई व्यवस्था पर पूरे देश की नजर होती है। वैसे भी इस प्राचीन और धार्मिक नगरी को देखने के लिए हर साल लाखों की संख्या में देसी-विदेशी सैलानी पहुंचते हैं। लेकिन जब इन सैलानियों के सामना शहर की गंदगी से पड़ता है तो उनके जेहन में बनारस की गलत छवि बनती है। स्थानीय सांसद नरेंद्र मोदी इसी धारणा को तोडऩा चाहते हैं, लेकिन उनकी ये कोशिश परवान नहीं चढ़ पा रही है। सिर्फ जमीनी स्तर पर ही नहीं कागजी आंकड़ों में भी बनारस फिसड्डी साबित हो रहा है। स्वच्छता सर्वेक्षण की जारी ताजा रैंकिंग में साफ शहरों की सूची में बनारस को पूरे देश में 70वां स्थान मिला है जबकि यह प्रदेश में तीन पायदान नीचे खिसकर चौथे नंबर पर आ गया है। दो साल तक यही बनारस लगातार पहले नंबर पर काबिज रहा। फिलहाल अधिकारियों की लापरवाही, लचर व्यवस्था और आम लोगों में जागरूकता की कमी ने बनारस के सिर से नंबर एक का खिताब छिन लिया। स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 में बनारस को देश में 67वां स्थान मिला था।
बीते साल की तुलना में बनारस की सबसे खराब स्थिति सर्टिफिकेशन और सर्विस लेवल प्रोग्रेस में रही। सिटीजन फीडबैक भी ठीक नहीं रहा। सर्विस लेवल प्रोग्रेस में बनारस को 694 नंबर मिला है। कुल 1250 पूर्णांक वाली इस परीक्षा में नगर निगम की प्रगति बेहद ही खराब रही। कैटेगरी सर्टिफिकेशन में मात्र 450 अंक मिले हैं। वहीं डायरेक्ट ऑब्जर्वेशन (स्थलीय निरीक्षण) में 982 अंक मिले हैं। सिटीजन फीडबैक में 967 नंबर मिले हैं। चार प्रकार की कैटेगरी में हुए इस सर्वेक्षण में 5000 अंकों में से बनारस को 3063 अंक मिले हैं।

बनारस में सफाई से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

वाराणसी नगर निगम में कुल 90 वार्ड हैं
सफाई के लिए दो एजेंसियां लगाई गई हैं
14 वार्डों में आईएंडएसएफ एजेंसी काम कर रही है
15 वार्डों में केआना एजेंसी कूड़ा उठाने का काम देख रही है
76 वार्डों में नगर निगम के कर्मचारी सफाई में लगे हैं
नगर निगम में 2700 सफाई कर्मचारी- 1908 अस्थायी,792 संविदा कर्मचारी
प्रतिदिन 620 टन कूड़ा निकलता है
कूड़ा उठाने के लिए 90 हापर मौजूद
सफाई प्रबंधन पर 76 लाख रुपये खर्च