बेहद ताकतवर है ईडी, इनसे न टकराना, शिकंजे में चिदम्बरम

नीलमणि लाल

लखनऊ: हाईप्रोफाइल केसों में ईडीयानी इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट कार्रवाई के बाद आजकल ईडी का नाम सबकी जुबान पर है। पूर्व वित्त मंत्री चिदम्बरम के मामले में भी ईडी की कार्रवाई हाल के दिनों में मीडिया में छाई रही है। यही कारण है कि ईडी अचानक बहुत पावरफुल पोजीशन में आ गया है। 1957 में अपनी स्थापना के बाद से पहली बार ईडी हाईप्रोफाइल एजेंसी बनकर सामने आया है। ईडी का वर्तमान आक्रामक रवैया और इसके बारे में व्यापक मीडिया कवरेज पिछले एक दशक में काफी बढ़ी है। ये भी तब हुआ जब ईडी ने प्रिवेन्शन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत राजनीतिक मामले अपने हाथ में लेने शुरू कर दिए। ये भी विडम्बना है कि ऐसा ज्यादातर उस दौरान हुआ जब पी. चिदम्बरम वित्त मंत्री थे। आज खुद चिदम्बरम ईडी के शिकंजे में हैं।

ईडी को मिली ताकत

पीएमएलए का दायरा 2009 और 2013 में संशोधनों के बाद बढ़ा दिया गया जिससे ईडी को ढेरों शक्तियां मिल गईं। पीएमएलए के प्रावधानों के कारण यह कहा जा सकता है कि ईडी एक तरह से सीबीआई से ज्यादा पावरफुल एजेंसी हो गई है। ये एकमात्र एक्ट है जिसके तहत किसी विवेचक के समक्ष दर्ज किया गया बयान अदालत में बतौर साक्ष्य स्वीकार्य है। ऐसे प्रावधान वाले टाडा और पोटा जैसे कानून काफी पहले ही समाप्त किए जा चुके हैं। इसी साल जुलाई में सरकार ने मनी लांड्रिंग एक्ट में बदलाव करके ईडी को और ताकत दे दी है। वित्त विधेयक 2019 में संशोधन के जरिए अपराध से कमाए गए पैसे की परिभाषा को और व्यापक कर दिया है। अब ईडी उन व्यक्तियों व संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है जिनकी अपराध की कमाई भलेे ही मनी लांड्रिंग एक्ट के तहत न आती हो।

अटल लाए थे मनी लांड्रिग बिल

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान पीएमएलए बिल संसद में पेश किया गया था। 2002 में ये बिल पारित हो गया, लेकिन चिदम्बरम के कार्यकाल के दौरान 2005 में ये कानून लागू किया गया। इसमें ईडी को आपराधिक अभियोजन की शक्तियां मिल गईं जो फेरा खत्म होने से छिन गईं थीं।

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चिदम्बरम के वित्तमंत्रित्व काल में ईडी एक के बाद एक राजनीतिक मामले अपने हाथ में लेने लगा। मधु कोड़ा मामला, 2जी घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस, सीडब्लूजी व सहारा के मामले, बेल्लारी खनन मामला (इसमें भाजपा के रेड्डी बंधु फंसे थे), वानपिक परियोजना मामला (इसमें वाई.एस.जगन रेड्डी फंसे थे) और रामदेव संबंधी केस इनमें शामिल हैं। इसमें मधु कोड़ा केस ईडी के इतिहास में पहला मामला रहा जिसमें अभियुक्त पर दोष सिद्ध किया जा सका।

कई मामलों में प्रगति नहीं

रामदेव का केस राजग के सत्ता में आने के बाद बंद कर दिया गयाजबकि रेड्डी बंधुओं और जगन रेड्डी के खिलाफ मामलों में कोई प्रगति नहीं हुई है। 2जी घोटाला मामला कोर्ट में ठहर नहीं सका और एयरसेल-मैक्सिस केस के अभियुक्त बरी कर दिए गए। सीडब्लूजी और सहारा के मामले अब भीचल रहे हैं। पूर्व तृणमूल नेता मुकुल रॉय और पूर्व कांग्रेसी हिमांता बिस्वसरमा के खिलाफ चिट फंड घोटाले की जांच सीबीआई और ईडी दोनों एजेंसियां कर रही हैं। ये दोनों नेता भाजपा ज्वाइन कर चुके हैं और घोटाले की जांच में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं दिखाई दी है।

2067 लोगों की फोर्स

2011 में ईडी में भारी फेरबदल किया गया जिसके बाद ये 2067 अधिकारियों-कर्मचारियों वाली फोर्स बन गई। इसके पहले यहां मात्र 758 लोग काम करते थे। ईडी के देश भर में दफ्तरों की संख्या 21 से बढक़र 49 हो गई। ईडी की तुलना में सीबीआई के पास चार हजार अधिकारी-कर्मचारी हैं। लेकिन आज ईडी के करीब 50 फीसदी पद खाली पड़े हैं। इस एजेंसी की अपनी कोई बिल्डिंग नहीं है। अपना लॉकअप नहीं हैं। ईडी जिस अभियुक्त को कस्टडी में लेती है उसे लोकल पुलिस थाने के लॉकअप में ही रखना पड़ता है।

