ख्वाहिशों के कब्रिस्तान में दबा है गोरखपुर का ये ‘रंगाश्रम ऑडिटोरियम’ आज तक नहीं हुआ निर्माण

रंगमंच के कलाकारों को प्लेटफार्म उपलब्ध कराने के उद्देश्य से गोरखपुर में बनाए जाने वाले रंगाश्रम प्रेक्षागृह का भविष्य अंधेरे में डूबता हुआ नजर आ रहा है। जो गोरखपुर के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह का सपना था। उनका उद्देश्य था यहां के कलाकारों को एक नया प्लेटफार्म मिल सके।

गोरखपुर: रंगमंच के कलाकारों को प्लेटफार्म उपलब्ध कराने के उद्देश्य से गोरखपुर में बनाए जाने वाले रंगाश्रम प्रेक्षागृह का भविष्य अंधेरे में डूबता हुआ नजर आ रहा है। जो यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह का सपना था। उनका उद्देश्य था कि यहां के कलाकारों को एक नया प्लेटफार्म मिल सके। इसके लिए 26 वर्ष पूर्व गोरखपुर में एशिया का सबसे बड़ा प्रेक्षागृह निर्माण कराने की कवायद शुरू की गई थी, लेकिन वह कुछ दिनों बाद एक केस में तबदील हो गया।

प्रेक्षागृह का निर्माण आज भी अटका है
-यहां कलाकार तो है पर प्रेक्षागृह नहीं है, जहां नाटकों का मंचन किया जा सके।
-साल 1987 में स्व. वीर बहादुर सिंह ने जिस जमीन पर प्रेक्षागृह निर्माण की नींव रखी थी, वह ब्रिटिश काल में हरमुज एंड कंपनी को पट्टे पर दी गई थी।
-बाद में कंपनी ने शहर के एक व्यक्ति को जमीन पट्टे पर दे दी।
-यह जमीन कुल 2.9 एकड़ की है।
-जिसे वीर बहादुर सिंह ने अधिग्रहित करा कर संस्कृत विभाग को हस्ताक्षरित कर दिया, ताकि गोरखपुर में एशिया का सबसे बड़ा सुसज्जित प्रेक्षागृह का निर्माण कराया जा सके।

आगे की स्लाइड में पढ़ें एस्टीमेट तैयार कर निर्माण को हरी झंडी दी गई थी पर…

निर्माण कार्य शुरु होते ही केस दर्ज हो गया
-साल 1990 में आनन-फानन में शासन से अनुमति मिली और सात करोड़ रुपए का एस्टीमेट तैयार कर निर्माण को हरी झंडी दे दी गई, लेकिन जमीन का निर्माण कार्य शुरु भी नहीं हुआ था कि उस पर केस दर्ज हो गया।
-प्रेक्षागृह में एक करोड़ चार लाख रुपए का निर्माण कार्य हो चुका था।
-उस समय मंगाए गए बाकी सामान जिसकी कीमत लाखों में है, वह पड़े- पड़े बर्बाद हो चुकी है।

-केस में लोअर कोर्ट से सरकार हार गई और एडिशनल सिविल जज के यहां अपील की।
-इस बीच दूसरे भूखंड पर कुछ लोगों की नजर गई और उस जमीन को फ्री होल्ड करा लिया।
-जनप्रतिनिधियों के दबाव में प्रशासन ने फ्री होल्ड निरस्त कर दिया, लेकिन दूसरे वादी ने भी केस कर दिया।

आगे की स्लाइड में पढ़े यह मामला सिर्फ तारीखों का मौहताज बनकर रह गया …

-आज भी जमीन पर दो केस चल रहे है।
-जिसमें पहला केस लोअर कोर्ट के एडिशनल सिविल जज और दूसरा इलाहाबाद के उच्च न्यायालय में चल रहा है।
-जिसमें मार्च 2010 में एक केस में सफलता मिली और प्रेक्षागृह निर्माण पर लगी रोक हट गई।
-इसके बाद रंगकर्मियों की उम्मीदे बढ़ी और प्रदेश की मायावती सरकार में संस्कृत मंत्री सुभाष पांडे और सचिव अवनीश अवस्थी के साथ हुई बैठक में एस्टीमेट को फिर से दौहराया गया।

-इसकी कुल लागत 11 करोड़ रुपए आंकी गई।
-इस बीच वादी कोर्ट की शरण में गए एक और केस को ओपन करा दिया।
-तब से यह मामला सिर्फ तारीखों का मौहताज बनकर रह गया है।
-इस बीच 40 नाट्य संस्थाओं के रंग कर्मियों ने एक मंच पर आकर सांस्कृतिक आंदोलन शुरू किया और अधूरे प्रेक्षागृह में नाट्य प्रस्तुति करने लगे जिसकी अब तक 1250 वी कड़ी पूरी की जा चुकी है।

-रंग आंदोलन से जुड़े प्रसिद्ध रंगकर्मी केसी सेन के कहा की सरकार की उपेक्षा के कारण प्रेक्षागृह का निर्माण कार्य ठप पड़ा है।
-किसी भी सरकार ने इस पर रुचि नहीं दिखाई जिससे गोरखपुर के कलाकारों को प्लेटफार्म मिलने में दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं।
-उन्होंने कहा कि अगर प्रेक्षागृह का निर्माण हो जाता है जो एशिया का सबसे बड़ा प्रेक्षागृह होगा।
-यहां के कलाकार देश में ही नहीं विदेशों में भी अपनी कला प्रतिभा का लाभ उठा पाएंगे।