मात्र आठ की दोष सिद्धि

ईडी के पास तमाम शक्तियां होने के बावजूद इसका ट्रैक रिकार्ड बहुत कमजोर रहा है। मनी लांड्रिंग एक्ट के अंतर्गत 2005 से अब तक दर्ज किए गए करीब 2400 मामलों में सिर्फ आठ में ही दोष सिद्धि हो सकी है। ईडी की जांच भी बहुत सुस्त रही है और जून 2019 तक मात्र 688 मामलों में ही अभियोजन चार्जशीट दाखिल की जा सकी है। वित्त मंत्रालय के लिए भी ये चिंता का विषय रहा है।

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2016 में राजस्व सचिव हंसमुख अढिय़ा ने सुस्त जांच और बेहद कम दोष सिद्धि के लिए एजेंसी को खरी खोटी सुनाई थी। इसके जवाब में ईडी के तत्कालीन निदेशक करनाल सिंह ने कहा था कि ईडी के मामलों में विलंब इसलिए है क्योंकि ये मामले रसूख वाले लोगों से जुड़े हुए हैं। इन्हीं करनाल सिंह ने दो सितम्बर को एक बयान में कहा था कि उन पर लगाए गए घूसखोरी के आरोप झूठे हैं। करनाल सिंह पर ईडी के ही एक पूर्व उप निदेशक ने ये आरोप लगाए थे जो चिदम्बरम केस से जुड़े हैं।

जमानत तक नहीं मिलती थी

2017 तक मनी लांड्रिंग एक्ट में एक प्रावधान था कि गिरफ्तार किए गए किसी अभियुक्त को तभी जमानत मिल सकेगी जब कोई अदालत संतुष्टï हो जाए कि अभियुक्त दोषी नहीं है। इस प्रावधान को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रद कर दिया था, लेकिन जब तक ये प्रावधान लागू रहा तब तक पीएमएलए के आरोपियों को दो-तीन साल की जेल से पहले जमानत शायद ही कभी मिली हो। 2005 से 2017 के बीच ईडी ने पीएमएलए में 120 लोगों को गिरफ्तार किया था जिसमें से दो-तीन लोग ही जल्दी जमानत पा सके।

संपत्ति जब्त करने का अधिकार

मनी लांड्रिंग एक्ट में ईडी को मिला सबसे शक्तिशाली अधिकार अभियुक्त की संपत्ति जब्त करने का है। इसके अलावा एक्ट में अभियुक्त पर ही जिम्मेदारी डाली गई है कि वह अपने को निर्दोष साबित करे। एक्ट के तहत किसी व्यक्ति का गलत इरादा ही काफी है। कानून के तहत यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति के बारे में एजेंसी यह साबित कर देती है कि वह किसी अपराध से कमाए गए पैसे से बनाई गई है तो एजेंसी की ये साबित करने की जिम्मेदारी नहीं होगी कि उस व्यक्ति का इरादा मनी लांड्रिंग का रहा है।

ऐसे मिली ईडी को ताकत

1957 से अब तक ईडी एक प्रवर्तन यानी कानून लागू कराने वाली एक छोटी एजेंसी था जिसका दायरा कार्पोरेटी दुनिया और सिविल अपराधों में अभियोजन तक सीमित था। ईडी को ताकत 1973 में मिली जब विदेशी मुद्रा संबंधी कानून फेरा में संशोधन किया गया। अगले तीन दशकों तक ईडी ने कई हाईप्रोफाइल मामलों को अपने हाथ में लिया जिसमें महारानी गायत्री देवी, जयललिता, टी.टी. दिनाकरण, हेमा मालिनी, फिरोज खान, विजय माल्या, ऑरके ग्रुप, वेस्टन टीवी और बीसीसीएल के चेयरमैन अशोक जैन शामिल थे जिन पर फेरा के उल्लंघन के आरोप थे।

1973 का फेरा कितना ताकतवर कानून था,इसका उदाहरण इसी से देखा जा सकता है कि उसमें एक ईओ यानी इन्फोर्समेंट ऑफिसर (इंस्पेक्टर के बराबर का पद) को किसी को भी गिरफ्तार करने और किसी भी व्यापारिक प्रतिष्ठïन में बिना वारंट प्रवेश करने का अधिकार मिला हुआ था। यहां तक कि एक असिस्टेंट ईओ तक बिना वारंट किसी वाहन या व्यक्ति की तलाशी ले सकता था। ईडी के पास इतने अधिकार हो गए कि इस एजेंसी पर कस्टडी में थर्ड डिग्री के आरोप लगने लगे। फिर भी ईडी का दायरा कार्पोरेटी दुनिया तक सीमित रहा।

2000 में फेरा की जगह फेमा

अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ फेरा को दमनकारी और औचित्यविहीन कानून माना जाने लगा क्योंकि उदारीकरण में ऐसी नियंत्रणकारी व्यवस्था की गुंजाइश नहीं बची थी। अंतत: जनवरी 2000 में फेरा खत्म कर दिया गया और इसकी जगह फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) लाया गया। फेमा के अंतर्गत विदेशी मुद्रा संबंधी गड़बडिय़ों को सिविल अपराध की श्रेणी में ले आया गया जिसे जुर्माने की अदायगी के बाद कंपाउंड या समाप्त किया जा सकता था। इसके चलते ईडी फिर दंतविहीन हो गया क्योंकि अब उसे किसी को कस्टडी में लेने या गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं रह गया।

इसी बीच अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हो गया जिसके बाद आतंकी फाइनेंसिंग पर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित हो गया। अमेरिका ने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) का गठन कर दिया था और भारत पर दबाव था कि वह भी मनी लांड्रिंग के खिलाफ तंत्र खड़ा करे। सो 2005 में प्रिवेन्शन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) अस्तित्व में आ गया।

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